Tuesday, September 29, 2026

वर्णी जी ने जलाई शिक्षा की ऐसी ज्योति, जो आज भी दे रही ज्ञान का प्रकाश

ललितपुर | शाबाश इंडिया।

भारतीय संस्कृति के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका जीवन किसी एक संस्था, समाज अथवा सम्प्रदाय तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा, प्रकाश और पाथेय बन जाता है। गणेशप्रसाद जी वर्णी ऐसा ही विलक्षण व्यक्तित्व थे। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए शिक्षा की ऐसी अलख जगाई, जिसकी ज्योति आज भी प्राच्य विद्याओं, जैन दर्शन तथा संस्कृत-प्राकृत अध्ययन के क्षेत्र में दिखाई देती है। साधारण परिस्थितियों में जन्म लेकर असाधारण ऊंचाइयों को प्राप्त करने वाले वर्णी जी का जीवन आत्मबल, ज्ञान-पिपासा, त्याग, तप, सेवा और अजातशत्रुता का अद्भुत समन्वय था।

गणेशप्रसाद जी वर्णी का जन्म आश्विन कृष्ण चतुर्थी, सन् 1874 में उत्तर प्रदेश के ललितपुर जनपद के हँसेरा ग्राम में हुआ। उनका प्रारंभिक जीवन सामान्य ग्रामीण परिवेश में बीता, लेकिन उनके भीतर ज्ञान प्राप्त करने की ऐसी प्रबल जिज्ञासा थी, जिसने उन्हें निरंतर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उनकी धर्ममाता चिरोंजाबाई अत्यंत धर्मपरायण और त्यागमयी महिला थीं। जीवन में अनेक अवसर ऐसे आए, जब उनके लिए सांसारिक सुविधाएं सहज रूप से उपलब्ध हो सकती थीं, किंतु उन्होंने वैभव और संपत्ति के आकर्षण से स्वयं को सदैव दूर रखा। लाखों की संपत्ति सुलभ होने पर भी उसका मोह न करना उनके निर्लोभ व्यक्तित्व का परिचायक था।

वर्णी जी के जीवन की सबसे बड़ी विशेषताओं में उनकी अदम्य ज्ञान-पिपासा प्रमुख थी। धर्म और समाज के नाम पर प्रचलित रूढ़ियों ने उनके भीतर धर्म के वास्तविक स्वरूप को जानने की तीव्र आकांक्षा उत्पन्न की। संस्कृत और प्राच्य विद्याओं के अध्ययन के लिए उन्होंने मुंबई, खुर्जा, जयपुर, मथुरा सहित अनेक नगरों की यात्राएं कीं। कई बार उन्हें हजारों मील पैदल चलना पड़ा। आर्थिक कठिनाइयों और सामाजिक उपेक्षा का सामना करने के बावजूद ज्ञान की साधना में उनके कदम कभी नहीं रुके।

अध्ययन की इसी अनवरत यात्रा ने उन्हें काशी पहुंचाया। उस समय काशी भारतीय ज्ञान-परंपरा की प्रमुख भूमि थी। वहां अध्ययन करते हुए उन्हें अनेक विपरीत परिस्थितियों और अपमानजनक अनुभवों से गुजरना पड़ा, लेकिन उन्होंने प्रतिकूलताओं को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। यही दृढ़ता आगे चलकर एक महान शैक्षणिक प्रयास का आधार बनी।

सन् 1905 में उन्होंने काशी में श्री स्याद्वाद महाविद्यालय की स्थापना का संकल्प लिया। साधन सीमित थे, किंतु संकल्प विराट था। प्रथम दान के रूप में प्राप्त मात्र एक रुपये से उन्होंने 64 पोस्टकार्ड खरीदे और समाज के श्रेष्ठियों तथा विद्याप्रेमी लोगों को पत्र लिखकर सहयोग का आह्वान किया। यह प्रसंग इस बात का प्रेरक उदाहरण है कि महान कार्यों के लिए साधनों से अधिक आवश्यक संकल्प और पुरुषार्थ होता है।

आगे चलकर स्याद्वाद महाविद्यालय जैन दर्शन, न्याय, व्याकरण, संस्कृत, प्राकृत और प्राच्य विद्याओं के अध्ययन-अध्यापन का महत्वपूर्ण केंद्र बना। वहां से शिक्षा प्राप्त करने वाले अनेक विद्वानों ने जैन साहित्य और दर्शन के प्रचार-प्रसार में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।

