
जयपुर | शाबाश इंडिया।
क्षमावाणी, जिसे क्षमा दिवस भी कहा जाता है, जैन धर्मावलंबियों के लिए क्षमा करने और क्षमा मांगने का महत्वपूर्ण पर्व है। दिगंबर जैन परंपरा के अनुसार यह पर्व अश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा, अर्थात दशलक्षण महापर्व के एक दिन बाद मनाया जाता है। वर्ष 2026 में क्षमावाणी पर्व 27 सितंबर, रविवार को मनाया जाएगा।
क्षमावाणी का पर्व आत्मशुद्धि, आत्मनिरीक्षण और आंतरिक शांति का प्रतीक है। क्षमा के वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए जैन आगमों एवं ग्रंथों में प्रतिपादित क्षमा के स्वरूप और महत्व को समझना आवश्यक है।
आचार्य समंतभद्र के रत्नकरण्ड श्रावकाचार में उत्तम क्षमा का स्वरूप बताते हुए कहा गया है कि मूर्खजन बाधा उत्पन्न करें, पीड़ा पहुंचाएं, क्रोधपूर्ण वचन बोलें, उपहास करें या अपमान करें, फिर भी उत्तम पुरुष के मन में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न न हो, वही उत्तम क्षमा है। अर्थात बाहरी परिस्थितियां कैसी भी हों, आत्मा के भीतर क्रोध और द्वेष को स्थान न देना ही क्षमा की वास्तविक साधना है।
रत्नकरण्ड श्रावकाचार की टीका में पं. सदासुखदासजी ने उत्तम क्षमा को तीन लोक में सार और संसार रूपी समुद्र से पार लगाने वाली भावना बताया है। इसका भाव यह है कि क्षमा केवल सामाजिक व्यवहार को मधुर बनाने का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मकल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण साधना है।
इसी ग्रंथ में क्षमा और समता के संदर्भ में यह भाव व्यक्त किया गया है कि जब व्यक्ति राग-द्वेष आदि मल से रहित अपने आत्मस्वरूप में स्थित होता है, तब कोई उसे बुरा कहे या अच्छा, उससे उसकी आत्मा को क्या प्रयोजन है। दूसरे के व्यवहार और अपनी आत्मिक शुद्धि को अलग-अलग देख पाना ही क्षमा की साधना का महत्वपूर्ण आधार है।
रत्नकरण्ड श्रावकाचार की टीका में उत्तम क्षमा को मन की उज्ज्वलता और स्थिरता का कारण बताया गया है। क्षमा करने से केवल सामने वाले के प्रति वैरभाव समाप्त नहीं होता, बल्कि स्वयं के मन का भी शोधन होता है। क्षमा के अभाव में मन की वास्तविक स्थिरता और निर्मलता प्राप्त करना कठिन है।
बारसाणुवेक्खा अर्थात द्वादशानुप्रेक्षा में भी क्षमा की इसी भावना को स्पष्ट किया गया है। क्रोध उत्पन्न करने वाले बाहरी कारण सामने उपस्थित हों, फिर भी जो तनिक भी क्रोध नहीं करता, उसके उस निर्मल भाव को क्षमा धर्म कहा गया है। इसका मूल संदेश यही है कि क्षमा का संबंध बाहरी व्यक्ति को बदलने से अधिक अपने भीतर के भावों को निर्मल करने से है।
आचार्य कुंदकुंद के प्रवचनसार की व्याख्या में राग-द्वेष आदि मल से रहित आत्मपरिणमन को धर्म का स्वरूप बताते हुए उत्तम क्षमा आदि धर्मों का उपदेश दिया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि क्षमा केवल औपचारिक क्षमायाचना नहीं, बल्कि आत्मा को राग-द्वेष और कषायों से निर्मल करने की दिशा में किया जाने वाला आध्यात्मिक पुरुषार्थ है।
आचार्य कुंदकुंद की आत्मदृष्टि में शरीर और आत्मा के भेद को भी क्षमा की साधना से जोड़ा गया है। शरीर को कोई छेदे, भेदे अथवा नष्ट कर दे, फिर भी आत्मा को कोई नष्ट नहीं कर सकता। शरीर और आत्मा के इस भेद का दृढ़ ज्ञान होने पर बाहरी पीड़ा से क्रोध और द्वेष उत्पन्न नहीं होते। यही आत्मदृष्टि क्षमा की गहरी आध्यात्मिक भूमिका को स्पष्ट करती है।
दिगंबर परंपरा के दशलक्षण धर्म में उत्तम क्षमा को प्रथम धर्म माना गया है। इसकी मूल साधना क्रोध को जीतना और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी आत्मा में समता बनाए रखना है। क्षमावाणी पर्व पर सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव सहित संपूर्ण ब्रह्मांड के किसी भी जीव के प्रति जाने-अनजाने हुए अपराध के लिए क्षमा याचना की जाती है।
जैन परंपरा में क्षमा याचना का भाव एकेंद्रिय जीवों से लेकर पंचेंद्रिय जीवों तथा चारों गतियों के जीवों तक विस्तृत माना गया है। इसमें पृथ्वीकायिक, जलकायिक, वायुकायिक, अग्निकायिक एवं वनस्पतिकायिक जीव; द्वींद्रिय, त्रींद्रिय और चतुरिंद्रिय जीव; संज्ञी-असंज्ञी पंचेंद्रिय जीव तथा नारकी, तिर्यंच, मनुष्य और देवगति के जीव शामिल हैं।
रत्नकरण्ड श्रावकाचार की टीका में उत्तम क्षमा को रत्नत्रय की साधना तथा संसार के दुःखों से मुक्ति की दिशा में सहायक बताया गया है। इस दृष्टि से क्षमा का पर्व केवल एक-दूसरे से औपचारिक रूप से क्षमा मांगने का अवसर नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण का अवसर है।
जैन दर्शन में क्षमा का सर्वोच्च रूप केवल यह कहना नहीं है कि ‘मैंने तुम्हें माफ कर दिया।’ क्षमा का वास्तविक स्वरूप इससे कहीं अधिक गहरा है—किसी ने हमारे साथ चाहे जैसा व्यवहार किया हो, हमारे भीतर उसके प्रति क्रोध, द्वेष और वैर उत्पन्न न हो। यही उत्तम क्षमा है और यही आत्मा की निर्मलता की दिशा में वास्तविक पुरुषार्थ है।

लेखक: पदम जैन बिलाला, जनकपुरी, जयपुर


