Sunday, October 4, 2026

गुरु मिलना सौभाग्य, उनकी सीख को जीवन में उतारना ही सच्चा शिष्यत्व : साध्वी सुबोधीजी एवं चिंतनश्रीजी

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भीलवाड़ा | शाबाश इंडिया।

जीवन में रास्ते अनेक मिल सकते हैं, लेकिन सही दिशा गुरु से मिलती है। गुरु का महत्व केवल ज्ञान देने तक सीमित नहीं, बल्कि मनुष्य की दृष्टि बदलकर उसे अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने में है। परिस्थितियां और ग्रहों की दशाएं प्रतिकूल हो सकती हैं, लेकिन गुरु का सानिध्य मिल जाए तो जीवन की दिशा बदल सकती है। गुरु बाहर का रास्ता दिखाते हुए अंततः भीतर स्थित ‘आत्मगुरु’ से परिचय कराते हैं। ये विचार साध्वी सुबोधीजी एवं साध्वी चिंतनश्रीजी ने शांति भवन में श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी के 60वें जन्मोत्सव के तृतीय दिवस आयोजित जन्मोत्सव सभा में व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि ‘गुरु’ केवल दो अक्षरों का शब्द नहीं, बल्कि अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाने वाली शक्ति है। राहु-केतु का प्रभाव हो या जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियों का दौर, समर्थ गुरु उनसे भागना नहीं, बल्कि सही दृष्टि के साथ उनका सामना करना सिखाते हैं। गुरु केवल शब्दों का अर्थ नहीं बताते, बल्कि जीवन का अर्थ समझने की दृष्टि देते हैं। संसार में बहुत कुछ हासिल कर लेने के बाद भी सही दिशा के अभाव में मनुष्य भटक सकता है और गुरु उसी भटकाव के बीच लक्ष्य का बोध कराते हैं।

गुरु-शिष्य संबंध की व्याख्या करते हुए साध्वीवृंद ने कहा कि गुरु मिलना सौभाग्य है, लेकिन उस सौभाग्य को सार्थक करना शिष्य के समर्पण पर निर्भर करता है। गुरु के चरण पकड़ने का अर्थ केवल श्रद्धा प्रकट करना नहीं, बल्कि अहंकार को छोड़कर उनकी सीख को जीवन में स्वीकार करना है। गुरु द्वार दिखा सकते हैं, लेकिन उसमें प्रवेश शिष्य को स्वयं करना होता है। श्रद्धा जब आचरण में उतरती है, तभी गुरु से मिली दिशा आत्मकल्याण का मार्ग बनती है।

युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी के जीवन प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आचार्य आनन्द ऋषिजी के प्रति उनका समर्पण गुरु-शिष्य संबंध की प्रेरक मिसाल है। गुरु से मिले संस्कारों को उन्होंने केवल स्मृतियों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि साधना और जीवन में उतारकर आगे बढ़ाया। इसी गुरु-संस्कार की यात्रा में वर्ष 2015 में उन्हें युवाचार्य पद से अलंकृत किया गया। गुरु का नाम लेना श्रद्धा है, लेकिन उनके संस्कारों को अपने जीवन से आगे बढ़ाना ही सच्चा शिष्यत्व है।

जन्मोत्सव सभा से पूर्व युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी एवं संत-साध्वीवृंद के सानिध्य में ‘पुच्छिस्सुणं संपुट’ का सामूहिक जाप हुआ। इसमें बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने सहभागिता कर आराधना की।

श्रीसंघ अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद चीपड़ ने बताया कि दोपहर में तप कौमुदी साध्वी वैभवश्रीजी की उग्र 34 उपवास की तपस्या की अनुमोदना में सकलेचा परिवार की ओर से भव्य चौबीसी आयोजित की गई। यशोदीप्ति मधुकंवरजी, उपप्रवर्तिनी दिव्यज्योतिजी, महासती सुचेताजी, स्मितभाषी पियूषदर्शनाजी सहित साध्वीवृंद के सानिध्य में आयोजित चौबीसी में शहर के विभिन्न महिला मंडलों की बहनों ने तप अनुमोदना के मंगल गीत प्रस्तुत किए।

युवाचार्यश्री के 60वें जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में सेवा और जीवदया के क्रम में नवरतनमल बंब एवं राजेश-राकेश बंब परिवार की ओर से गौशाला में गायों को लापसी एवं चारा खिलाकर जीवदया की गई।

चातुर्मास संयोजक कंवरलाल सूरिया ने बताया कि जन्मोत्सव के चतुर्थ दिवस रविवार को श्री महावीर युवक मंडल सेवा संस्थान की ओर से शांतिभवन में रक्तदान शिविर आयोजित किया जाएगा। दोपहर में धार्मिक अंताक्षरी होगी, जबकि शाम को मुंबई के प्रसिद्ध गायक कलाकार विराग मधुमालती भक्ति संध्या में भजनों की प्रस्तुति देंगे।

उन्होंने बताया कि सोमवार को युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी का 60वां जन्मोत्सव मुख्य समारोह आयोजित होगा। इसमें देश के विभिन्न क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालुओं और गुरुभक्तों के भीलवाड़ा पहुंचने की संभावना है। मुख्य समारोह को लेकर शांतिभवन में व्यापक स्तर पर तैयारियां की जा रही हैं।

प्रवक्ता: सुनील चपलोत

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