वर्णी जी भली-भांति समझते थे कि किसी समाज की वास्तविक उन्नति केवल आर्थिक संसाधनों से नहीं, बल्कि शिक्षा से होती है। उनका विश्वास था कि सत्शिक्षा मनुष्य को विवेक प्रदान करती है और विवेक ही समाज को उन्नति की दिशा देता है। इसी दृष्टि से उन्होंने नगरों के साथ-साथ गांवों को भी अपना कार्यक्षेत्र बनाया।

उनकी प्रेरणा और सत्प्रयासों से बुंदेलखंड सहित अनेक स्थानों पर पाठशालाएं, विद्यालय, महाविद्यालय, छात्रावास और गुरुकुल स्थापित हुए। साढ़ूमल, ललितपुर, बरुआसागर, सागर, द्रोणगिरि, आहारजी, मड़ावरा, मलहरा, पटनागंज, शाहपुर, जबलपुर, कटनी, नैनागिर और पपौरा जी सहित अनेक क्षेत्रों में शिक्षा की संस्थाएं विकसित हुईं। बुंदेलखंड के बाहर भी उनकी प्रेरणा से जैन गुरुकुल हस्तिनापुर, कुन्दकुन्द कॉलेज खतौली, महिला महाविद्यालय गया तथा दिल्ली, फिरोजाबाद, इटावा, सहारनपुर आदि स्थानों पर शैक्षणिक गतिविधियों को गति मिली।

वर्णी जी का योगदान केवल संस्थाओं की स्थापना तक सीमित नहीं था। उन्होंने जैन दर्शन, न्याय, साहित्य, व्याकरण, संस्कृत, प्राकृत और अन्य प्राच्य विद्याओं के अध्ययन-अध्यापन को प्रोत्साहित किया। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में जैन विद्या के अध्ययन से संबंधित पाठ्यक्रम प्रारंभ कराने में भी उनकी भूमिका का उल्लेख मिलता है। इस प्रकार उन्होंने शिक्षा को केवल व्यक्तिगत उन्नति का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति और ज्ञान-परंपरा के संरक्षण का माध्यम बनाया।

वर्णी जी के जीवन में णमोकार मंत्र का विशेष स्थान रहा। जीवन में आए संकटों और कठिन परिस्थितियों के बीच इस महामंत्र के प्रति उनकी आस्था और अधिक दृढ़ होती गई। इसी प्रकार पद्मपुराण के अध्ययन से प्रभावित होकर उन्होंने रात्रिभोजन का त्याग किया। यह परिवर्तन दर्शाता है कि उनके लिए धर्म केवल विचार अथवा वाणी का विषय नहीं था, बल्कि जीवन-व्यवहार में उतरने वाली साधना था।

वे न्यायाचार्य बने, लेकिन ज्ञान और सम्मान के शिखर पर पहुंचकर भी अहंकार से दूर रहे। उन्होंने जीवन में त्याग और संयम को महत्व दिया तथा आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत धारण किया। सन् 1947 में उन्होंने श्रावक के उत्कृष्ट व्रतस्वरूप ग्यारह प्रतिमा धारण की और अपने जीवन को अधिकाधिक आध्यात्मिक अनुशासन की ओर अग्रसर किया।

वर्णी जी का जीवन कथनी और करनी की एकरूपता का जीवंत उदाहरण था। उन्होंने जिस बात को सत्य माना, उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास किया। शिक्षा की बात की तो स्वयं कठिनाइयों के बीच शिक्षा प्राप्त की, समाजोद्धार की बात की तो गांव-गांव जाकर शिक्षण संस्थाओं के निर्माण की प्रेरणा दी, त्याग की बात की तो स्वयं वैभव से दूर रहे और धर्म की बात की तो उसे जीवनचर्या में उतारा। यही कारण है कि उनका व्यक्तित्व केवल उपदेशक का नहीं, बल्कि कर्मयोगी का बन गया।

वर्णी जी की दयालुता, निर्लोभता, दृढ़ता और त्याग जितने प्रेरक हैं, उससे भी अधिक विलक्षण उनकी अजातशत्रुता थी। जीवन भर संघर्ष करने वाले इस महापुरुष के मन में किसी के प्रति द्वेष का भाव नहीं रहा। ‘दोष से घृणा करो, दोषी से नहीं’ के आदर्श को उनके जीवन में देखा जा सकता है। उन्होंने विरोध को व्यक्ति-विरोध नहीं बनने दिया। वे विचारों की शुचिता के पक्षधर थे, लेकिन व्यक्ति के प्रति करुणा और सद्भाव बनाए रखते थे।

