Thursday, November 5, 2026

मोह के साथ योग खतरनाक, मोह रहित अवस्था में ही संभव है सच्चा योग : मुनि सुधासागरजी महाराज

इंदौर | शाबाश इंडिया।

समयसार शिक्षण-प्रशिक्षण शिविर में युवा विद्वान बने आकर्षण का केंद्र, ध्यान योग का दिया जा रहा प्रशिक्षण

दलाल बाग मैदान, इंदौर में आयोजित विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव श्री सुधासागरजी महाराज ने कहा कि मोह के साथ योग करना खतरनाक है। वास्तविक योग मोह रहित अवस्था में ही संभव है। आत्मा में भगवान बनने की अपार शक्ति है, लेकिन उस अवस्था को प्राप्त करने के लिए निरंतर पुरुषार्थ और सही साधना आवश्यक है।

मुनिश्री ने सरल रेखा का उदाहरण देते हुए समझाया कि सरल रेखा कहना जितना आसान है, उसे सही तरीके से खींचना उतना ही कठिन है। इसके लिए उचित साधन, सही परिस्थिति और एकाग्रता की आवश्यकता होती है। जरा-सी असावधानी से रेखा टेढ़ी हो सकती है। इसी प्रकार आत्मा को पहचानना और परम अवस्था प्राप्त करना भी कठिन साधना का विषय है। इसके लिए द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की अनुकूलता के साथ निरंतर पुरुषार्थ जरूरी है।

गुरु शिष्य के दोष दूर कर गुणों की स्थापना करते हैं

मुनिश्री ने कहा कि संत सदैव समस्त संसार के कल्याण की भावना रखते हैं। उनकी भावना होती है कि जगत के सभी जीव सुखी रहें और किसी को कष्ट न हो। गुरु शिष्य के जीवन को सही दिशा देते हैं, उसके दोषों को दूर कर गुणों की स्थापना करते हैं। गुरु की महिमा बताते हुए उन्होंने कहा कि गुरु वह शक्ति हैं, जो भगवान तक पहुँचने का मार्ग बताते हैं। शिष्य के जीवन में गुरु का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।

समयसार की गाथाओं से प्रभावित हो रही युवा पीढ़ी : विजय धुर्रा

मध्य प्रदेश महासभा के संयोजक विजय धुर्रा ने कहा कि परम पूज्य मुनि पुंगव श्री सुधासागरजी महाराज के सान्निध्य में चल रहे श्री समयसार शिक्षण-प्रशिक्षण शिविर में भाग ले रहे सांगानेर, जयपुर के युवा विद्वान एवं विदुषियों की प्रतिभा से देशभर के लोग प्रभावित हो रहे हैं। जब ये युवा समयसार की गाथाओं का भावपूर्ण वाचन करते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि श्रमण संस्कृति और शास्त्रों के गूढ़ रहस्यों को आगे बढ़ाने वाली नई पीढ़ी तैयार हो रही है। ये युवा आने वाले समय में धर्म और संस्कृति को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाएँगे।

मोह नहीं, असंयम है संसार का कारण

मुनिश्री ने कहा कि संसार का कारण केवल मोह नहीं, बल्कि असंयम है। अविरति दूर होने पर मोह को दूर करने का मार्ग प्रशस्त होता है। मोहनीय कर्म के कारण जीव के ज्ञान पर पर्दा पड़ा रहता है और वह अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचान पाता।

समयसार ग्रंथ के माध्यम से उन्होंने अभाव में सद्भाव की अनुभूति का गूढ़ सिद्धांत समझाया। दूध और दही का उदाहरण देते हुए बताया कि दोनों में द्रव्य की निरंतरता होते हुए भी उनकी पर्याय अलग-अलग होती है। इसी प्रकार साधक को अपनी भावी पर्याय के स्वरूप को समझने और उसके अनुरूप गुण विकसित करने का पुरुषार्थ करना चाहिए। जिस प्रकार राजकुमार राजा बनने से पहले राजधर्म और शासन के गुण सीखता है, उसी प्रकार साधक को भी अपनी उच्च आध्यात्मिक अवस्था के लिए निरंतर अभ्यास करना चाहिए।

समयसार के चिंतन से समझा जा सकता है रूपातीत ध्यान

मुनिश्री ने कहा कि समयसार के गहन चिंतन से रूपातीत ध्यान की अवस्था को समझा जा सकता है। अपने वर्तमान स्वरूप और पद-प्रतिष्ठा के मोह से ऊपर उठकर आत्मा के वास्तविक स्वरूप का अनुभव करना अत्यंत कठिन साधना है। अज्ञान की अवस्था में व्यक्ति ज्ञान का अनुभव कर सकता है, लेकिन ज्ञानी के लिए अपने ज्ञान के अहंकार को छोड़कर आत्मस्वरूप में लीन होना बड़ी साधना है। जब साधक बाहरी पहचान और मान्यताओं से ऊपर उठकर आत्मा में स्थित होता है, तब वह आध्यात्मिक अनुभूति की उच्च अवस्था की ओर बढ़ता है।

कार्यक्रम के दौरान प्रातःकाल जगत कल्याण की कामना के साथ मुनिश्री के सान्निध्य में महामंगल शांति धारा संपन्न हुई। इस अवसर पर आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के चित्र का अनावरण संगोष्ठी पुण्यार्जक गिरीश जैन गिन्नी परिवार, स्वागताध्यक्ष अशोक जोशी एवं संजय सामरिया ने किया। दीप प्रज्ज्वलन संगोष्ठी संयोजक आनंद गोधा, अक्षय कासलीवाल, भूपेंद्र जैन, अशोक नगर जैन समाज के मंत्री विजय धुर्रा सहित अन्य गणमान्यजनों ने किया।

शिविर में ध्यान योग का शिक्षण-प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है, जिसमें युवा विद्वान एवं विदुषियाँ उत्साहपूर्वक भाग लेकर धर्म और अध्यात्म की गहराइयों को समझ रहे हैं।

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