Sunday, October 4, 2026

सच्चे को स्वीकार करना सरल, गलत मान्यताओं का त्याग करना सबसे कठिन : राष्ट्रसंत श्रीसुधासागरजी महाराज

इंदौर | शाबाश इंडिया।

दलाल बाग मैदान में आयोजित विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए राष्ट्रसंत राजकीय अतिथि मुनि पुंगव श्रीसुधासागरजी महाराज ने कहा कि सच्चे को स्वीकार करना सरल है, लेकिन मिथ्यात्व और गलत मान्यताओं का त्याग करना सबसे कठिन है। मोक्षमार्ग में सबसे बड़ा बाधक बाहरी संसार नहीं, बल्कि आत्मा पर अनादिकाल से बैठा मिथ्यात्व है। हमारी भ्रमित मान्यताओं के कारण हम धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझ नहीं पाते।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि मकान बनाना सरल है, लेकिन किसी शक्तिशाली व्यक्ति द्वारा उस पर कब्जा कर लिया जाए तो कब्जा हटाना अत्यंत कठिन हो जाता है। इसी प्रकार आत्मा हमारी है, लेकिन मिथ्यात्व ने आत्मा पर अनादिकाल से कब्जा कर रखा है। इस कब्जे को हटाना ही सबसे कठिन साधना है।

मुनि श्री ने कहा कि सम्यक दर्शन प्राप्त करने का अर्थ केवल कोई नई वस्तु प्राप्त करना नहीं, बल्कि उस गलत दृष्टि और मान्यता को हटाना है, जिसने आत्मा को बांध रखा है। हम सच्चे देव, शास्त्र और गुरु को मानते हैं, मंदिर जाते हैं, पूजा करते हैं और धार्मिक नियम भी लेते हैं, लेकिन वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या हमने अपनी गलत मान्यताओं और मिथ्यात्व का त्याग किया है।

उन्होंने कहा कि सच्चे को स्वीकार करना आसान है, लेकिन गलत को छोड़ना कठिन है। साधक को एक समय निर्णय करना ही पड़ता है कि वह सत्य के साथ खड़ा होगा या पुरानी गलत धारणाओं को पकड़े रहेगा। दो लड्डू दोनों हाथों में नहीं रखे जा सकते, उसी प्रकार सम्यक दृष्टि और मिथ्यात्व को एक साथ पकड़कर नहीं रखा जा सकता। सत्य की अनुभूति होने पर गलत मान्यताओं से भीतर से मोह समाप्त होना चाहिए।

वैराग्य की वास्तविक परिभाषा बताते हुए मुनि श्री ने कहा कि संसार के दुखों से परेशान होकर सब कुछ छोड़ देना वास्तविक वैराग्य नहीं है। व्यापार में नुकसान, किसी का धोखा या अपमान होने के कारण संसार बुरा लगने लगे तो यह स्थायी वैराग्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि परिस्थितियां बदलने पर ऐसे भाव भी बदल सकते हैं। सच्चा वैराग्य बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि संसार की वास्तविकता को समझने से उत्पन्न होता है। वास्तविक वैराग्य व्यक्ति के भीतर शांति, विवेक और आत्मचिंतन पैदा करता है।

मुनि श्री ने कहा कि धर्म केवल यह नहीं है कि हमने कितनी पूजा की, कितने व्रत किए या कितनी बार मंदिर गए। धर्म का वास्तविक प्रश्न यह है कि हमने अपने भीतर से क्या छोड़ा। मिथ्यात्व को पहचानना, गलत मान्यताओं को छोड़ना, सत्य को स्वीकार करना और उसमें स्थिर होना ही आत्मजागरण की दिशा है। उन्होंने साधकों से बाहर की दुनिया को बदलने से पहले अपने भीतर बैठे मिथ्यात्व को पहचानने का आह्वान किया।

मध्यप्रदेश महासभा संयोजक विजय धुर्रा ने बताया कि परम पूज्य निर्यापक श्रमण राष्ट्रसंत मुनि पुंगव श्रीसुधासागरजी महाराज ससंघ 18 पिच्छिकाओं के सानिध्य में 4 एवं 5 अक्टूबर को अखिल भारतीय श्री दिगम्बर जैन महिला महासमिति श्रमण संस्कृति महिला मंडल का राष्ट्रीय अधिवेशन आयोजित होगा। इसमें देशभर से समाज की प्रमुख महिला प्रतिनिधियों के साथ अशोक पाटनी की जीवनसंगिनी श्रीमती सुशीला पाटनी, शांता पाटनी, आरके मार्बल्स की श्रीमती रजनी काला, मुंबई की श्रीमती शीला डोडिया, डॉ. वंदना जैन, जयपुर की इंदु गांधी, श्रीमती सुमन दगड़ा, ब्यावर सहित अनेक प्रमुखजन उपस्थित रहेंगे। अधिवेशन में विशेष सत्र, रोल कॉल, भव्य शोभायात्रा सहित राष्ट्रीय विषयों पर गहन मंथन होगा।

मुनि श्री सुधासागरजी महाराज के इंदौर प्रवास के दौरान छत्रपति नगर में भी प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु धर्मलाभ के लिए पहुंच रहे हैं। धर्मसभा में किसी प्रकार की राशि देने की बाध्यता नहीं होने के कारण सभी लोग समान रूप से संत सानिध्य और धर्मोपदेश का लाभ ले रहे हैं। समाजजनों के अनुसार, सहज और सर्वसमावेशी धर्मसभा का यह वातावरण श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। धर्म श्रद्धा, भावना, आत्मचिंतन और आत्मजागरण का नाम है।

धर्मसभा में चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन गोधा, सामाजिक संसद अध्यक्ष आनंद गोधा, महोत्सव अध्यक्ष अशोक डोशी, स्वागत अध्यक्ष संजय सामरिया, महामंत्री हर्ष जैन, मंत्री अक्षय कासलीवाल, आकाश कोयला, प्रिंसपाल टोंग्या, विजय पाटौदी, सौरभ बड़जात्या, संजय पाटौदी, राहुल सेठी, भूपेंद्र भोपाली एवं विपुल बांजल सहित बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी समाजजन उपस्थित रहे।

- Advertisement -spot_img

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article

Skip to toolbar