ऐलनाबाद (हरियाणा)। शाबाश इंडिया।

सनातन धर्मशाला में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के दौरान कथा व्यास महंत श्री भरतमुनि उदासीन जी महाराज ने द्वितीय स्कंध का भावपूर्ण वर्णन करते हुए राजा परीक्षित के अंतिम समय में किए गए ध्यान और भगवान के स्मरण की महिमा का विस्तार से वर्णन किया।
गुरुदेव महाराज ने कहा कि जब मनुष्य को जीवन की वास्तविकता का बोध हो जाता है, तब उसे सांसारिक मोह-माया का त्याग कर भगवान की भक्ति और ध्यान में मन लगाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मृत्यु जीवन का अटल सत्य है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को समय रहते प्रभु नाम का स्मरण, सत्संग और ध्यान का अभ्यास करना चाहिए।
कथा के दौरान महाराज श्री ने बताया कि राजा परीक्षित ने मृत्यु का समय निकट जानकर सभी सांसारिक चिंताओं का त्याग कर गंगा तट पर आसन ग्रहण किया और श्री शुकदेव जी महाराज से श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करते हुए अपना संपूर्ण चित्त भगवान श्रीहरि में लगा दिया। यही सच्चा ध्यान है, जो मनुष्य को जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति का मार्ग दिखाता है।
उन्होंने कहा कि ध्यान का अर्थ केवल आंखें बंद करना नहीं, बल्कि मन को भगवान के चरणों में स्थिर करना है। जब मन भगवान के नाम, स्वरूप, गुण और लीलाओं में एकाग्र हो जाता है, तभी वास्तविक शांति और आत्मिक आनंद की अनुभूति होती है।
महंत श्री भरतमुनि उदासीन जी महाराज ने कहा कि श्रीमद्भागवत हमें जीवन के प्रत्येक क्षण को प्रभु भक्ति और आत्मकल्याण के लिए समर्पित करने की प्रेरणा देती है। कथा के समापन पर श्रद्धालुओं ने भक्ति भाव से भगवान का संकीर्तन किया और गुरुदेव महाराज का आशीर्वाद प्राप्त किया।


