
इंदौर | शाबाश इंडिया।
इंदौर। दलाल बाग मैदान में आयोजित विशाल स्नातक सम्मेलन में निर्यापक श्रमण राष्ट्रसंत मुनि पुंगव श्री सुधासागरजी महाराज ने कहा कि जीवन में किसी के प्रति द्वेष और निजी स्वार्थ का भाव नहीं रखना चाहिए तथा किसी का अहित नहीं करना चाहिए। योग्य व्यक्ति को ही समाज में उचित स्थान मिलता है, लेकिन योग्यता के साथ पुण्य और यश-कीर्ति कर्म का उदय भी आवश्यक है। अनिष्ट की पहचान कर उससे दूर रहने और इष्ट की प्राप्ति के लिए सही दिशा में प्रयास करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति अपने आचरण को सही रखे, तो जीवन में सकारात्मक परिवर्तन स्वतः आने लगते हैं।
हर वर्ग को मिल रहा राष्ट्रसंत का मार्गदर्शन : विजय धुर्रा
जिज्ञासा समाधान के दौरान मध्यप्रदेश महासभा के संयोजक विजय धुर्रा ने कहा कि परम पूज्य मुनि श्री सुधासागरजी महाराज युवाओं, स्नातक विद्वानों, पाठशालाओं, महिलाओं और समाज के प्रत्येक वर्ग को मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं। युवा ऊर्जा से परिपूर्ण होते हैं और उन्हें सही दिशा के साथ लक्ष्य देना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से भव्य आयोजन किया जा रहा है, जिसमें शहर, अंचल और देशभर से कार्यकर्ता एवं युवा शामिल हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि युवाओं को मार्गदर्शन के साथ कुछ लक्ष्य भी दिए जाएंगे, जिन पर आगे कार्य किया जाएगा।
युवा विद्वानों को ‘विद्वत श्री’ और ‘विदुषी श्री’ की उपाधि
सम्मेलन में युवा विद्वानों को ‘विद्वत श्री’ एवं ‘विदुषी श्री’ की उपाधि से विभूषित किया गया। विभिन्न विषयों में शीर्ष स्थान प्राप्त करने वाले प्रतिभाशाली विद्वानों का भी सम्मान किया गया। इस अवसर पर आईपीएस शांत कुमार, डीआईजी विनीत जैन, श्रमण संस्कृति संस्थान के प्रमोद पहाड़िया, उत्तमजी पाटनी, चक्रवर्ती सपना मनीष गोधा, सामाजिक संसद के अध्यक्ष नवीन आनंद गोधा, चातुर्मास अध्यक्ष अशोक जोशी, स्वागत अध्यक्ष संजय सामरिया, धर्मेंद्र समकेम, गिरीश जैन गिन्नी, महामंत्री हर्ष जैन, मंत्री अक्षय कासलीवाल, कोषाध्यक्ष आकाश कोयला, सहकोषाध्यक्ष सौरव बड़जात्या, संजय पाटौदी, राहुल स्पोर्ट्स और संजय जैन सहित अन्य श्रद्धालुओं ने सम्मान समारोह में सहभागिता निभाई।
दया वही, जिससे दूसरे जीव को सुख और लाभ मिले
मुनि श्री ने दया और करुणा की व्याख्या करते हुए कहा कि वास्तविक दया वही है, जिससे सामने वाले जीव को लाभ मिले और उसे सुख की अनुभूति हो। किसी जीव की रक्षा करते समय केवल अपने व्रत या धर्म की रक्षा का भाव नहीं, बल्कि उस जीव के प्रति करुणा और उसके हित की भावना होनी चाहिए। दया का उद्देश्य जीव को लाभ पहुंचाना, उसके प्रति अनुग्रह का भाव रखना और उसके कल्याण की कामना करना है। उन्होंने कहा कि दूसरों के प्रति हमारे भाव ही हमारे धर्म और पुण्य की दिशा निर्धारित करते हैं।
प्रभावना करें, लेकिन निजी स्वार्थ और अहित का भाव न रखें
मुनि श्री ने आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज से प्राप्त शिक्षा का उल्लेख करते हुए कहा कि जीवन में दो बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए—निजी स्वार्थ नहीं रखना और किसी का अहित नहीं करना। उन्होंने कहा कि दान की प्रेरणा देने के बजाय दान की महिमा और उसके सही स्वरूप को समझाना चाहिए। दान के वास्तविक लक्षणों को जानकर व्यक्ति स्वयं प्रेरित होता है। जब हम निस्वार्थ भाव से कार्य करते हैं और किसी का अहित नहीं करते, तो अनेक कार्य सहजता से सफल होने लगते हैं।
ग्राहक की जरूरत के अनुसार हो दुकान, तभी मिलेगी सफलता
व्यावहारिक जीवन का उदाहरण देते हुए मुनि श्री ने कहा कि दुकान ग्राहक की आवश्यकता के अनुसार होनी चाहिए, तभी वह अच्छी तरह चलेगी। यदि दुकानदार केवल अपनी पसंद के अनुसार सामान रखेगा, तो जरूरी नहीं कि ग्राहक उसे पसंद करें। इसी प्रकार धार्मिक अध्ययन में भी विषय और समझ के अनुरूप क्रम अपनाना चाहिए।
उन्होंने आचार्य समंतभद्र स्वामी की विद्वत्ता और दार्शनिक दृष्टि का उल्लेख करते हुए उनकी कृतियों के स्वाध्याय पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आचार्यों की रचनाओं का अध्ययन समझ और उचित क्रम के साथ करना चाहिए। साथ ही उन्होंने चेताया कि पुण्य की उपेक्षा करने से व्यक्ति को नुकसान उठाना पड़ सकता है।


