
जयपुर | शाबाश इंडिया।
दशलक्षण महापर्व के अंतिम दिवस शुक्रवार को उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म एवं अनंत चतुर्दशी का पावन पर्व श्रद्धा, भक्ति और आराधना के साथ संपन्न हुआ। इसी अवसर पर 12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य स्वामी के मोक्षकल्याणक को भी दिगंबर जैन मंदिरों में धार्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। विभिन्न मंदिरों में कलशाभिषेक, शांतिधारा, विधान पूजन और निर्वाण लड्डू अर्पण के कार्यक्रम हुए।
इंजीनियर्स कॉलोनी, वरुण पथ, थड़ी मार्केट, मीरा मार्ग, हीरा पथ, एसएफएस कॉलोनी, मांग्यावास, वर्धमान सरोवर, राधा निकुंज और केसर चौराहा सहित जयपुर के विभिन्न दिगंबर जैन मंदिरों में दिनभर श्रद्धालुओं की भीड़ रही। आयोजकों के अनुसार राजधानी जयपुर के 225 से अधिक दिगंबर जैन मंदिरों में करीब 10 हजार से अधिक श्रावकों ने श्रीजी का कलशाभिषेक एवं शांतिधारा की। हजारों श्रद्धालुओं ने 24 तीर्थंकर भगवानों के साथ उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म एवं अनंत चतुर्दशी का विधान-पूजन कर अष्टद्रव्य अर्पित किए।
भगवान वासुपूज्य स्वामी के मोक्षकल्याणक के अवसर पर निर्वाण कांड पाठ, मंत्रोच्चारण एवं जयमाला महाअर्घ के साथ श्रद्धालुओं ने निर्वाण लड्डू अर्पित किए और भगवान के मोक्षमार्ग की आराधना की।
अखिल भारतीय दिगंबर जैन युवा एकता संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष अभिषेक जैन बिट्टू ने शास्त्रों के अनुसार उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म एवं अनंत चतुर्दशी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि काम और भोग में आसक्त आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप से दूर होती जाती है। अनादिकालीन संस्कारों के कारण आत्मा जब पुरुषार्थ के स्थान पर विषय-वासनाओं के अधीन हो जाती है, तब उसका आध्यात्मिक विकास बाधित होता है। शास्त्रों में विषय-वासनाओं की क्षणिक सुखानुभूति और उनके परिणामों के प्रति सावधान किया गया है।
उन्होंने कहा कि आत्मा में रमण करना और आत्मस्वभाव में जीना ही वास्तविक ब्रह्मचर्य है। जिस प्रकार कमल की उत्पत्ति कीचड़ में होती है, लेकिन वह कीचड़ से ऊपर उठकर निर्मल रहता है, उसी प्रकार मनुष्य का जन्म संसार में हुआ है, लेकिन संसार की विषय-वासनाओं में ही जीवन व्यतीत करना आवश्यक नहीं है। व्यक्ति को विषयों के स्थान पर आत्मचिंतन और आत्मसंयम की ओर बढ़ने का अभ्यास करना चाहिए।
उन्होंने बताया कि अनंत चतुर्दशी का पर्व जैन धर्म में विशेष महत्व रखता है। इसी दिन 12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य स्वामी का मोक्षकल्याणक भी मनाया जाता है। श्रद्धालु इस अवसर पर कलशाभिषेक, शांतिधारा एवं विधान पूजन कर कर्मनिर्जरा की भावना रखते हुए उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म को अपने जीवन में धारण करने का संकल्प लेते हैं।
अखिल भारतीय दिगंबर जैन युवा एकता संघ के राष्ट्रीय सचिव प्रमोद बाकलीवाल ने बताया कि दशलक्षण महापर्व के दौरान दस दिनों तक निर्जल उपवास करने वाले तथा तीन दिनों के ‘तेला’ निर्जल उपवास करने वाले त्यागी-व्रतियों का पारणा शनिवार को मंदिरों एवं समाज के स्तर पर करवाया जाएगा। पारणा से पूर्व मंदिर समितियों, सामाजिक संस्थाओं एवं सकल दिगंबर जैन समाज की ओर से तपस्वियों का तिलक, माला एवं सम्मान कर उनके तप की अनुमोदना की जाएगी।
उन्होंने बताया कि इसके बाद भाद्रपद माह में षोडशकरण के 32 एवं 16 दिनों के निर्जल उपवास तथा रत्नत्रय के तीन दिवसीय तेला उपवास करने वाले तपस्वियों का भी पारणा करवाया जाएगा और उनके तप की अनुमोदना की जाएगी।
अभिषेक जैन बिट्टू ने बताया कि रविवार को राजधानी जयपुर के 225 से अधिक दिगंबर जैन मंदिरों सहित देश-दुनिया के विभिन्न जैन मंदिरों में सामूहिक क्षमावाणी पर्व मनाया जाएगा। इस अवसर पर दोपहर 3 बजे से मंदिरों में श्रीजी का कलशाभिषेक एवं शांतिधारा संपन्न होगी। जहां संत-मुनि एवं माताजी ससंघ विराजमान हैं, वहां उनके आशीर्वचन प्राप्त किए जाएंगे। इसके बाद मंदिर समितियों एवं समाजजनों द्वारा क्षमावाणी पर्व मनाया जाएगा।
उन्होंने कहा कि क्षमावाणी पर्व पर समाज का प्रत्येक व्यक्ति वर्षभर में जाने-अनजाने में हुई भूल-चूक के लिए एक-दूसरे से क्षमा याचना करेगा और परस्पर क्षमा प्रदान करने के भाव धारण करेगा। उन्होंने बताया कि जैन धर्म के प्रमुख ग्रंथ तत्त्वार्थसूत्र के नवें अध्याय के छठे सूत्र में आचार्य उमास्वामी ने उत्तम क्षमा सहित दस उत्तम धर्मों का उल्लेख किया है। क्षमावाणी पर्व इन्हीं उत्तम क्षमा भावों को जीवन में धारण करने और आत्मसाधना के रूप में आगे बढ़ाने का अवसर है। क्षमा मांगना और क्षमा करना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मबल, विनम्रता और वीरता का प्रतीक है।
रिपोर्ट: अभिषेक जैन बिट्टू


