Wednesday, July 15, 2026

देखो माई, रथ बैठे जगदीश…

भारतीय संस्कृति की लोकआस्था, समरसता और भक्ति का अद्भुत महापर्व

उदयपुर | शाबाश इंडिया।

भारतीय संस्कृति में उत्सव केवल तिथियों का क्रम नहीं, बल्कि लोकजीवन की आत्मा होते हैं। प्रत्येक पर्व अपने भीतर अध्यात्म, दर्शन, लोकपरंपरा और सांस्कृतिक चेतना का विराट स्वरूप समेटे रहता है। इन्हीं महोत्सवों में भगवान श्रीजगन्नाथ की रथयात्रा विश्व की उन अद्वितीय धार्मिक परंपराओं में शामिल है, जहां ईश्वर स्वयं अपने भक्तों के बीच आने का संदेश देते हैं।

जब विशाल रथों पर आरूढ़ भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं, तब करोड़ों भक्तों के हृदय से सहज ही स्वर फूट पड़ता है—“देखो माई, रथ बैठे जगदीश।”

‘जगन्नाथ’ अर्थात सम्पूर्ण जगत के नाथ और ‘जगदीश’ अर्थात संसार के ईश्वर। उड़ीसा के पवित्र श्रीक्षेत्र पुरी में विराजमान भगवान जगन्नाथ केवल एक मंदिर के देवता नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के आराध्य हैं। उनकी महिमा जाति, वर्ग, भाषा और सम्प्रदाय की सीमाओं से परे लोकमंगल और सार्वभौमिक समरसता के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित है।

भगवान श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्रा के रूप में प्रतिष्ठित यह दिव्य त्रयी भारतीय भक्ति परंपरा का अनुपम वैभव है। जगन्नाथ मंदिर की विशेष परंपराओं में काष्ठ निर्मित श्रीविग्रह विश्वभर में अद्वितीय माने जाते हैं। भारतीय पंचांग के अनुसार जब अधिक आषाढ़ अर्थात पुरुषोत्तम मास का संयोग आता है, तब ‘नवकलेवर’ की परंपरा के अंतर्गत वैदिक विधानों से नए विग्रहों का निर्माण और प्रतिष्ठा की जाती है। यह केवल विग्रह परिवर्तन नहीं, बल्कि जीवन, परिवर्तन और अनश्वर चेतना का आध्यात्मिक संदेश है।

ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को ‘स्नान यात्रा’ अथवा ‘ज्येष्ठाभिषेक’ के अवसर पर भगवान का सार्वजनिक महाअभिषेक किया जाता है। इसके पश्चात मान्यता है कि भगवान सांकेतिक विश्राम करते हैं और लगभग पंद्रह दिनों तक ‘अनवसर’ काल रहता है। इस अवधि में भक्त प्रभु के पुनः दर्शन की प्रतीक्षा को भी साधना के रूप में अनुभव करते हैं।

आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन यह प्रतीक्षा आनंदोत्सव में बदल जाती है और विश्वविख्यात श्रीजगन्नाथ रथयात्रा प्रारंभ होती है। भारतीय संस्कृति में यात्रा केवल स्थान परिवर्तन नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नयन, लोकसंपर्क और धर्मप्रचार का माध्यम रही है। भगवान जब स्वयं रथ पर आरूढ़ होकर भक्तों के बीच आते हैं, तो यह संदेश देते हैं कि ईश्वर किसी एक स्थान तक सीमित नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि के संरक्षक हैं।

पुरी में प्रतिवर्ष तीन विशाल काष्ठ निर्मित रथ तैयार किए जाते हैं। भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष, बलभद्र का तालध्वज और सुभद्रा का दर्पदलन रथ अपनी विशिष्ट संरचना और धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध हैं। अक्षय तृतीया से प्रारंभ होने वाली निर्माण प्रक्रिया धार्मिक अनुशासन और परंपराओं के अनुसार पूरी की जाती है। जब लाखों श्रद्धालु इन रथों की रस्सियां खींचते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो संपूर्ण मानवता एक सूत्र में बंध गई हो।

