
ललितपुर | शाबाश इंडिया।
दशलक्षण महापर्व, नौवां दिन, 24 सितंबर पर विशेष
संसार की भीड़ में रहते हुए भी आत्मा की एकाकी यात्रा को पहचानना ही आकिंचन्य का मर्म है।
पर्यूषण पर्व के अंतर्गत दशलक्षण महापर्व का नौवां दिन उत्तम आकिंचन्य धर्म की आराधना को समर्पित है। मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह जीवनभर ‘मैं’ और ‘मेरे’ के घेरे को विस्तृत करता रहता है, जबकि जीवन की अंतिम यात्रा उसे यह सत्य समझाकर जाती है कि आत्मा की यात्रा अंततः अकेली है। आकिंचन्य धर्म इसी शाश्वत सत्य का बोध कराता है।
जीवन की यात्रा नदी की तरह है। नदी किसी की प्रतीक्षा नहीं करती और किसी पड़ाव को अपना स्थायी घर नहीं मानती। वह निरंतर बहती हुई अंततः सागर में समा जाती है। उसी प्रकार आत्मा को भी संसार के संबंधों, वस्तुओं और परिग्रहों के बीच रहते हुए अपने वास्तविक स्वरूप की ओर बढ़ना है। जब ‘मैं’ और ‘मेरेपन’ की दीवारें गिरती हैं, तभी आत्मा की अनंत सत्ता का अनुभव संभव होता है।
आकिंचन्य का अर्थ केवल बाहरी वस्तुओं का त्याग नहीं है। वस्तुएं छोड़ देने के बाद भी यदि मन में उनके प्रति ममत्व बना रहे तो भीतर का परिग्रह समाप्त नहीं होता। वास्तविक आकिंचन्य तब है, जब बाहरी परिग्रह के साथ-साथ भीतर के संकल्प-विकल्प, मोह और ममत्व भी शांत होने लगें। ‘यह मेरा है’, ‘यह मेरे लिए है’ और ‘मेरे बिना यह कैसे होगा’ जैसी धारणाएं आत्मा को संसार के बंधनों में और कसती जाती हैं।
जिस प्रकार पर्वत की चोटी तक पहुंचने के लिए अनावश्यक भार छोड़ना पड़ता है, उसी प्रकार आत्मा की ऊर्ध्वगामी यात्रा के लिए मोह-ममता का भार उतारना आवश्यक है। जितना अधिक मन ‘मेरा’ के बोझ से भरा होगा, उतना ही वह आत्मस्वरूप की ऊंचाइयों से दूर रहेगा।
संसार में रहना है, संसार को अपना नहीं बनाना
आकिंचन्य संसार से पलायन की शिक्षा नहीं देता। गृहस्थ अपने परिवार, समाज और कर्तव्यों के बीच रहे, लेकिन भीतर यह बोध बनाए रखे कि कोई भी वस्तु, संबंध अथवा शरीर स्थायी रूप से उसका नहीं है। सांझ होते ही पक्षी एक वृक्ष पर आकर विश्राम करते हैं और सुबह होते ही अपनी-अपनी दिशाओं में उड़ जाते हैं। संसार में हमारे संबंध भी कुछ ऐसे ही हैं—साथ हैं, इसलिए उनका सम्मान और निर्वाह आवश्यक है, किंतु उन्हें शाश्वत मान लेना मोह का कारण बन जाता है।
मृत्यु के समय शरीर को तो चार लोग कंधा दे सकते हैं, लेकिन आत्मा की यात्रा में कोई दूसरा साथ नहीं चल सकता। यही जीवन का गहरा सत्य है। इसलिए आकिंचन्य हमें बाहरी भीड़ के बीच भीतर के एकांत से परिचित कराता है।
“आप अकेला अवतरे, मरे अकेला होय।
यूं कबहूं इस जीव का, साथी सगा न कोय।।“
ये पंक्तियां हमें भयभीत करने के लिए नहीं, बल्कि जीवन की वास्तविकता से परिचित कराने के लिए हैं। जब यह समझ विकसित होती है कि अंतिम यात्रा में परिग्रह, पद, प्रतिष्ठा और संग्रह साथ नहीं जाएंगे, तब जीवन की प्राथमिकताएं स्वतः बदलने लगती हैं।
आज मनुष्य वस्तुओं का स्वामी कम और वस्तुओं का संरक्षक अधिक बन गया है। घर बड़ा होता जा रहा है, संग्रह बढ़ता जा रहा है, इच्छाएं विस्तृत होती जा रही हैं, लेकिन भीतर का संतोष सिकुड़ता जा रहा है। उत्तम आकिंचन्य इसी बढ़ते हुए ‘मेरेपन’ पर विराम लगाने का धर्म है।
जहां परिग्रह अधिक है, वहां चिंता भी अधिक है; जहां ममत्व अधिक है, वहां भय भी अधिक है। इसके विपरीत, जहां भीतर से ‘मेरा’ कम होता जाता है, वहां मन हल्का और आत्मा अधिक स्वतंत्र होती जाती है।
दशलक्षण का नौवां दिन हमें यह अवसर देता है कि हम स्वयं से पूछें—मैंने कितना संग्रह किया, यह महत्वपूर्ण नहीं; मैंने अपने संग्रह के प्रति कितनी आसक्ति छोड़ी, यह महत्वपूर्ण है। मैंने कितने संबंध बनाए, यह भी अंतिम सत्य नहीं; उन संबंधों में रहते हुए मैं कितना निष्पक्ष, निर्मोहमय और आत्मजागरूक रहा, यही साधना का मर्म है।
उत्तम आकिंचन्य अंततः हमें ‘मेरा’ से ‘मेरा कुछ भी नहीं’ और ‘मैं’ से ‘मैं शुद्ध आत्मा हूं’ की यात्रा पर ले जाता है। यही यात्रा संसार के शोर से आत्मा के मौन तक, परिग्रह के भार से निर्विकार हल्केपन तक और मोह की भीड़ से आत्मस्वरूप की एकाकी अनुभूति तक पहुंचाती है।
आकिंचन्य का संदेश स्पष्ट है—संसार में रहिए, अपने कर्तव्यों को निभाइए, संबंधों का सम्मान कीजिए; किंतु भीतर किसी वस्तु को अपना स्थायी आधार मत बनाइए। क्योंकि अंततः आत्मा को अपनी यात्रा स्वयं ही करनी है।
लेखक: डॉ. सुनील जैन ‘संचय’, ललितपुर
आध्यात्मिक चिंतक एवं जैनदर्शन के अध्येता


