महंत श्री भरतमुनि उदासीन जी महाराज ने भक्ति, समभाव और संस्कारों का महत्व बताया
ऐलनाबाद | शाबाश इंडिया।

सनातन धर्मशाला, ऐलनाबाद में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिवस कथा व्यास महंत श्री भरतमुनि उदासीन जी महाराज ने श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कंध का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए भगवान कपिल मुनि के दिव्य उपदेशों का महत्व बताया।
महाराज श्री ने कहा कि भगवान कपिल द्वारा माता देवहूति को दिया गया ज्ञान संपूर्ण आध्यात्मिक जीवन का सार है। उन्होंने बताया कि यदि मनुष्य अपने मन को भगवान के चरणों में स्थिर कर ले, तो वह सांसारिक दुखों से मुक्त होकर परम शांति प्राप्त कर सकता है। भगवान ने सभी प्राणियों में अपने स्वरूप का दर्शन करने, प्रेम, करुणा और समभाव रखने का संदेश दिया है। यही सच्ची भक्ति का मार्ग है।
कथा के दौरान महाराज श्री ने द्वितीय स्कंध में वर्णित शुकदेव जी के उपदेशों का स्मरण कराते हुए कहा कि प्रत्येक माता को सुमति के समान संस्कारवान बनना चाहिए, जिससे समाज को सुसंस्कृत, पराक्रमी एवं भगवत्भक्त संतानों की प्राप्ति हो सके।
राजा पृथु के आदर्श शासन का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि राजा का प्रथम कर्तव्य अपनी प्रजा के कल्याण के लिए कार्य करना है। शासन का उद्देश्य जनता के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि स्थापित करना होना चाहिए।
पंचम स्कंध के प्रसंगों में राजा प्रियव्रत, ऋषभदेव, भरत एवं जड़ भरत के जीवन चरित्र पर प्रकाश डालते हुए महाराज श्री ने कहा कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी मनुष्य उच्च आध्यात्मिक अवस्था प्राप्त कर सकता है। जड़ भरत के जीवन से वैराग्य, आत्मज्ञान और संसार की नश्वरता का संदेश मिलता है।
षष्ठ स्कंध के अजामिल प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान का नाम अत्यंत प्रभावशाली है। जीवन में किसी भी स्थिति में यदि मनुष्य सच्चे हृदय से भगवान का स्मरण करे और संतों का सान्निध्य प्राप्त करे, तो उसका कल्याण निश्चित है।
कथा के समापन पर श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से भगवान का संकीर्तन किया तथा महंत श्री भरतमुनि उदासीन जी महाराज से आशीर्वाद प्राप्त किया। कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर धर्मलाभ प्राप्त किया।