रथयात्रा का गंतव्य गुंडिचा मंदिर होता है, जहां भगवान कुछ समय विश्राम करते हैं। इसके बाद वापसी यात्रा को बहुदा यात्रा कहा जाता है। इस उत्सव का विशेष आकर्षण छेरा पहरा अनुष्ठान है, जिसमें पुरी के गजपति महाराज स्वर्णमंडित झाड़ू से रथों के सामने मार्ग की सफाई करते हैं। यह परंपरा संदेश देती है कि ईश्वर के समक्ष सभी समान हैं और सेवा का भाव सर्वोपरि है।

भगवान जगन्नाथ की परंपराओं में ज्येष्ठ मास की चंदन यात्रा भी महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यह उत्सव भगवान को शीतलता प्रदान करने और भक्तों के प्रेम का प्रतीक माना जाता है। इसमें ऋतु, प्रकृति और भक्ति का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

जगन्नाथ संस्कृति का प्रभाव केवल उड़ीसा तक सीमित नहीं है। गुजरात से लेकर राजस्थान तक यह परंपरा समान श्रद्धा के साथ जीवंत है। उदयपुर में आयड़ स्थित गंगेश्वर कुंड के इस्कॉन मंदिर, सेक्टर-7 स्थित जगन्नाथ मंदिर तथा ऐतिहासिक जगदीश चौक स्थित श्रीजगदीश मंदिर से भव्य रथयात्राएं निकलती हैं। विशेष रूप से जगदीश चौक से निकलने वाली रजत रथयात्रा उदयपुर की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है।

इस अवसर पर भगवान जगन्नाथ अपने दिव्य स्वरूपों सहित रजत रथ में विराजमान होकर नगर भ्रमण करते हैं और हजारों श्रद्धालु दर्शन, सेवा एवं कीर्तन का लाभ प्राप्त करते हैं। यह आयोजन केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि लोकआस्था, सामाजिक सहभागिता और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।

राजस्थान की वैष्णव परंपरा में रथयात्रा का एक विशेष सांस्कृतिक पक्ष भी है। वर्षा ऋतु के स्वागत के साथ मंदिरों में राग मल्हार के स्वर गूंजने लगते हैं। भक्ति संगीत वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है और भारतीय संगीत एवं अध्यात्म के अद्भुत संबंध को दर्शाता है।

संस्कृतिविद मनोहरलाल मूंदड़ा के अनुसार जगन्नाथ परंपरा का प्रभाव पुष्टिमार्ग में भी दिखाई देता है। महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्य ने भगवान की सेवा में चावल के भोग की परंपरा को विशेष महत्व दिया। जगन्नाथ धाम में आज भी प्रतिदिन भगवान को चावल का महाभोग अर्पित किया जाता है। यह भारतीय धार्मिक परंपराओं की विविधता में छिपी एकात्मता का सुंदर उदाहरण है।

वास्तव में श्रीजगन्नाथ की रथयात्रा यह संदेश देती है कि धर्म का सार केवल पूजा-अर्चना में नहीं, बल्कि सेवा, समरसता, समानता और लोककल्याण में निहित है। भगवान स्वयं रथ पर आकर भक्तों को विनम्रता, प्रेम और सेवा का मार्ग दिखाते हैं।

जब नगर की गलियों में रथ के पहिए आगे बढ़ते हैं, शंखनाद गूंजता है, मृदंग और झांझ की ध्वनि वातावरण को भक्ति से भर देती है और लाखों कंठों से स्वर उठता है—“देखो माई, रथ बैठे जगदीश”—तब यह केवल उद्घोष नहीं रहता, बल्कि भारतीय संस्कृति की सनातन चेतना, लोकविश्वास और ईश्वर के प्रति अटूट समर्पण का अमर संदेश बन जाता है।

रिपोर्ट: कौशल मूंदड़ा

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