
जयपुर | शाबाश इंडिया।
स्वाइन फ्लू आम तौर पर इन्फ्लुएंजा के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला पुराना नाम है। 2009 की महामारी के बाद एच1एन1 वायरस मानवों में मौसमी इन्फ्लुएंजा के रूप में प्रसारित होता रहा है। इसलिए वर्तमान समय में इसे मौसमी फ्लू का एक प्रकार कहना अधिक उचित है।
कारण
इन्फ्लुएंजा से संक्रमण, विशेषकर इन्फ्लुएंजा ए (एच1एन1), इसका प्रमुख कारण है। संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने या निकट संपर्क में आने से श्वसन बूंदों के माध्यम से संक्रमण फैल सकता है। संक्रमित हाथों से आंख, नाक या मुंह छूने पर भी संक्रमण हो सकता है। संक्रमण के बाद लक्षण सामान्यतः 1 से 4 दिन में शुरू हो सकते हैं।
प्रमुख लक्षण
- अचानक तेज बुखार होना
- सूखी खांसी आना
- गले में खराश
- नाक बहना या बंद होना
- सिरदर्द
- शरीर एवं मांसपेशियों में दर्द
- अत्यधिक थकान एवं कमजोरी
- कभी-कभी ठंड लगना
- बच्चों में उल्टी या दस्त भी हो सकते हैं
अधिकांश लोगों में बीमारी लगभग एक सप्ताह में ठीक हो जाती है, हालांकि खांसी कुछ समय तक बनी रह सकती है।
जांच
डॉक्टर लक्षणों तथा संक्रमित व्यक्ति के संपर्क या स्थानीय संक्रमण की स्थिति को देखते हुए प्रारंभिक निदान कर सकते हैं। पुष्टि के लिए नाक या गले से लिए गए श्वसन नमूने की जांच की जा सकती है। आवश्यकता के अनुसार इन्फ्लुएंजा सहित अन्य श्वसन वायरस की जांच भी की जा सकती है।
सावधानी और बचाव
फ्लू का वार्षिक टीकाकरण बचाव के प्रभावी उपायों में से एक है। इसके साथ—
- खांसते या छींकते समय मुंह-नाक को रुमाल या मास्क से ढकें।
- साबुन से हाथ नियमित रूप से धोएं।
- बीमार होने पर घर पर रहें और दूसरों से निकट संपर्क कम रखें।
- आंख, नाक और मुंह को बार-बार छूने से बचें।
- संक्रमण के समय भीड़भाड़ एवं बंद स्थानों में अतिरिक्त सावधानी बरतें।
बुजुर्गों, छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं तथा हृदय, फेफड़े, किडनी, लीवर या अन्य दीर्घकालिक बीमारियों से पीड़ित लोगों में जटिलताओं का जोखिम अधिक हो सकता है। ऐसे लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
उपचार
हल्के मामलों में सामान्यतः पर्याप्त आराम, पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थों का सेवन तथा बुखार या दर्द के लिए चिकित्सक की सलाह के अनुसार उपचार किया जाता है। संक्रमण दूसरों तक न फैले, इसके लिए बीमार व्यक्ति को दूसरों से दूरी बनाए रखना चाहिए।
जिन लोगों में गंभीर बीमारी का जोखिम अधिक है या जिनके लक्षण गंभीर हैं, उनमें चिकित्सक एंटीवायरल दवा जल्द शुरू करने की सलाह दे सकते हैं। उपचार शुरुआती समय में शुरू होने पर अधिक लाभ हो सकता है, इसलिए गंभीर लक्षणों में इलाज में देरी नहीं करनी चाहिए।
किसी भी दवा का सेवन स्वयं से न करें। चिकित्सक की सलाह से ही उपचार लें।
होम्योपैथिक उपचार के बारे में
होम्योपैथिक चिकित्सा में कुछ चिकित्सक लक्षणों के आधार पर ब्रायोनिया, जेल्सीमियम, यू-पेटोरियम पर्फोलीएटम, आर्सेनिक एल्बम आदि औषधियों का उपयोग करते हैं। हालांकि, होम्योपैथी को एंटीवायरल उपचार, चिकित्सकीय जांच या फ्लू टीकाकरण का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।
विशेषकर सांस लेने में परेशानी, लगातार तेज बुखार, सीने में दर्द, अत्यधिक कमजोरी, भ्रम या बेहोशी अथवा हालत तेजी से बिगड़ने पर तत्काल चिकित्सकीय सहायता लेना जरूरी है। ऐसे मामलों में विशेषज्ञ चिकित्सक की राय से ही उपचार कराया जाना चाहिए।
स्वास्थ्य संबंधी किसी भी गंभीर लक्षण में स्वयं उपचार करने के बजाय योग्य चिकित्सक से परामर्श लेना सबसे सुरक्षित उपाय है।


