
विशेष आलेख | शाबाश इंडिया।
8 अक्टूबर 2026 को प्रेमचंद जी की 90वीं पुण्यतिथि पर विशेष
हिंदी साहित्य के महान कथाकार और उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की लेखनी ने भारतीय जनजीवन, विशेषकर गांव, कस्बों, गरीबों, किसानों, श्रमिकों, महिलाओं और समाज के वंचित वर्गों की वास्तविक तस्वीर को साहित्य के केंद्र में स्थापित किया। उनकी कहानियां और उपन्यास केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहे, बल्कि उन्होंने सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वास, रूढ़िवादिता, शोषण, गरीबी, ऊंच-नीच और मानवीय संवेदनाओं पर समाज को सोचने के लिए मजबूर किया।
प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के निकट लमही गांव में हुआ था। उनका वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। उनके पिता का नाम अजायबराय और माता का नाम आनंदी देवी था। साहित्य की दुनिया में वे पहले ‘नवाबराय’ नाम से लिखते थे और बाद में ‘प्रेमचंद’ नाम से प्रसिद्ध हुए। 8 अक्टूबर 1936 को 56 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।
प्रेमचंद की साहित्यिक यात्रा उस दौर में आगे बढ़ी, जब भारत सामाजिक और राजनीतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा था। जातिवाद, छुआछूत, ऊंच-नीच, अंधविश्वास, सांप्रदायिक संकीर्णता, आर्थिक शोषण और महिलाओं की स्थिति जैसे अनेक प्रश्न समाज के सामने थे। प्रेमचंद ने इन समस्याओं को दूर से देखने के बजाय अपने पात्रों और कथानकों के माध्यम से उन्हें जीवन की वास्तविक परिस्थितियों से जोड़कर प्रस्तुत किया।
उनकी लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने साहित्य को कल्पनालोक से निकालकर आम आदमी की जमीन पर खड़ा किया। उनकी कहानियों में गांव की मिट्टी की खुशबू, किसान की पीड़ा, गरीब की मजबूरी, परिवारों का संघर्ष और इंसानी रिश्तों की गर्माहट दिखाई देती है। उन्होंने लोकभाषा, कहावतों, मुहावरों और ग्रामीण जीवन की सहज भाषा का प्रभावी इस्तेमाल किया, जिससे उनके पात्र पाठकों के बेहद करीब महसूस होते हैं।
प्रेमचंद ने लगभग 300 से अधिक कहानियां और अनेक महत्वपूर्ण उपन्यास लिखे। उनकी चर्चित कहानियों में ‘पंच परमेश्वर’, ‘ठाकुर का कुआं’, ‘पूस की रात’, ‘दो बैलों की कथा’, ‘कफन’, ‘बड़े भाई साहब’, ‘बूढ़ी काकी’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘नमक का दरोगा’, ‘ईदगाह’ और ‘मंत्र’ प्रमुख हैं। वहीं ‘सेवासदन’, ‘प्रेमाश्रम’, ‘रंगभूमि’, ‘निर्मला’, ‘गबन’, ‘कर्मभूमि’ और ‘गोदान’ जैसे उपन्यास हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर माने जाते हैं। उनका अंतिम उपन्यास ‘मंगलसूत्र’ अधूरा रह गया।
उनकी रचना ‘सोजे वतन’ को ब्रिटिश शासन के दौरान जब्त कर लिया गया था। इस घटना के बाद उनकी लेखकीय पहचान और भी व्यापक हुई। हिंदी के साथ-साथ उर्दू में भी उन्होंने प्रभावशाली लेखन किया। पत्रकारिता और संपादन के क्षेत्र में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने ‘हंस’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका के प्रकाशन-संपादन के माध्यम से साहित्यिक पत्रकारिता को नई दिशा दी।
