
उदयपुर | शाबाश इंडिया।
न ईंट-पत्थरों की दीवारें, न कोई राजसी ठाठ-बाट… फिर भी ऐसे किले, जिनकी हर आकृति में आस्था और हर रेखा में लोक संस्कृति की सदियों पुरानी कहानी दिखाई देती है। मेवाड़ के अनूठे लोकपर्व संजा के अंतिम पड़ाव पर बारस के दिन गुरुवार को उदयपुर के कई घर-आंगन गोबर से बने खूबसूरत ‘किला कोट’ से सज उठे। इनके साथ लोकगीतों की मिठास में संजा बाई की विदाई की आहट भी सुनाई दी।
श्राद्ध पक्ष के साथ शुरू हुए इस पारंपरिक लोकपर्व में सुबह से ही बालिकाओं और युवतियों का उत्साह देखने को मिला। किसी ने गोबर से किले की प्राचीर उकेरी, तो किसी ने संजा बाई की डोली सजाई। कहीं सूरज-चांद की आकृतियां उभरीं, तो कहीं लोकजीवन से जुड़े प्रतीकों ने आंगन की दीवारों को जीवंत कर दिया।
सवीना निवासी रेणु माली वर्षों से संजा मांडने की परंपरा निभा रही हैं। उन्होंने बताया कि किला कोट के मध्य संजा बाई की विदाई के प्रतीक स्वरूप डोली अथवा रथ बनाया जाता है। बिंदी, रंगीन कागज, नथ और चूड़ियों से संजा बाई का शृंगार किया जाता है।
इसके चारों ओर सूरज, चांद, चौपड़, जनेऊ, बंधनवार, अष्टफुल, नगाड़े की जोड़, पत्तल-दोने, छाछ बिलोना, छाबड़ी, स्वस्तिक, सप्तऋषि और डोकरा-डोकरी जैसी आकृतियां उकेरी जाती हैं। उभरे हुए परकोटे से घिरा यह किला लोकविश्वास में परिवार की सुरक्षा, सुख और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
सांझ ढलते ही किला कोट के आसपास बालिकाओं की टोलियां जुटीं और लोकगीतों के सुर गूंजने लगे—
‘छोटी सी ग्यारस, मोटो-मोटो किला कोट,
किला कोट में बैठी म्हारी संजा बाई,
रेणु, यशी, टिया करे थारी आरती…’
लोकगीतों के बीच संजा बाई की आरती उतारी गई और विदाई के भाव से माहौल भावुक हो उठा। अब सर्वपितृ अमावस्या पर संजा का नदी अथवा तालाब में विसर्जन किया जाएगा।
मिट्टी की सौंधी महक, गोबर की कलात्मक आकृतियां और बेटियों के कंठ से फूटते लोकस्वर मानो यही संदेश दे रहे थे कि परंपराएं केवल किताबों में नहीं, बल्कि पीढ़ियों के हाथों और घर-आंगन की दीवारों पर भी जीवंत रहती हैं।
रिपोर्ट: राकेश शर्मा ‘राजदीप’


