Sunday, June 7, 2026

पेड़ पौधे भी अपना कर्म फल भोग रहे हैं : आचार्य श्री सुनील सागर जी

जयपुर। अरावली की पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा हुआ है ,यह जयपुर शहर जहां भट्टरकजी की नसियां में वर्षा योग काल के समय को अपने संघ सहित व्यतीत कर रहे हैं। आचार्य श्री सुनील सागर गुरुदेव। आज प्रातः नसियां जी में गुरुदेव के श्री मुख से भगवान जिनेंद्र के कलशाभिषेक के मंत्रोच्चार उच्चारित हुए, श्रावको ने जय जयकार करते हुए भगवान के अभिषेक को देखा, गुरुदेव के मुख से शांति मंत्रों का उच्चारण हुआ और संपूर्ण जगत के समस्त जीवो की शांति की कामना की गई। उक्त जानकारी देते हुए चातुर्मास व्यवस्था समिति के प्रचार मंत्री रमेश गंगवाल ने बताया सन्मति सुनील सभागार में श्रीमती इंदिरा जी बड़जात्या के मंगलाचरण एवं श्री महावीर दिगंबर जैन मंदिर, हरी मार्ग सिविल लाइंस ,एवं श्री दिगंबर जैन मंदिर चित्रकूट सांगानेर से पधारे हुए अतिथि गणों के द्वारा चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन सेआज की धर्म सभा का शुभारंभ हुआ। चातुर्मास व्यवस्था समिति के मुख्य संयोजक रूपेंद्र छाबड़ा एवं राजेश गंगवाल ने बताया की धर्म सभा में दिल्ली से पधारे राजेंद्र अंकित महेंद्र जैन ने अपने परिवार सहित पूज्य पाद गुरुदेव के चरणों की प्रक्षाल की और अपने जीवन को सार्थक किया ।चातुर्मास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष देव प्रकाश खंडाका ने बताया सभी पधारे हुए अतिथियों का एवं दिल्ली से पधारे हुए महानुभावों का चातुर्मास व्यवस्था समिति के मुकेश जैन ब्रह्मपुरी ,अजय पाटोदी, राजेंद्र पापडीवाल तथा बीना शाह ने तिलक और माल्यार्पण कर अभिनंदन स्वागत किया। चातुर्मास व्यवस्था समिति के महामंत्री ओमप्रकाश काला ने बताया पूज्य गुरुदेव ने अपने कल्याणी वाणी से सभी जीवो के कल्याण का उपदेश देते हुए कहा जग में सचर अचर जितने है सारे कर्म निरत हैं, धुन एक न एक सबको, सबके निश्चित व्रत हैं, जीवन भर आतप वसुधा पर, छाया करता है, तुच्छ पत्र की भी स्वकर्म में यह कैसी तत्परता है । गुरुदेव बोले आत्मार्थीयों सचर अचर जितने भी प्राणी हैं सभी स्वकर्म में लीन हैं अर्थात प्रकृति के विभिन्न रूप स्वकर्म में तल्लीन हैं ,सभी का एक निश्चित संकल्प है ,एक निश्चित धुन है । जैन शास्त्रों में तीन तरह की चेतना बताई गई है कर्म फल चेतना आदि,कर्म फल भोगना ही है। पेड़ पौधे कर्म फल को भोग रहे हैं जो जीव संसार चला रहे हैं पर वे संसार चला नहीं रहे बना रहे हैं जीव को संसार बढाना नहीं, घटाने की सोचना चाहिए, कर्म चेतना वाले लोग भी बहुत हैं कुछ ना कुछ करते रहते हैं लेकिन ज्ञान चेतना वाले बहुत कम हैं हम ज्ञान चेतना वाले बने । कम से कम सम्यक दृष्टि तो बने जो लोग पदार्थ को देखकर प्रभावित हो रहे हैं उन्हें चाहिए कि पर पदार्थों में सुख न माने ,सच्चा सुख अपनी आत्मा में है बाहरी सुख में हम सच्चा सुख मान रहे हैं। फैशन के नाम पर प्लास्टिक का उपयोग और उसी में खुशी मना रहे हैं, सोने चांदी के पात्रों में भोजन करने वाले लोग आज दरिद्रता को निमंत्रण खुद ही दे रहे हैं। समाज संस्कृति की मर्यादा को बनाए रखें, नए कर्म के आश्रव बंध से बचें, बहू बेटियों को चाहिए अपने धर्म समाज और संस्कृति की मर्यादा को अक्षुण्ण रखें।

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