
इंदौर | शाबाश इंडिया।
“अपने अंदर जो विकृति आई है, उसे छोड़ना है। स्वयं को जितना हल्का करोगे, उतना ही ऊपर उठोगे।” यह संदेश राष्ट्र संत राजकीय अतिथि मुनि पुंगव श्रीसुधासागरजी महाराज ने दलाल बाग मैदान में आयोजित विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए दिया। उन्होंने उत्तम आकिंचन्य धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि आकिंचन्य धर्म किसी वस्तु या व्यक्ति के पीछे भागने का नाम नहीं, बल्कि अपने भीतर उत्पन्न विकृतियों, आसक्ति और अनावश्यक संग्रह को छोड़ने की साधना है।
उन्होंने कहा कि यदि किसी धार्मिक कार्य के बदले भी धन अथवा सांसारिक लाभ की अपेक्षा रखी जाए तो वह आकिंचन्य की भावना नहीं है। रावण का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वह माला फेरते हुए भी श्रीराम को मारने की योजना बना रहा था। इसलिए केवल बाहरी धार्मिक क्रियाएं पर्याप्त नहीं हैं, मन के भीतर की विकृतियों को दूर करना भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपनी आसक्ति कम करते हुए स्वयं को भीतर से हल्का करना चाहिए।
धर्मसभा में संत पुरुषों के प्रति सम्मान और सावधानी का संदेश देते हुए मुनिश्री ने कहा कि ऐसे संत पुरुष पर कभी क्रोध नहीं करना चाहिए, जिन्होंने अपने जीवन में किसी पर क्रोध नहीं किया। गुरु के सामने अहंकार या हेकड़ी नहीं दिखानी चाहिए। उन्होंने पंडित बनारसीदास से जुड़ा प्रसंग सुनाते हुए समझाया कि संत पुरुषों के प्रति श्रद्धा और विनम्रता का भाव रखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि किसी ऐसे निर्दोष व्यक्ति को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए, जिसने कभी किसी का अहित नहीं किया। रावण का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि महापतिव्रता सीता की ओर गलत दृष्टि डालने का परिणाम उसके पूरे कुल के विनाश के रूप में सामने आया। उन्होंने श्रद्धालुओं से राग-द्वेष और पाप प्रवृत्तियों का त्याग करने का आह्वान किया।
मुनिश्री ने अनावश्यक वस्तुओं के संग्रह को छोड़ने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि घर में ऐसी अनेक वस्तुएं होती हैं, जो लंबे समय से किसी काम की नहीं हैं, फिर भी उन्हें संभालकर रखा जाता है। उन्होंने कहा कि कबाड़ और अनुपयोगी वस्तुओं का संग्रह छोड़ना चाहिए। इसी प्रकार आजकल पक्षियों और अन्य जीवों को पालकर पिंजरे में बंद करने की प्रवृत्ति पर भी उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि जिन जीवों ने किसी का अहित नहीं किया, उन्हें बंधन में रखना उचित नहीं है।
उन्होंने आकिंचन्य धर्म को संबंधों के मोह से मुक्ति से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि जीवन में कई ऐसे संबंध बन जाते हैं, जिन्हें मनुष्य स्वयं अपने स्वार्थ या आवश्यकता के कारण जोड़ता है। आकिंचन्य धर्म की ओर बढ़ते हुए ऐसे अनावश्यक संबंधों की आसक्ति को छोड़ना चाहिए। उन्होंने कर्म और शरीर के साथ जुड़े संबंधों को भी समझाते हुए कहा कि आत्मा से जुड़े कर्मबंधनों को ढीला करना आवश्यक है। जैन दर्शन में आयु कर्म के संदर्भ में उन्होंने कहा कि आयु की उदीरणा नहीं करनी चाहिए तथा शरीर और कर्म के प्रति मोह को कम करते हुए आत्मिक स्वरूप की ओर बढ़ना चाहिए।
तीन सौ से अधिक शिविरार्थी कर रहे दस उपवास की तपस्या
मध्यप्रदेश महासभा के संयोजक विजय धुर्रा ने बताया कि अखिल भारतीय श्रावक संस्कार शिविर में छह हजार से अधिक शिविरार्थियों के बीच पहली बार तीन सौ से अधिक शिविरार्थी दस उपवास की तपस्या कर रहे हैं। वहीं प्रतिष्ठाचार्य प्रदीप भैया ने बताया कि दशलक्षण महापर्व की चतुर्दशी के अवसर पर तीन हजार से अधिक शिविरार्थियों का उपवास रहेगा।
सामाजिक संसद के अध्यक्ष नवीन आनंद गोधा ने बताया कि शिविरार्थियों को परम पूज्य गुरुदेव के सान्निध्य में परीक्षा देने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। परीक्षा का परिणाम अगले दिन घोषित किया जाएगा तथा समापन समारोह में प्रतिभागियों को पुरस्कृत किया जाएगा। प्रथम पुरस्कार नवीन आनंद गोधा द्वारा प्रदान किया जाएगा।
धर्मसभा में प्रतिष्ठाचार्य प्रदीप भैया, ब्रह्मचारी विनोद भैया, चक्रवर्ती अध्यक्ष नवीन गोधा, सामाजिक संसद अध्यक्ष आनंद गोधा, चक्रवर्ती मनीष गोधा, महोत्सव अध्यक्ष अशोक डोशी, स्वागताध्यक्ष संजय सामरिया, महामंत्री हर्ष जैन, मंत्री अक्षय कासलीवाल, धर्मेंद्र सिमकेम, रमेश चंद्र निर्वाणा, शिविर पुण्यार्जक आकाश कोयला, सह कोषाध्यक्ष सौरव बड़जात्या, प्रिंसिपल टोंग्या, शिविर निर्देशक हुकुम काका कोटा, विजय धुर्रा, गिरीश गिन्नी, प्रचार प्रमुख संजय पाटौदी, सोनाली बागड़िया, अर्चना गोधा, राहुल सेठी, भूपेंद्र भोपाली, विपुल बाझल, राजेश दद्दू सहित बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी समाजजन उपस्थित रहे।