प्रेमचंद की कहानियों में मानवीय मूल्यों की गहरी उपस्थिति दिखाई देती है। ‘पंच परमेश्वर’ में जुम्मन शेख और अलगू चौधरी के माध्यम से उन्होंने न्याय और निष्पक्षता की शक्ति को सामने रखा। ‘ईदगाह’ में छोटे से हामिद के चरित्र के माध्यम से गरीबी, त्याग और दादी के प्रति प्रेम को जिस संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया गया, वह आज भी पाठकों के मन को छूता है। ‘मंत्र’ में उन्होंने यह संदेश दिया कि पेशे और पैसे का अहंकार किसी भी व्यक्ति को नहीं करना चाहिए।
‘गोदान’ प्रेमचंद के साहित्य का ऐसा महत्वपूर्ण पड़ाव है, जिसमें ग्रामीण जीवन, किसान की गरीबी, शोषण, सामाजिक विषमता और रूढ़िवादी व्यवस्था का मार्मिक चित्रण मिलता है। होरी का चरित्र भारतीय किसान के संघर्ष और विवशता का प्रतीक बनकर सामने आता है। इसी तरह ‘निर्मला’ में उन्होंने स्त्री जीवन और सामाजिक कुरीतियों के प्रश्नों को उठाया।
प्रेमचंद केवल सामाजिक समस्याओं के चित्रकार नहीं थे, बल्कि वे मानवीय मूल्यों और सामाजिक परिवर्तन के समर्थक भी थे। उनके साहित्य में हिंदू-मुस्लिम एकता, न्याय, समानता, स्त्री सम्मान, श्रम की गरिमा और इंसानियत जैसे मूल्यों को विशेष स्थान मिला। उनके नाटक ‘कर्बला’ में भी सांप्रदायिक सद्भाव और एकता की भावना दिखाई देती है।
उनके साहित्य को व्यापक पहचान मिली और बंगला के प्रसिद्ध उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें ‘उपन्यास सम्राट’ कहकर संबोधित किया। यह संबोधन उनके साहित्यिक कद और उपन्यास लेखन में उनके विशिष्ट योगदान का प्रमाण माना जाता है।
प्रेमचंद का साहित्य आज भी इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि जिन सामाजिक सवालों को उन्होंने अपनी रचनाओं में उठाया, उनमें से अनेक प्रश्न अलग-अलग रूपों में आज भी हमारे सामने दिखाई देते हैं। गरीबी, सामाजिक असमानता, शोषण, स्त्री सम्मान, किसान की समस्याएं और मानवीय संवेदनाएं आज भी समाज के महत्वपूर्ण विषय हैं।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने सामान्य मनुष्य को साहित्य का नायक बनाया। उनकी रचनाओं में बड़े-बड़े महलों से अधिक महत्व उस किसान की झोपड़ी का है, उस मजदूर की जिंदगी का है, उस बच्चे की भावनाओं का है और उस महिला के संघर्ष का है, जिसकी आवाज अक्सर समाज में दब जाती थी।
प्रेमचंद ने साहित्य को केवल शब्दों का संसार नहीं माना, बल्कि उसे समाज को आईना दिखाने का माध्यम बनाया। उनकी कलम ने गांवों और कस्बों के जीवन को आवाज दी, सामाजिक रूढ़ियों पर सवाल उठाए और पाठकों को अपने आसपास की वास्तविकता को नए नजरिए से देखने के लिए प्रेरित किया।
आज उनकी 90वीं पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना केवल एक महान साहित्यकार को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उनके साहित्य में मौजूद मानवीय मूल्यों, सामाजिक चेतना और इंसानियत के संदेश को समझना भी है। प्रेमचंद का साहित्य समय की सीमाओं से परे है। उनकी रचनाएं आज भी पढ़ी जाती हैं, समझी जाती हैं और नई पीढ़ियों को समाज तथा मनुष्य को बेहतर ढंग से देखने की दृष्टि देती हैं।
निस्संदेह, प्रेमचंद हिंदी साहित्य के ऐसे हिमालय हैं, जिनकी रचनात्मक ऊंचाई को कुछ पन्नों में समेट पाना संभव नहीं। उनकी कलम ने जनजीवन को शब्द दिए और समाज की सच्चाइयों को साहित्य की अमर धरोहर बना दिया। उनकी पुण्यतिथि पर महान साहित्यकार को शत-शत नमन।

— प्रो. डॉ. राजीव सक्सेना
वरिष्ठ होम्योपैथ, आचार्य एवं होम्योपैथिक चिकित्सक
वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार


