
भीलवाड़ा | शाबाश इंडिया।
जिनशासन का परम सौभाग्य है कि उसे आचार्य आनंद ऋषिजी महाराज और मालवकेसरी सौभाग्यमुनिजी महाराज जैसी युगप्रभावी विभूतियाँ प्राप्त हुईं। इन महापुरुषों का व्यक्तित्व संयोग नहीं, बल्कि संयम, स्वाध्याय, गुरु-निष्ठा और कठोर साधना की तपश्चर्या का परिणाम था। यही कारण है कि उनका जीवन आज भी संघ, समाज और नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा, पुरुषार्थ और समर्पण का अक्षय स्रोत बना हुआ है। यह विचार श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी ने गुरुआनंद जन्मोत्सव के नवदिवसीय कार्यक्रम के अंतर्गत शांतिभवन में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए।
युवाचार्यश्री ने कहा कि आचार्य आनंद ऋषिजी महाराज के जीवन की दिशा बाल्यावस्था में ही संत-सान्निध्य से निर्धारित हो गई थी। माता हुल्सा देवी की प्रेरणा से बालक नेमीचंद गुरु रत्न ऋषिजी महाराज के पास प्रतिक्रमण सीखने पहुंचे। उनकी विलक्षण प्रतिभा, अध्ययनशीलता और ज्ञान-पिपासा से प्रभावित होकर गुरु ने उन्हें आगम, पच्चीस बोल सहित अनेक ग्रंथों का अध्ययन कराया।
उन्होंने कहा कि ज्ञान केवल कंठस्थ करने से सार्थक नहीं होता, बल्कि निरंतर अभ्यास, मनन और आत्मसात करने से वह जीवन का संस्कार बनता है। महान आचार्यों की स्मरणशक्ति और व्यक्तित्व के पीछे सतत अध्ययन और अनुशासन की साधना रही है। दूरदर्शी गुरु वही होता है, जो शिष्य के भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानकर उसे सही दिशा प्रदान करे।
युवाचार्यश्री ने बताया कि बालक नेमीचंद ने अल्पायु में ही दीक्षा की इच्छा व्यक्त की। गुरु ने उनकी दृढ़ता की परीक्षा लेते हुए माता की अनुमति लाने को कहा। प्रारंभिक असहमति के बाद जब गुरु ने माता से कहा कि यह बालक केवल आपका पुत्र नहीं, बल्कि जिनशासन का उज्ज्वल भविष्य है, तब उन्होंने सहर्ष दीक्षा की अनुमति प्रदान की। उन्होंने कहा कि गुरु का निर्णय केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरे जिनशासन के भविष्य से जुड़ा होता है।
उन्होंने कहा कि आचार्य आनंद ऋषिजी का जीवन गुरु-निष्ठा, अनुशासन, संयम और स्वाध्याय की सजीव मिसाल था। अध्ययन के प्रति उनकी अद्भुत लगन और जीवनभर सीखते रहने की प्रवृत्ति ने उन्हें युगप्रभावी आचार्य बनाया।
युवाचार्यश्री ने मालवकेसरी सौभाग्यमुनिजी महाराज का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने वात्सल्य, संगठन, विनम्रता और साधर्मिक समर्पण से जिनशासन को नई ऊर्जा प्रदान की। उनका जीवन यह संदेश देता है कि वास्तविक नेतृत्व अधिकार से नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और आत्मीय व्यवहार से स्थापित होता है।
उन्होंने कहा कि जिनशासन को ऐसे महापुरुष मिले, जिन्होंने अपने संयम, तप, स्वाध्याय और आत्मपुरुषार्थ से संघ को स्थायी दिशा और आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान की। उनका जीवन आज भी समाज के लिए प्रेरणापुंज है।
सभा से पूर्व साध्वी चिंतनश्रीजी ने कहा कि परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि मनःस्थिति और परिणामों का परिवर्तन ही जीवन की दिशा बदलता है। वास्तविक आनंद आत्मपरिवर्तन से प्राप्त होता है और परम आनंद मोक्ष में निहित है।
शांतिभवन के मंत्री नवरतनमल भलावत ने बताया कि धर्मसभा के दौरान 8, 5, 3, 2 एवं 1 उपवास सहित आनंद सिद्धीतप की आराधना में संलग्न 175 तपस्वियों ने युवाचार्यश्री से आयंबिल तप के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। धर्मसभा में भीलवाड़ा सहित महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु समेत विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।


