
इंदौर | शाबाश इंडिया।
दलाल बाग मैदान में राष्ट्र संत, राजकीय अतिथि मुनि पुंगव श्रीसुधासागरजी महाराज के सान्निध्य में आयोजित धर्मसभा में हजारों श्रद्धालु उमड़े। इस दौरान मुनि श्री ने करीब सात हजार भक्तों को अपने हाथों से गंधोदक प्रदान किया। धर्मसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अध्यात्म शक्ति और राजनीतिक शक्ति के बीच संतुलन जरूरी है। भौतिक शक्ति और धर्म एक-दूसरे के पूरक हैं तथा संस्कार और संस्कृति को सुरक्षित रखने के लिए सरकार को भी आवश्यक कदम उठाने चाहिए।
मुनि श्री ने कहा कि भारत की संस्कृति धर्म, संस्कार और अहिंसा की भावना से जुड़ी रही है। उन्होंने पशु क्रूरता अधिनियम में संशोधन की आवश्यकता बताते हुए कहा कि जिस तरह पशुओं के साथ क्रूरता की जा रही है, उस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। अहिंसा और करुणा की भूमि भारत में पशुओं की सुरक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए।
उन्होंने कहा कि केवल इच्छाओं को छोड़ देना ही त्याग नहीं है। जीवन में अपने स्वार्थ और आसक्ति के साथ-साथ उन संबंधों एवं वस्तुओं के प्रति मोह को भी समझना होगा, जो आत्मिक सुख के मार्ग में बाधक बनते हैं। उन्होंने कहा कि बाहरी वस्तुएं आराम दे सकती हैं, लेकिन अंतरंग सुख प्राप्त करने के लिए आत्मसाधना और तप आवश्यक है। तप के माध्यम से कर्मों का क्षय होता है और तभी वास्तविक सुख की अनुभूति संभव होती है।
मुनि श्री ने त्याग को तप से भी कठिन बताते हुए कहा कि तप तो व्यक्ति कर लेता है, लेकिन त्याग करना कठिन होता है। जिस प्रकार सोने को शुद्ध करने के लिए उसे अग्नि की भट्टी से गुजरना पड़ता है, उसी प्रकार जीवन में हेय वस्तुओं एवं आसक्तियों का त्याग आत्मशुद्धि की दिशा में ले जाता है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपनी दृष्टि में जो वस्तुएं हेय हैं, उनका त्याग करना चाहिए और जो वस्तुएं उपयोगी एवं उपकारी हैं, उनका भी सदुपयोग करते हुए जरूरतमंदों के साथ बांटने की भावना रखनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि वस्तुओं से मिलने वाला आराम वास्तविक सुख नहीं है। गाड़ी, धन, भोजन और अन्य सुविधाएं व्यक्ति को आराम दे सकती हैं, लेकिन पराधीनता में सुख नहीं हो सकता। वास्तविक सुख आत्मनिर्भरता और आत्मिक स्वतंत्रता में है।
मुनि श्री ने श्रद्धालुओं को गुरु और साधु के प्रति श्रद्धा के महत्व को समझाते हुए कहा कि यदि भगवान और गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा है तो मार्ग को लेकर चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि आचार्य कुंदकुंद स्वामी ने साधु और गुरु की भूमिका में अंतर बताया है। साधु के प्रति श्रद्धा कल्याण का भाव जगाती है, जबकि गुरु द्वारा बताए गए मार्ग पर चलना आत्मकल्याण की दिशा में ले जाता है।
धर्मसभा में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव श्रीसुधासागरजी महाराज की उन पर प्रारंभ से ही कृपा रही है। उनका आशीर्वाद नई ऊर्जा देता है और देश की राजनीति से जुड़े जटिल विषयों पर उनका मार्गदर्शन मील का पत्थर साबित होता है।
मध्यप्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि इंदौरवासियों का सौभाग्य है कि उन्हें मुनि श्री का सान्निध्य प्राप्त हो रहा है। उन्होंने कहा कि चातुर्मास से पहले से ही शहरवासी उनके सान्निध्य का लाभ ले रहे हैं। इस अवसर पर कोटा भाजपा अध्यक्ष राकेश मंडानिया ने भी धर्मसभा को संबोधित किया।
मुनि श्री ने कहा कि जीवन में तप और त्याग दोनों का अपना महत्व है, लेकिन त्याग व्यक्ति के जीवन को नई ऊंचाई प्रदान करता है। बाहरी सुविधाओं के पीछे भागने के बजाय आत्मिक सुख की ओर बढ़ना ही जीवन की वास्तविक दिशा है।