वर्णी जी का राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पण भी उल्लेखनीय था। जबलपुर में आयोजित एक सभा में उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के सेनानियों की सहायता के लिए अपनी चादर तक समर्पित कर दी। उस चादर की बोली से प्राप्त तीन हजार रुपये की राशि स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े प्रयासों के लिए समर्पित की गई। यह प्रसंग बताता है कि उनका त्याग केवल धार्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं था, बल्कि राष्ट्र और समाज के प्रति उनकी संवेदना भी गहरी थी।

वर्णी जी के व्यक्तित्व का प्रभाव उनके समकालीन अनेक महापुरुषों पर भी पड़ा। आचार्य विनोबा भावे ने उन्हें अपना अग्रज मानकर उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया और उनके चरण स्पर्श किए। यह प्रसंग वर्णी जी के व्यापक नैतिक प्रभाव और स्वीकार्यता को रेखांकित करता है।

आज संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, जैन दर्शन और भारतीय प्राच्य विद्याओं के अध्ययन-अध्यापन के लिए जो वातावरण दिखाई देता है, उसकी पृष्ठभूमि तैयार करने वालों में गणेशप्रसाद वर्णी का स्थान महत्वपूर्ण है। उन्होंने उस समय प्राच्य विद्याओं के संरक्षण की चिंता की, जब आधुनिक शिक्षा की धारा में इन विषयों के लिए पर्याप्त स्थान नहीं था। वे समझते थे कि यदि अपनी भाषा, साहित्य, दर्शन और ज्ञान-परंपरा से समाज का संबंध टूट गया, तो उसकी सांस्कृतिक पहचान भी कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए उन्होंने शिक्षा के माध्यम से संस्कृति की जड़ों को सींचने का कार्य किया।

गणेशप्रसाद जी वर्णी की 150वीं जन्मजयंती समारोह वर्ष में वर्णी विकास संस्थान समिति के तत्वावधान में वर्षभर अनेक आयोजन हुए। उनकी जन्मभूमि हँसेरा में वर्णी स्मारक का निर्माण तथा उनकी प्रतिमा की स्थापना भी उनकी स्मृति को स्थायी रूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास रहा है।

वर्णी जी को वास्तविक श्रद्धांजलि तभी होगी, जब उनके शिक्षा-संकल्प, त्याग, स्वाध्याय, सामाजिक समरसता और प्राच्य विद्याओं के संरक्षण के कार्य को आगे बढ़ाया जाए। जिन संस्थाओं को उन्होंने अपने पुरुषार्थ से खड़ा किया, उनका संरक्षण और संवर्धन सामूहिक जिम्मेदारी है।

पूज्य गणेशप्रसाद जी वर्णी को मैंने प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखा, लेकिन उनकी आत्मकथा ‘मेरी जीवन गाथा’ पढ़ते हुए उनके विशाल और अद्भुत व्यक्तित्व से गहरे प्रभावित हुआ हूं। मेरे लिए यह केवल किसी महापुरुष का जीवन पढ़ने का अनुभव नहीं, बल्कि अपने जीवन की जड़ों को पहचानने जैसा है।

मेरा सौभाग्य रहा है कि मैंने अपनी शिक्षा पूज्य गणेशप्रसाद जी वर्णी द्वारा स्थापित विद्यालयों और छात्रावासों में ही पूर्ण की। आज मैं जो कुछ भी हूं, उसमें इन संस्थाओं और उनके द्वारा निर्मित शैक्षिक वातावरण का महत्वपूर्ण योगदान है। इसलिए वर्णी जी के प्रति मेरा संबंध केवल श्रद्धा का नहीं, बल्कि कृतज्ञता का भी है।

हम सभी के ऊपर वर्णी जी का बड़ा ऋण है। उन्होंने अपने जीवन का अर्जन समाज को लौटा दिया। उन्होंने ज्ञान पाया तो ज्ञान बांटा, अनुभव पाया तो संस्थाएं खड़ी कीं और जीवन पाया तो उसे समाज एवं संस्कृति के लिए समर्पित कर दिया।

आज उनकी जयंती पर आवश्यकता इस बात की है कि हम केवल उनके जीवन का स्मरण न करें, बल्कि उनके जीवन-संदेश को अपने आचरण का हिस्सा बनाएं। शिक्षा को सेवा मानें, संस्कृति को जिम्मेदारी समझें, ज्ञान को बांटें और अर्जन के साथ विसर्जन की भावना विकसित करें।

वर्णी जी ने बहुत कुछ दिया,
हम भी तो कुछ देना सीखें।
बनें कृतज्ञ, कृतघ्न नहीं,
अर्जन के साथ विसर्जन सीखें।।

—डॉ. सुनील जैन ‘संचय’

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