
जयपुर | शाबाश इंडिया।
भट्टारक जी की नसियां में वर्षायोग प्रवासरत उपाध्याय ऊर्जयन्त सागर जी मुनिराज के पावन सान्निध्य में रविवारीय विशेष प्रवचन श्रृंखला के तहत प्रवचन सभा का आयोजन जैन भवन में किया गया। कार्यक्रम में विदुषी प्रो. (डॉ.) सुषमा सिंघवी ने ‘दुखी होना पाप है’ विषय पर सरल एवं प्रभावी ढंग से विचार रखे।
प्रो. सुषमा सिंघवी ने कहा कि व्यक्ति को वर्तमान में जीना चाहिए और स्वयं के भीतर जीने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि दूसरों से अपनी तुलना करने से दुख बढ़ता है। इच्छाओं की पूर्ति से स्थायी सुख नहीं मिलता, बल्कि स्वयं के भीतर उतरने और ‘प्राप्त को पर्याप्त मानने’ में ही संतोष एवं सुख की अनुभूति होती है।
इससे पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी डॉ. एन.के. खींचा ने प्रो. सुषमा सिंघवी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से सभा को परिचित कराया।
सभा को संबोधित करते हुए उपाध्याय ऊर्जयन्त सागर जी ने कहा कि शिक्षा किताबों से मिल सकती है, लेकिन ज्ञान अनुभव से ही प्राप्त होता है। उन्होंने विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से विषय की सूक्ष्मता को समझाते हुए जीवन में आने वाली समस्याओं के समाधान बताए।
वर्षायोग समिति के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता सुधांशु कासलीवाल, महामंत्री सुखानंद जैन एवं सुभाष जौहरी ने अतिथियों का तिलक एवं माला पहनाकर स्वागत-सम्मान किया।
कार्यक्रम का दीप प्रज्वलन प्रकाश चंद चोरुवाले, अनिला छाबड़ा, पूनम ठोलिया, दौलत फागीवाला एवं मनीष बैद ने किया। मंगलाचरण जितेंद्र जैन (जीतू) ने प्रस्तुत किया। सभा का संचालन मुख्य संयोजक रुपेन्द्र छाबड़ा ने किया।


