
मुरैना | शाबाश इंडिया।
दिगंबर जैन समाज का आत्मशुद्धि, संयम और आत्मचिंतन का प्रमुख पर्व दशलक्षण महापर्व इस वर्ष 15 सितंबर से 25 सितंबर तक मनाया जाएगा। पर्व के दौरान नगर के विभिन्न जिन मंदिरों में प्रतिदिन दशलक्षण धर्म की विशेष पूजन, अभिषेक, स्वाध्याय, सामायिक, तप, ध्यान एवं धार्मिक प्रवचनों का आयोजन होगा।
वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने जानकारी देते हुए बताया कि जैन दर्शन में दशलक्षण धर्म किसी व्यक्ति विशेष के गुण नहीं, बल्कि शुद्ध आत्मा के स्वाभाविक गुण माने गए हैं। इसलिए दशलक्षण महापर्व बाहरी उत्सव के साथ-साथ आत्मा की आराधना, आत्मचिंतन और कषायों को कम करने का अवसर है।
उन्होंने बताया कि सामान्यतः दशलक्षण पर्व भाद्रपद शुक्ल पंचमी से भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी तक मनाया जाता है। इस वर्ष पंचमी की तिथि दो दिन होने के कारण पर्व की तिथियों को लेकर मतभेद की स्थिति बनी है। कुछ स्थानों पर आचार्यों के मतानुसार 16 सितंबर से पर्वारंभ माना जाएगा, जबकि 15 सितंबर से दशलक्षण पर्व की आराधना प्रारंभ करना उचित माना जा रहा है।
दस धर्म देते हैं आत्मशुद्धि का संदेश
उत्तम क्षमा — क्रोध और द्वेष का त्याग कर सभी जीवों के प्रति क्षमाभाव रखना।
उत्तम मार्दव — धन, पद, ज्ञान, रूप और प्रतिष्ठा आदि के अहंकार को छोड़कर विनम्रता अपनाना।
उत्तम आर्जव — मन, वचन और कर्म में सरलता रखना तथा कपट और छल से दूर रहना।
उत्तम शौच — लोभ और तृष्णा से मन को मुक्त करना। केवल बाहरी स्वच्छता ही नहीं, बल्कि भावों की निर्मलता को महत्व देना।
उत्तम सत्य — सत्य बोलना तथा हित, मित एवं प्रिय वचनों का प्रयोग करना।
उत्तम संयम — मन, वचन और शरीर पर नियंत्रण रखते हुए इंद्रियों को विषयों में अनियंत्रित रूप से प्रवृत्त न होने देना तथा जीवों की रक्षा करना।
उत्तम तप — उपवास, एकासन आदि बाह्य तप के साथ आंतरिक विकारों को दूर करने का प्रयास करना।
उत्तम त्याग — दान, सेवा और परोपकार के साथ राग-द्वेष एवं कषायों का त्याग करना।
उत्तम आकिंचन्य — ‘यह मेरा है’ की भावना को कम करते हुए वस्तुओं के प्रति आसक्ति का त्याग करना।
उत्तम ब्रह्मचर्य — इंद्रिय संयम के साथ पर-पदार्थों से हटकर निज आत्मा में रमण और आत्मचिंतन करना।
मंदिरों में होंगे धार्मिक आयोजन
दशलक्षण महापर्व के दौरान जैन धर्मावलंबी अपनी शक्ति एवं सामर्थ्य के अनुसार जिनेंद्र भगवान का अभिषेक एवं पूजन, दशलक्षण धर्म की दैनिक पूजा, स्वाध्याय, शास्त्र वाचन, सामायिक, प्रतिक्रमण, ध्यान, एकासन, उपवास, जीवदया एवं दान जैसे धार्मिक कार्य करेंगे। रात्रि में धार्मिक प्रवचन एवं अन्य आध्यात्मिक कार्यक्रम भी आयोजित होंगे।
डॉ. जैन ने कहा कि दशलक्षण पर्व में तप और व्रत की कठोरता प्रत्येक व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार रखता है। इसका उद्देश्य केवल शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि आत्मा के परिणामों को निर्मल करना है। दस दिनों में क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी कषायों को कम करने तथा क्षमाभाव एवं आत्मचिंतन को बढ़ाने का प्रयास किया जाता है।
उन्होंने कहा कि दशलक्षण महापर्व को केवल दस दिनों का धार्मिक पर्व मानना पर्याप्त नहीं है। यह जीवन को बेहतर बनाने वाली दस आध्यात्मिक शिक्षाओं का पर्व है, जो व्यक्ति को आत्मचिंतन, संयम और शुद्धात्मा की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है।

रिपोर्ट: मनोज जैन नायक


