
उदयपुर | शाबाश इंडिया।
शाम ने जब सुनहरी चादर समेटकर रात की आग़ोश में कदम रखा, तो उदयपुर की फ़िज़ाओं में मोहब्बत, यादों और एहसासों की ऐसी सुरमयी ख़ुशबू बिखरी कि श्रोता जैसे कुछ पल के लिए वक्त की सीमाओं से परे चले गए। कहीं इश्क़ के तराने गूंजे, कहीं जुदाई की कसक ने आंखें नम कीं और कहीं जिंदगी के फ़लसफ़े को ग़ज़ल के अल्फ़ाज़ में महसूस किया गया।
ग़ज़ल अकादमी, उदयपुर की ओर से गुरुवार को अशोका ग्रीन पैलेस में आयोजित ‘एहसास-ए-ग़ज़ल’ संगीत संध्या में पद्मभूषण जगजीत सिंह की अमर संगीत विरासत को शहर के युवा और अनुभवी फ़नकारों ने सुरों की नज़राना-ए-अक़ीदत पेश की। हर नग़मा श्रोताओं के दिल के किसी न किसी अनछुए कोने को छूता रहा।
महफ़िल का आग़ाज़ निधि शर्मा शाह ने ‘तुमको देखा तो ये ख़याल आया’ और ‘प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है’ से किया। उनकी आवाज़ में मोहब्बत की मिठास ने माहौल को रूमानी बना दिया। डॉ. अरविंद आशिया ने ‘होठों से छू लो तुम’ और ‘कौन आएगा यहां, कोई न आया होगा’ के जरिए तन्हाई और चाहत की कशिश को जीवंत किया।
भूपेंद्र पंवार ने ‘आहिस्ता-आहिस्ता’ और ‘मुझसे बिछड़कर ख़ुश रहते हो’ की पुरअसर अदायगी से श्रोताओं की दाद बटोरी, वहीं विशाल राठौड़ ने ‘झुकी-झुकी सी नज़र’ और ‘चांद के साथ कई दर्द पुराने निकले’ से महफ़िल में जज़्बातों के नए रंग घोल दिए।
मनीषा पंवार ने चित्रा सिंह की ग़ज़लों ‘दर्द बढ़कर फ़ुग़ां न हो जाए’ और ‘आए हैं समझाने लोग’ को अपनी दिलकश आवाज़ में पेश किया तो श्रोता भी सुरों के हमसफ़र बन गए। मारीशा दीक्षित ने मिर्ज़ा ग़ालिब की ‘दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है’ और ‘किसी रंजिश को हवा दो’ से अदब और शायरी की रवानी पेश की, जिस पर महफ़िल देर तक वाह-वाह से गूंजती रही।
ग़ज़लों के रूमानी सफर ने अंत में भक्ति की रूहानी राह पकड़ ली। सुमित मंडल और हिमांक गांधर्व ने जगजीत सिंह के प्रसिद्ध भजनों ‘अंबे चरणकमल हैं तेरे’ और ‘हर-हर महादेव’ की प्रस्तुति देकर माहौल को भक्तिरस में डुबो दिया। देवी वंदना ने नवरात्रि की आध्यात्मिक भावना को स्वर दिया और दोनों की जुगलबंदी पर देर तक तालियां गूंजती रहीं।
महफ़िल की खास बात यह रही कि इसमें प्रस्तुति देने वाले कई ग़ज़ल गायक अकादमी के संरक्षक डॉ. प्रेम भंडारी के शागिर्द रहे हैं। अपने गुरु के सामने सुरों का हुनर पेश कर कलाकारों ने उनकी दाद और आशीर्वाद भी पाया।
विजय धांधड़ा की सारंगी, हरिओम तिवारी के हारमोनियम, दीपेश गांधर्व के ऑक्टोपैड, हर्षवर्धन के तबले और राजू राजस्थानी के कीबोर्ड ने प्रस्तुतियों में सुरों की खूबसूरत रवानी और गहराई जोड़ दी।
अकादमी अध्यक्ष डॉ. जे.के. तायलिया ने कहा कि जगजीत सिंह की संगीत विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना और उदीयमान फ़नकारों को मंच उपलब्ध कराना अकादमी का संकल्प है। इस अवसर पर संरक्षक डॉ. प्रेम भंडारी, कोषाध्यक्ष सुभाष मेहता, पूर्व संभागीय आयुक्त राजेंद्र भट्ट और डॉ. जे.के. तायलिया ने कलाकारों को उपरणा ओढ़ाकर सम्मानित किया। सचिव डॉ. देवेंद्र सिंह हिरन ने आभार व्यक्त किया, जबकि संचालन रश्मीत कौर ने किया।
रात ढली, साज़ ख़ामोश हुए और महफ़िल भी उठ गई, लेकिन फ़िज़ाओं में जगजीत सिंह की यादें देर तक तैरती रहीं। जैसे सुरों की यह शाम एक बार फिर कह गई कि ग़ज़ल सिर्फ सुनी नहीं जाती, बल्कि दिल की गहराइयों में उम्रभर महसूस की जाती है।
रिपोर्ट/फोटो: राकेश शर्मा ‘राजदीप’


