Tuesday, August 11, 2026

कविता ने छुआ मन, ग़ज़लों ने जगाए सवाल और गीतों में महकी राजस्थान की माटी

उदयपुर | शाबाश इंडिया।

रविंद्र फाइन आर्ट्स अकादमी परिसर में श्रीमती हंसा रविंद्र की मेज़बानी में ‘काव्य रश्मिका’ साहित्यिक समूह की कवि गोष्ठी आयोजित हुई। कविता, गीत, ग़ज़ल और मुक्तकों से सजी इस साहित्यिक संध्या में प्रेम, परिवार, स्त्री-विमर्श, भाषा, प्रकृति और बदलते सामाजिक मूल्यों जैसे विषयों ने विविध भावों को स्वर दिया।

शकुंतला सोनी की सरस्वती वंदना से गोष्ठी का शुभारंभ हुआ। मुख्य अतिथि सीए राजकुमार बाबेल एवं अध्यक्ष वरिष्ठ ग़ज़लकार अरुण त्रिपाठी का स्वागत किया गया। राजकुमार बाबेल ने कविता को संवेदना और उत्कृष्ट मनोभावों की अभिव्यक्ति बताते हुए राजस्थानी गीत ‘तीज त्यौहार जो आवे…’ के माध्यम से लोक-संस्कृति के रंग बिखेरे। उनकी हास्य पैरोडी ‘जय पत्नी देवी’ ने श्रोताओं को खूब गुदगुदाया।

वरिष्ठ ग़ज़लकार अरुण त्रिपाठी ने करीब 30 शेरों की ग़ज़ल प्रस्तुत कर जीवन-संघर्ष, भाषा, सामाजिक व्यवहार और मनुष्य की आंतरिक शक्ति को अभिव्यक्ति दी। उनकी रचनाओं ने बदलते सामाजिक परिवेश और भाषा के स्वरूप पर गंभीर चिंतन के लिए प्रेरित किया।

समूह की संस्थापक डॉ. शकुंतला सरूपरिया ने संचालन के साथ अपनी ग़ज़लों के माध्यम से आधुनिक जीवन की आपाधापी, रिश्तों में आती दूरी और अनुत्तरित सवालों को स्वर दिया। युवा कवि जगवीर सिंह ने ‘वह कौन है?’ और ‘तुम्हारा नाम’ के माध्यम से अस्तित्व एवं स्त्री जीवन से जुड़े प्रश्न उठाए। डॉ. सुमन पामेचा ने ‘आज फिर’, ‘आधुनिक मानव’ और ‘पैसा है भगवान’ जैसी रचनाओं के जरिए बदलती मानवीय संवेदनाओं पर विचार रखा।

मेज़बान हंसा रविंद्र की कविता ‘पका हुआ विकास’ गोष्ठी का विशेष आकर्षण रही। झील, पहाड़, चिड़ियों, पेड़ों, बेटियों और हंसते पिता की कल्पना के माध्यम से उन्होंने विकास को प्रकृति एवं मानवीय प्रेम से जोड़ने का संदेश दिया।

शकुंतला सोनी ने बेटियों की पीड़ा पर मुक्तक प्रस्तुत किया। वहीं दुष्कर्म और हत्या की शिकार डॉ. मोहिता को समर्पित उनकी मार्मिक कविता ने उपस्थित लोगों को भावुक कर दिया।

गोष्ठी के अंत में कल्पना भाटी ने आभार व्यक्त किया। साहित्यिक संध्या अपने पीछे तालियों की गूंज के साथ अनेक संवेदनाएं, सवाल और विचार छोड़ गई।

रिपोर्ट: यौवंतराज माहेश्वरी

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