
विशेष आलेख | शाबाश इंडिया।
डॉ. विजय गर्ग
दीवाली रोशनी, खुशियों और आपसी मेल-जोल का त्योहार है। पीढ़ियों से लोग दीप जलाकर, मिठाइयाँ बाँटकर, परिवार के साथ समय बिताकर और आतिशबाजी करके इस पर्व को मनाते आ रहे हैं। लेकिन वायु एवं ध्वनि प्रदूषण और स्वास्थ्य पर इनके दुष्प्रभावों को लेकर बढ़ती चिंता के बीच एक अहम सवाल उठता है—क्या पर्यावरण की रक्षा करते हुए भी दीवाली मनाई जा सकती है? इसी संदर्भ में ग्रीन पटाखों को एक विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन वे वास्तव में कितने पर्यावरण-अनुकूल हैं?
ग्रीन पटाखे क्या हैं?
ग्रीन पटाखे विशेष रूप से इस उद्देश्य से तैयार किए जाते हैं कि पारंपरिक पटाखों की तुलना में पर्यावरण को कम नुकसान पहुँचे। इनमें प्रदूषक पदार्थों और सूक्ष्म कणों के उत्सर्जन को कम करने का प्रयास किया जाता है। कुछ प्रकार के ग्रीन पटाखों में हानिकारक रसायनों का उपयोग भी सीमित किया जाता है।
स्वीकृत ग्रीन पटाखे निर्धारित मानकों के अनुसार बनाए जाते हैं। उनकी पहचान के लिए पैकेट पर प्रमाणन संबंधी जानकारी या क्यूआर कोड हो सकता है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि ‘ग्रीन’ का अर्थ पूरी तरह प्रदूषण-मुक्त होना नहीं है।
कितना कम होता है प्रदूषण?
ग्रीन पटाखों का उद्देश्य पारंपरिक पटाखों की तुलना में प्रदूषण कम करना है। लेकिन वास्तविक कमी पटाखे के प्रकार, उसकी संरचना, निर्माण की गुणवत्ता और इस्तेमाल के तरीके पर निर्भर करती है।
ये कुछ प्रदूषक कणों और हानिकारक पदार्थों के उत्सर्जन को कम कर सकते हैं, लेकिन इनसे भी धुआँ, गैसें और शोर पैदा होते हैं। कम समय में बड़ी संख्या में पटाखे जलाने से इनका सामूहिक प्रभाव स्थानीय वायु गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है।
इसलिए केवल ‘ग्रीन पटाखे’ नाम देखकर यह नहीं मान लेना चाहिए कि वे पर्यावरण के लिए पूरी तरह सुरक्षित हैं।
स्वास्थ्य पर पटाखों का असर
पटाखों से निकलने वाले धुएँ में सूक्ष्म कण और गैसें हो सकती हैं, जो आँखों, गले और श्वसन तंत्र में जलन पैदा करती हैं। बहुत छोटे कण फेफड़ों के भीतर तक पहुँच सकते हैं और अस्थमा, ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियों को बढ़ा सकते हैं।
बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएँ और हृदय या फेफड़ों की बीमारी से पीड़ित लोग इनके प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। तेज धमाकों से तनाव, नींद में बाधा और सुनने की क्षमता पर भी बुरा असर पड़ सकता है।
ग्रीन पटाखों के इस्तेमाल के बावजूद धुएँ और तेज आवाज से पूरी तरह बचाव जरूरी है।
क्या ग्रीन पटाखे वास्तव में पर्यावरण-अनुकूल हैं?
ग्रीन पटाखे प्रदूषण कम करने की दिशा में एक प्रयास हैं, लेकिन वे पर्यावरण की सभी समस्याओं का समाधान नहीं हैं। इनका लाभ वैज्ञानिक परीक्षण, प्रमाणन, निर्माण की गुणवत्ता और जिम्मेदार उपयोग पर निर्भर करता है।
उपभोक्ताओं को केवल अधिकृत पटाखे ही खरीदने चाहिए और उनकी प्रमाणन संबंधी जानकारी की जाँच करनी चाहिए। ग्रीन पटाखों के नाम पर बेचे जाने वाले नकली या गैर-मानक उत्पाद निर्धारित मानकों पर खरे नहीं उतर सकते।
यह भी समझना जरूरी है कि प्रदूषण कम करने के लिए केवल पटाखों का प्रकार बदलना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी कुल खपत घटाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
कैसे मनाएँ हरित दीवाली?
कुछ छोटे-छोटे कदम अपनाकर हम दीवाली को अधिक स्वच्छ और पर्यावरण-अनुकूल बना सकते हैं—
- पारंपरिक मिट्टी के दीयों और ऊर्जा बचाने वाली रोशनी को प्राथमिकता दें।
- पटाखों का उपयोग कम करें या पूरी तरह उनसे बचें।
- पटाखे चलाने ही हों, तो केवल अधिकृत ग्रीन पटाखे खरीदें।
- अस्पतालों, स्कूलों और पशुओं के आसपास पटाखे न चलाएँ।
- छोटे बच्चों को बड़ों की निगरानी के बिना पटाखे न चलाने दें।
- पटाखों के अवशेष और पैकेजिंग का उचित निपटान करें।
- रोशनी, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और आपसी मेल-जोल पर आधारित आयोजनों को बढ़ावा दें।
स्कूल, आवासीय समितियाँ और सामाजिक संगठन भी वायु एवं ध्वनि प्रदूषण के प्रति जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
पटाखों से आगे, सोच में बदलाव जरूरी
हरित दीवाली का अर्थ केवल पटाखों के रंग या उन पर लगे लेबल से नहीं है। इसका वास्तविक आधार मानव स्वास्थ्य, पशु-पक्षियों और पर्यावरण के प्रति हमारी संवेदनशीलता है। त्योहार खुशियाँ लेकर आएँ, न कि साँस लेने में परेशानी, शोर से तनाव और प्रकृति को नुकसान।
ग्रीन पटाखे प्रदूषण कम करने की दिशा में एक कदम हो सकते हैं, लेकिन सबसे प्रभावी उपाय उनका उपयोग सीमित करना और स्वच्छ विकल्प अपनाना है।
निष्कर्ष
ग्रीन पटाखे पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम प्रदूषण फैला सकते हैं, लेकिन कम प्रदूषण का अर्थ शून्य प्रदूषण नहीं है। इनके लाभों को केवल हरे लेबल के आधार पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों और वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर समझना चाहिए।
दीवाली की असली भावना प्रकाश, प्रेम, दया और खुशियाँ बाँटने में है। आइए, ऐसी दीवाली मनाएँ जिसमें हमारे घर रोशन हों, हवा स्वच्छ रहे और समाज स्वस्थ बने। सच्ची हरित दीवाली वही है, जिसकी खुशियों की कीमत प्रकृति को न चुकानी पड़े।
डॉ. विजय गर्ग
सेवानिवृत्त प्रिंसिपल एवं प्रख्यात वैज्ञानिक
स्ट्रीट कौर चंद, एम.एच.आर. मलोट, पंजाब – 152107


