
पदम चन्द गांधी
जोधपुर | शाबाश इंडिया।
चातुर्मास केवल वर्षा ऋतु में साधु-संतों के एक स्थान पर विराजमान रहने का समय नहीं, बल्कि आत्ममंथन, साधना, संयम और आत्मशुद्धि का स्वर्णिम अवसर है। यह काल श्रावक और श्रमण के बीच आध्यात्मिक सेतु का कार्य करता है तथा प्रत्येक व्यक्ति को अपने भीतर झाँकने, आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने और धर्ममय जीवन अपनाने की प्रेरणा देता है।
लेखक पदम चन्द गांधी का कहना है कि चातुर्मास बाहरी विस्तार को सीमित कर भीतर की चेतना को जागृत करने का अवसर है। यह साधक को स्वयं से परिचित कराता है तथा आत्मा से परमात्मा बनने की साधना का मार्ग प्रशस्त करता है। इस अवधि में व्यक्ति अपने दोषों का आत्मनिरीक्षण कर प्रायश्चित, स्वाध्याय और संयम के माध्यम से जीवन को पवित्र बना सकता है।
उन्होंने कहा कि संसार में घड़ी को तो ठीक किया जा सकता है, लेकिन समय को केवल अपने कर्मों से ही सार्थक बनाया जा सकता है। परमात्मा की भक्ति, आत्मशुद्धि और आत्मानुभूति ही मनुष्य को वास्तविक उन्नति की ओर ले जाती है। चातुर्मास आत्मा के स्वभाव को पहचानने, कषायों को कम करने, मिथ्यात्व से सम्यक दर्शन की ओर अग्रसर होने तथा धर्मभाव में रमण करने का श्रेष्ठ अवसर प्रदान करता है।
लेख में बताया गया है कि चातुर्मास आत्मगवेषणा का पर्व है, जहाँ व्यक्ति अपने दोषों को स्वीकार कर गुरु के समक्ष प्रायश्चित करता है और आत्मशुद्धि का मार्ग अपनाता है। यह आत्मा को सात्विक खुराक देने वाला समय है, जो व्यक्ति को अहंकार से अरिहंत भाव, वासना से उपासना, भोग से योग तथा हिंसा से अहिंसा की ओर प्रेरित करता है।
पदम चन्द गांधी ने वर्तमान समय में चातुर्मास के बदलते स्वरूप पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि साधना और स्वाध्याय का यह पर्व कई स्थानों पर प्रदर्शन, आडंबर और भव्य आयोजनों तक सीमित होता जा रहा है। उन्होंने कहा कि धर्म का वास्तविक स्वरूप आचरण, संयम और आत्मपरिवर्तन में है, न कि बाहरी दिखावे में।
उन्होंने शास्त्रीय दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए बताया कि चातुर्मास के पाँच प्रमुख उद्देश्य हैं—अहिंसा व्रत की रक्षा, ज्ञान की प्राप्ति, तप-अनुष्ठान, संघ की वृद्धि तथा प्रवचन प्रभावना। यदि समाज इन उद्देश्यों को केंद्र में रखकर चातुर्मास का पालन करे तो यह वास्तव में आत्मकल्याण और समाज निर्माण का सशक्त माध्यम बन सकता है।
लेख के अंत में उन्होंने आह्वान किया कि चातुर्मास को प्रदर्शन का नहीं, बल्कि स्वदर्शन, आत्ममंथन और आध्यात्मिक उन्नयन का पर्व बनाया जाए। यदि प्रत्येक व्यक्ति इस अवधि में अपने जीवन का मूल्यांकन कर धर्म, संयम और आत्मशुद्धि को अपनाए, तो चातुर्मास का वास्तविक उद्देश्य सार्थक होगा।


