Saturday, October 3, 2026

फिशर इन रेक्टम: दर्द, रक्तस्राव और कब्ज से जुड़ी समस्या को समझें

विशेष आलेख | शाबाश इंडिया।

फिशर इन रेक्टम (Anal Fissure), जिसे सामान्य भाषा में गुदा में फिशर कहा जाता है, गुदा की अंदरूनी त्वचा में होने वाली एक छोटी-सी दरार या चीरा है। मल त्याग के समय इसमें तेज, चुभने या कटने जैसा दर्द हो सकता है और कई बार ताजा, चमकीला लाल रक्त भी दिखाई देता है। यह समस्या बच्चों और वयस्कों दोनों में हो सकती है। कब्ज और कठोर मल इसके सामान्य कारणों में शामिल हैं।

प्रमुख लक्षण

फिशर में मल त्याग करते समय तेज दर्द या जलन हो सकती है। मल त्याग के बाद भी कुछ समय तक दर्द बना रह सकता है। टॉयलेट पेपर या मल पर चमकीला लाल खून दिखाई देना, गुदा के आसपास खुजली या जलन और गुदा की मांसपेशियों में ऐंठन भी इसके लक्षण हो सकते हैं। लंबे समय तक समस्या रहने पर गुदा के किनारे छोटी त्वचा की गांठ भी बन सकती है।

दर्द के डर से व्यक्ति मल त्याग को रोकने लगता है, जिससे कब्ज बढ़ सकती है और समस्या का चक्र बना रह सकता है।

प्रमुख कारण

कब्ज और कठोर मल फिशर के प्रमुख कारणों में हैं। मल त्याग के दौरान अधिक जोर लगाने, लंबे समय तक दस्त रहने या बार-बार कब्ज और दस्त होने से भी गुदा की त्वचा में चोट लग सकती है। कुछ महिलाओं में प्रसव के बाद भी यह समस्या हो सकती है। गुदा क्षेत्र में चोट या बार-बार जलन तथा कुछ आंतों की बीमारियां भी इसके कारण हो सकती हैं। असामान्य या बार-बार होने वाले फिशर में अन्य संभावित कारणों की चिकित्सकीय जांच आवश्यक हो सकती है।

फिशर के प्रकार

समय के आधार पर फिशर को मुख्य रूप से दो प्रकारों में समझा जाता है। एक्यूट फिशर हाल में शुरू हुआ होता है और उचित देखभाल के साथ कुछ सप्ताह में ठीक हो सकता है। वहीं क्रोनिक फिशर लंबे समय तक बना रह सकता है या बार-बार हो सकता है।

स्थान के आधार पर पीछे की ओर होने वाला पोस्टीरियर फिशर सबसे सामान्य है। आगे की ओर होने वाला एंटीरियर फिशर भी हो सकता है। गुदा के किनारे पर एक से अधिक या असामान्य स्थानों पर फिशर दिखाई दे तो डॉक्टर अन्य बीमारियों की संभावना की जांच कर सकते हैं।

जांच कैसे होती है?

अधिकांश मामलों में डॉक्टर लक्षणों और गुदा क्षेत्र की जांच के आधार पर फिशर का निदान कर सकते हैं। आवश्यकता होने पर डिजिटल रेक्टल एग्जामिनेशन, एनास्कोपी या प्रोक्टोस्कोपी जैसी जांच की जा सकती है। बार-बार या अधिक रक्तस्राव होने अथवा अन्य लक्षण मौजूद होने पर डॉक्टर कोलोनोस्कोपी या अन्य जांच की सलाह दे सकते हैं।

यदि दर्द बहुत अधिक हो तो जांच सावधानीपूर्वक की जाती है।

बचाव और सावधानियां

कब्ज से बचना फिशर की रोकथाम और उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पर्याप्त पानी पिएं और भोजन में फाइबर की मात्रा बढ़ाएं। सब्जियां, फल और साबुत अनाज को आहार में शामिल करें। मल त्याग की इच्छा को न रोकें और टॉयलेट में अधिक देर तक बैठने या बहुत जोर लगाने से बचें। नियमित हल्की शारीरिक गतिविधि भी लाभकारी हो सकती है।

गुनगुने पानी में 10–15 मिनट बैठने से कई लोगों को दर्द और मांसपेशियों की ऐंठन में राहत मिल सकती है। गुदा क्षेत्र को साफ रखें, लेकिन अत्यधिक रगड़ने या सुगंधित साबुन के इस्तेमाल से बचें।

उपचार

फिशर के उपचार में सबसे पहले कब्ज को नियंत्रित करना और मल को नरम रखना महत्वपूर्ण होता है। इसके लिए पर्याप्त पानी, फाइबर और आवश्यकता के अनुसार डॉक्टर द्वारा सुझाए गए मल को नरम करने वाले उपाय अपनाए जा सकते हैं। जरूरत पड़ने पर चिकित्सक दर्द या फिशर को ठीक करने में मदद करने वाली दवाएं भी दे सकते हैं।

पुराना या बार-बार होने वाला फिशर सामान्य उपायों से ठीक न हो तो विशेषज्ञ चिकित्सक से उपचार लेना जरूरी है। कुछ मामलों में विशेष दवाओं या सर्जरी की आवश्यकता भी पड़ सकती है।

होम्योपैथिक उपचार के संबंध में

फिशर के उपचार में होम्योपैथी की प्रभावशीलता को सिद्ध करने वाले मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए लगातार दर्द, रक्तस्राव या पुराने फिशर में केवल होम्योपैथिक दवाओं पर निर्भर रहना उचित नहीं है। ऐसे मामलों में विशेषज्ञ चिकित्सक से जांच और प्रमाणित उपचार लेना महत्वपूर्ण है।

होम्योपैथिक पद्धति में चिकित्सक व्यक्ति के लक्षणों के आधार पर अलग-अलग औषधियों का चयन कर सकते हैं। कुछ चिकित्सकों द्वारा ऐसिड नाइट्रिकम, रेटानिया, ऐस्कुलस, ऐलो, कल्केरिया फ्लोर, ग्रेफाइटिस, हेमामेलिस, हाइड्रैस्टिस, इग्नेशिया, मर्क सोल, नेट्रम म्यूर, पियोनिया, साइलीशिया और थूजा जैसी औषधियों का उपयोग किया जाता है। हालांकि, इनमें से किसी भी दवा को फिशर ठीक करने वाली प्रमाणित दवा के रूप में बताना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है।

कब तुरंत डॉक्टर को दिखाएं?

यदि रक्तस्राव अधिक हो, दर्द बहुत ज्यादा हो, बुखार या सूजन हो, पस दिखाई दे, कपड़े बार-बार रक्त या स्राव से खराब हों, या समस्या बार-बार होती रहे तो चिकित्सक से जांच कराना जरूरी है।

— डॉ. एम.एल. जैन ‘मणि’
एम.ए., बी.एम.एस. (होम्योपैथिक), पीएच.डी.
अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त वरिष्ठ होम्योपैथ एवं पूर्व शैक्षणिक सदस्य, होम्योपैथिक विश्वविद्यालय, जयपुर

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