
विशेष आलेख | शाबाश इंडिया।
कैंसर का नाम सुनते ही किसी परिवार के सामने केवल बीमारी की चिंता नहीं आती, बल्कि इलाज के भारी खर्च का डर भी खड़ा हो जाता है। जांच, ऑपरेशन, कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी और जीवनरक्षक दवाओं का खर्च पहले ही सामान्य परिवार की आर्थिक क्षमता को चुनौती देता है। ऐसे में यदि किसी जरूरी दवा की कीमत खुदरा विक्रेता तक पहुंचने वाली कीमत से कई गुना अधिक हो, तो सवाल केवल बाजार का नहीं रहता, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की पारदर्शिता, नियमन और मरीज के हित का भी बन जाता है।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कैंसर की एक दवा का उदाहरण सामने आया, जिसमें बताया गया कि दवा का मूल्य खुदरा विक्रेता के लिए करीब 2,700 रुपये था, जबकि उसका अधिकतम खुदरा मूल्य यानी एमआरपी 27,000 रुपये था। यानी दोनों कीमतों के बीच करीब दस गुना का अंतर। 22 सितंबर 2026 की सुनवाई में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने इस अंतर पर गंभीर चिंता जताई थी।
29 सितंबर की अगली सुनवाई में भी अदालत ने दवाओं की कीमतों में इस तरह के बड़े अंतर पर सवाल उठाते हुए केंद्र से विचार करने को कहा कि क्या सभी दवाओं के लिए एक समान 16 प्रतिशत मार्जिन जैसी व्यवस्था संभव हो सकती है। यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 16 प्रतिशत का आंकड़ा उस समय अदालत द्वारा उठाया गया सवाल/विचार था, कोई नया लागू नियम या अंतिम आदेश नहीं। मामले को आगे सुनवाई के लिए 12 अक्टूबर 2026 को सूचीबद्ध किया गया है।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सवाल केवल 27 हजार रुपये की एक दवा का नहीं है। सवाल यह है कि निर्माता से निकलने के बाद दवा की कीमत किस-किस स्तर पर और किस आधार पर बदलती है। निर्माता, वितरक, थोक विक्रेता, खुदरा विक्रेता और अस्पताल तक पहुंचते-पहुंचते कीमत में कितना अंतर आता है और मरीज को उस अंतर की जानकारी कितनी होती है?
भारत में दवाओं की कीमतों के नियमन के लिए Drugs (Prices Control) Order, 2013 यानी DPCO का ढांचा मौजूद है। राष्ट्रीय आवश्यक दवाओं की सूची में शामिल निर्धारित दवाओं के लिए कीमत नियंत्रण की व्यवस्था है और National Pharmaceutical Pricing Authority यानी NPPA इसकी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन सभी दवाएं समान तरीके से मूल्य नियंत्रण के दायरे में नहीं आतीं। इसी कारण गैर-अनुसूचित दवाओं की कीमत और मार्जिन को लेकर भी पारदर्शिता का प्रश्न उठता रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की चिंता का एक महत्वपूर्ण पहलू निजी अस्पतालों की इन-हाउस फार्मेसी से भी जुड़ा है। सुनवाई के दौरान अदालत ने ऐसे आरोपों पर सवाल उठाया कि कुछ अस्पताल मरीजों को अपनी या निर्धारित फार्मेसी से ही दवा खरीदने के लिए कहते हैं और बाहर से दवा लेने पर उपचार को लेकर अलग शर्तें रखी जाती हैं। यदि ऐसा होता है तो मरीज के पास कीमत की तुलना करने का विकल्प सीमित हो जाता है। गंभीर बीमारी से जूझ रहा मरीज पहले ही मानसिक, शारीरिक और आर्थिक दबाव में होता है।
