Sunday, July 19, 2026

‘जिन्दा रहना, जिन्दा लगना और जिन्दा होना’ में है बड़ा अंतर : अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज

पुष्पगिरी | शाबाश इंडिया।

पुष्पगिरी। पुष्पगिरी तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज के सानिध्य में अंतर्मना आचार्य 108 श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय 108 श्री पियूष सागरजी महाराज ससंघ वर्षायोग के लिए पुष्पगिरी में विराजमान हैं। उनके सानिध्य में प्रतिदिन विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।इसी क्रम में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि “जिन्दा रहना, जिन्दा लगना और जिन्दा होना—इन तीनों अवस्थाओं में बहुत बड़ा अंतर है।” उन्होंने कहा कि व्यक्ति तभी वास्तव में जीवित रहता है, जब उसका जीवन प्रेम, सेवा, दान, परोपकार और त्याग जैसे मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण हो। ऐसा व्यक्ति न केवल जीवनकाल में सम्मान पाता है, बल्कि मृत्यु के बाद भी लोगों के हृदय में अपनी स्मृतियों के रूप में जीवित रहता है।आचार्य श्री ने कहा कि इच्छा और उत्साह के बिना जीया गया जीवन केवल “जिन्दा लगने” जैसा है। जब व्यक्ति स्वयं से या अपने संबंधों से हार जाता है, तब वह केवल सांसें तो लेता है, लेकिन जीवन का वास्तविक आनंद खो देता है। उन्होंने कहा कि जैसे एक सार्थक दिन सुखद नींद देता है, वैसे ही सार्थक जीवन सुखद मृत्यु का मार्ग प्रशस्त करता है।उन्होंने आगे कहा कि “जिन्दा होना” का अर्थ है जिन्दादिल बनकर समाज, सेवा, करुणा, परोपकार, सद्भाव, प्रेम, उदारता, भक्ति, समर्पण और विश्वास के कार्यों में अग्रणी रहना। जो व्यक्ति अपने सद्कर्मों से लोगों के हृदय में स्थान बना लेता है, वही सच्चे अर्थों में जीवन को सार्थक बनाता है।आचार्य श्री के प्रेरणादायी प्रवचनों से उपस्थित श्रद्धालुओं ने आध्यात्मिक प्रेरणा प्राप्त करते हुए मानव जीवन को सेवा, सदाचार और आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर करने का संकल्प लिया।यह जानकारी प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पियूष कासलीवाल (औरंगाबाद) ने दी।

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