
ब्यावर | शाबाश इंडिया।
दिगंबर जैन समाज द्वारा आयोजित दस दिवसीय दशलक्षण महापर्व का समापन रविवार को क्षमावाणी पर्व के साथ श्रद्धा, भक्ति और आत्मीयता के वातावरण में हुआ। शहर के विभिन्न जिनालयों में दिनभर विशेष धार्मिक आयोजन हुए। श्रद्धालुओं ने भगवान जिनेंद्र का अभिषेक-पूजन कर सुख-शांति एवं आत्मकल्याण की कामना की। वहीं क्षमावाणी पर्व पर समाजजनों ने एक-दूसरे से क्षमा याचना करते हुए मनमुटाव, कटुता और बैरभाव को समाप्त कर प्रेम, सद्भाव एवं भाईचारे के साथ आगे बढ़ने का संकल्प लिया।
श्री दिगंबर जैन पंचायती नसियां में आयोजित विशेष कार्यक्रम में विद्वान शास्त्री ने क्षमावाणी पर्व के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दशलक्षण महापर्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों का पर्व नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि का अवसर है। क्षमा मनुष्य के जीवन में विनम्रता का भाव उत्पन्न करती है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, मान और द्वेष का त्याग कर सभी जीवों के प्रति मैत्रीभाव रखना चाहिए। क्षमा मांगना और क्षमा करना, दोनों ही आत्मिक शुद्धि की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
क्षमावाणी पर्व के अवसर पर शहर के सभी दिगंबर जैन जिनालयों में विशेष धार्मिक आयोजन हुए। श्रद्धालुओं ने भगवान जिनेंद्र का अभिषेक एवं पूजन किया। भक्तिभाव से पूजा-अर्चना करते हुए श्रद्धालुओं ने भगवान के समक्ष आत्मकल्याण, परिवार की सुख-शांति तथा समाज में आपसी प्रेम और सद्भाव की कामना की।
दशलक्षण महापर्व के दौरान उपवास एवं तपस्या करने वाले श्रावक-श्राविकाओं का श्री दिगंबर जैन पंचायत की ओर से सम्मान किया गया। समाजजनों ने तपस्वियों की साधना की अनुमोदना करते हुए उनके प्रति श्रद्धा एवं सम्मान व्यक्त किया। सम्मान समारोह में तपस्वियों को तिलक लगाकर, माला पहनाकर तथा साफा एवं शाल ओढ़ाकर अभिनंदन किया गया।
वक्ताओं ने कहा कि धार्मिक पर्वों की सार्थकता तभी है, जब इनके माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन में संयम, त्याग, तप और आत्मअनुशासन को अपनाए। तपस्या करने वाले श्रावक-श्राविकाओं ने समाज के अन्य लोगों को भी धर्म, संयम और आत्मशुद्धि के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि क्षमावाणी पर्व जैन धर्म की उस महान परंपरा का प्रतीक है, जिसमें व्यक्ति अपने द्वारा जाने-अनजाने में हुई भूलों के लिए क्षमा मांगता है और दूसरों को भी हृदय से क्षमा करता है। क्षमा केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन जीने की भावना है। इससे मन का बोझ हल्का होता है और रिश्तों में मधुरता एवं आत्मीयता बढ़ती है।
समाजजनों ने कहा कि वर्तमान समय में आपसी संवाद, प्रेम और सद्भाव की आवश्यकता और भी अधिक है। यदि मनुष्य अपने भीतर क्रोध, अहंकार और द्वेष को स्थान न देकर क्षमा एवं मैत्रीभाव को अपनाए, तो परिवार और समाज में सकारात्मक वातावरण का निर्माण हो सकता है।
दशलक्षण महापर्व के समापन अवसर पर समाजजनों ने एक-दूसरे से सामूहिक रूप से क्षमा याचना की। सभी ने परस्पर “उत्तम क्षमा” कहते हुए जाने-अनजाने में हुई भूलों के लिए क्षमा मांगी। इस दौरान वातावरण भावुक एवं आत्मीय हो गया। समाजजनों ने आपसी मतभेद भुलाकर प्रेम, सौहार्द और भाईचारे के साथ समाज को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।
रिपोर्ट: अमित गोधा