हालांकि, हर निजी अस्पताल या हर दवा कंपनी को एक ही नजर से देखना उचित नहीं होगा। दवा की कीमत में अनुसंधान, उत्पादन, गुणवत्ता नियंत्रण, पैकेजिंग, परिवहन, भंडारण, वितरण और अन्य लागतें भी शामिल हो सकती हैं। अस्पतालों पर उपचार, चिकित्सकीय सेवाओं, बुनियादी ढांचे और मरीज की सुरक्षा से जुड़ी अतिरिक्त लागतें भी होती हैं। इसलिए जरूरी है कि कीमतों में अंतर का आकलन पूरे आपूर्ति तंत्र और वास्तविक लागत के आधार पर किया जाए। स्वास्थ्य क्षेत्र के प्रतिनिधियों ने भी कीमतों में पारदर्शिता की जरूरत स्वीकार करते हुए एक समान मार्जिन व्यवस्था के संभावित प्रभावों पर अलग दृष्टिकोण रखा है।
सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के संदर्भ में यह मुद्दा और महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि किसी मरीज का इलाज सरकारी योजना के तहत हो रहा है और दवाओं का भुगतान सार्वजनिक धन से होता है, तो दवाओं की कीमत में अनावश्यक वृद्धि का असर केवल मरीज पर नहीं, बल्कि सरकारी खजाने और अंततः करदाताओं पर भी पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इसी पहलू पर भी चिंता जताई है।
सबसे जरूरी सुधार पारदर्शिता का है। मरीज को दवा की एमआरपी, उपलब्ध वैकल्पिक ब्रांड, जहां संभव हो वहां कम कीमत वाले विकल्प और अस्पताल द्वारा लगाए जा रहे अतिरिक्त शुल्क की स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए। यदि किसी विशेष कारण से अस्पताल की फार्मेसी से ही दवा लेना आवश्यक बताया जाता है तो उसका कारण भी मरीज को समझाया जाना चाहिए। सरकारी योजनाओं में दवाओं की कीमत और प्रतिपूर्ति की नियमित ऑडिट व्यवस्था को भी प्रभावी बनाया जा सकता है।
सस्ती दवा का अर्थ केवल कम कीमत वाला ब्रांड उपलब्ध कराना नहीं है। दवा की गुणवत्ता, प्रभावशीलता और विश्वसनीयता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जेनेरिक दवाओं को बढ़ावा देने के साथ डॉक्टर, फार्मासिस्ट और मरीज के बीच स्पष्ट सूचना व्यवस्था जरूरी है, ताकि मरीज को कम कीमत वाले विकल्प की जानकारी भी मिले और उसकी गुणवत्ता को लेकर अनावश्यक भ्रम भी न रहे।
गंभीर बीमारी के समय व्यक्ति की निर्णय लेने की स्वतंत्रता भी कई बार सीमित हो जाती है। मरीज और परिवार डॉक्टर पर भरोसा करते हैं और इलाज को किसी भी कीमत पर जारी रखना चाहते हैं। इसलिए जीवनरक्षक दवाओं के मूल्य निर्धारण में मरीज की आर्थिक क्षमता और स्वास्थ्य सेवा की वास्तविक लागत—दोनों के बीच संतुलन जरूरी है।
₹2,700 और ₹27,000 के बीच का अंतर केवल कीमत का अंतर नहीं है। किसी गरीब परिवार के लिए यह अंतर इलाज जारी रखने और इलाज छोड़ने के बीच खड़ा हो सकता है। किसी मध्यमवर्गीय परिवार के लिए यही अंतर बचत खत्म होने, कर्ज लेने या संपत्ति बेचने की मजबूरी पैदा कर सकता है। इसलिए दवा मूल्य निर्धारण की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें उद्योग की वैध लागत और मरीज की वहन क्षमता, दोनों को ध्यान में रखा जाए।
सुप्रीम कोर्ट की हालिया सुनवाइयों ने दवाओं की कीमत, अस्पतालों की फार्मेसी व्यवस्था और मरीजों के हित से जुड़े सवालों को फिर सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है। अब जरूरत ऐसी स्पष्ट और पारदर्शी व्यवस्था की है जिसमें दवा की कीमत तय होने से लेकर मरीज तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया पर प्रभावी निगरानी हो, अस्पतालों की बिलिंग स्पष्ट हो, सरकारी योजनाओं में सार्वजनिक धन का विवेकपूर्ण उपयोग हो और मरीज को उचित कीमत पर गुणवत्तापूर्ण दवा उपलब्ध हो।
दवा बीमारी से लड़ने का साधन है। इसलिए उसकी कीमत और मरीज के इलाज के बीच ऐसा संतुलन होना चाहिए, जिसमें स्वास्थ्य सेवा की लागत और मरीज के हित—दोनों की स्पष्ट जगह हो।
—डॉ. प्रियंका सौरभ


