
लाडनूं | शाबाश इंडिया।
पर्युषण पर्व के चौथे दिन वाणी संयम दिवस के अवसर पर जैन विश्वभारती संस्थान में कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड़ के मार्गदर्शन एवं नेतृत्व में विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। अहिंसा एवं शांति विभाग की ओर से आयोजित कार्यक्रम की थीम ‘हमारे शब्द, हमारी जिम्मेदारी’ रही।

कार्यक्रम का शुभारंभ छात्राओं योगिता एवं तनिष्का के मधुर गायन से हुआ। दोनों ने राजस्थानी भाषा में ‘पर्युषण आयो रे, सबके मन भायो रे’ गीत प्रस्तुत कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
मुख्य वक्ता राजस्थानी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. लक्ष्मीकांत व्यास ने वाणी संयम दिवस पर अपने उद्बोधन में कहा कि वाणी संयम का अर्थ मन को नियंत्रण में रखना है। यदि व्यक्ति बौद्धिक स्थिरता और मानसिक संयम को अपनाता है तो वाणी में संयम की प्रवृत्ति सहज रूप से विकसित हो सकती है। उन्होंने कहा कि मन का संयमित होना वाणी संयम की पूर्व शर्त है। जब हम अपने मन को नियंत्रित कर लेते हैं तो अपनी वाणी को भी संयमित करना संभव हो जाता है।
प्रो. व्यास ने कहा कि जीवन में वाणी का संयम अत्यंत आवश्यक है। दो व्यक्तियों के बीच बातचीत हो रही हो तो अनावश्यक रूप से बीच में नहीं बोलना भी वाणी संयम का ही एक उदाहरण है। संयमित वाणी व्यक्ति के व्यवहार और व्यक्तित्व को सकारात्मक दिशा प्रदान करती है।
इसी क्रम में जैन एवं तुलनात्मक धर्म तथा दर्शन विभाग की सहायक आचार्य ईरिया जैन ने संयमित वाणी के आचरण को जीवन के लिए उपयोगी बताते हुए वाणी संयम के चार आयामों—सत्याणुव्रत, सत्यमहाव्रत, भाषा समिति एवं वचनगुप्ति—का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि ये चारों आयाम वाणी संयम के महत्वपूर्ण दार्शनिक तत्व माने जा सकते हैं।
कार्यक्रम संयोजिका एवं विभागाध्यक्ष प्रो. वंदना कुंडलिया ने उपस्थित विद्यार्थियों एवं संकाय सदस्यों के लिए वाणी संयम, वाणी की मधुरता तथा ‘क्या बोलें और कैसे बोलें’ से जुड़े विभिन्न व्यावहारिक प्रयोग करवाए। ये गतिविधियां विद्यार्थियों के लिए रुचिकर होने के साथ-साथ प्रेरणास्पद भी रहीं।
इस अवसर पर संस्थान के विशेषाधिकारी प्रो. अशोक जैतावत, प्रो. रेखा तिवाड़ी, प्रो. बी.एल. जैन, प्रो. युवराज सिंह खंगारोत, डॉ. रामदेव साहू सहित शैक्षणिक सदस्य एवं लगभग 300 विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के आयोजन में विभाग की सहायक आचार्य डॉ. लिपि जैन, डॉ. बलबीर सिंह, डॉ. रवीना टैगोर एवं विद्यार्थियों ने सक्रिय भूमिका निभाई।
मंच संचालन कालूकन्या महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. रविंद्र सिंह राठौड़ ने किया। कार्यक्रम के अंत में आयोजन समिति की ओर से सभी अतिथियों, प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया गया।
रिपोर्ट: शरद जैन सुधांशु


