Thursday, August 27, 2026

भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन

विजय कुमार जैन | राघौगढ़, मध्यप्रदेश

राघौगढ़ | शाबाश इंडिया।

भारतीय संस्कृति में पर्वों का प्राचीनकाल से विशेष महत्व रहा है। प्रत्येक त्यौहार के साथ धार्मिक मान्यताओं, सामाजिक एवं ऐतिहासिक घटनाओं का संयोग देखने को मिलता है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी अपना संदेश आम जनता तक पहुंचाने के लिए त्यौहारों एवं मेलों को मंच के रूप में उपयोग किया गया। ऐसा ही एक प्रमुख पर्व है रक्षाबंधन।

रक्षाबंधन भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का प्रमुख त्यौहार है, जो श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधकर उसके सुख, समृद्धि और दीर्घायु की कामना करती है। भाई भी बहन की रक्षा और सम्मान का संकल्प लेता है।

यह पर्व मात्र रक्षा का संदेश नहीं देता, बल्कि प्रेम, समर्पण, निष्ठा और संकल्प के माध्यम से हृदयों को जोड़ने का संदेश देता है। रक्षा सूत्र बिखरे हुए मोतियों को एक माला में पिरोने वाले धागे की तरह रिश्तों को जोड़ने और मजबूत करने का प्रतीक है।

भारतीय परंपरा में रक्षासूत्र से जुड़ी अनेक कथाएं प्रचलित हैं। पुराणों में इन्द्राणी द्वारा इन्द्र सहित देवताओं की कलाई पर रक्षासूत्र बांधने का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार राजा बलि और भगवान विष्णु से जुड़ी कथा भी रक्षाबंधन के महत्व को दर्शाती है। महाभारत से जुड़ी मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के हाथ में चोट लगने पर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का किनारा फाड़कर उनके घाव पर बांधा था। इसी स्नेह और आत्मीयता को रक्षा के पवित्र बंधन से जोड़ा जाता है।

इतिहास में भी रक्षाबंधन से जुड़ी अनेक घटनाओं का उल्लेख मिलता है। सिकंदर और पौरस के युद्ध से पहले रक्षा सूत्र के आदान-प्रदान की कथा प्रचलित है। मुगल काल में रानी कर्मवती द्वारा हुमायूं को राखी भेजे जाने की घटना भी रक्षाबंधन के सामाजिक एवं भावनात्मक स्वरूप को रेखांकित करती है।

स्वाधीनता आंदोलन के दौरान भी रक्षाबंधन को सामाजिक एकता और देशभक्ति से जोड़ा गया। वर्ष 1905 में बंग-भंग आंदोलन के दौरान लोगों ने एक-दूसरे को रक्षा सूत्र बांधकर एकता का संदेश दिया। रक्षाबंधन के अवसर पर भाई-बहन के रिश्ते के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का भाव भी मजबूत हुआ।

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में रक्षाबंधन अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाया जाता है। महाराष्ट्र के समुद्री क्षेत्रों में इसे नारियल पूर्णिमा के रूप में मनाने की परंपरा है। उत्तराखंड के चंपावत जिले के देवीधुरा में रक्षाबंधन के अवसर पर बाराही देवी की आराधना से जुड़ा पारंपरिक आयोजन भी होता है।

जैन धर्म में रक्षाबंधन का विशेष महत्व

जैन धर्म में रक्षाबंधन का संबंध 700 मुनिराजों की उपसर्ग से रक्षा की ऐतिहासिक-धार्मिक स्मृति से जोड़ा जाता है। जैन परंपरा के अनुसार आचार्य अकंपन सहित 700 मुनिराजों पर हस्तिनापुर में घोर उपसर्ग किया गया था। मुनि विष्णुकुमार ने अपनी वैक्रिय ऋद्धि के प्रभाव से उपसर्ग का निवारण करते हुए मुनिराजों की रक्षा की।

इसी घटना की स्मृति में जैन समाज में रक्षाबंधन को श्रमण संस्कृति रक्षा दिवस और वात्सल्य पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। इस अवसर पर जैन मंदिरों में श्रमण रक्षा विधान एवं पूजन किए जाते हैं तथा 700 मुनिराजों का स्मरण करते हुए अर्घ्य समर्पित किए जाते हैं। धर्म और संस्कृति की रक्षा के प्रतीक के रूप में रक्षा सूत्र बांधकर संकल्प लिया जाता है।

इसी क्रम में 28 अगस्त को इंदौर, मध्यप्रदेश में मुनि सुधासागर जी ससंघ के पावन सान्निध्य में श्रमण संस्कृति रक्षा विधान आयोजित किया जाएगा।

संस्कारों और नैतिक मूल्यों का पर्व

रक्षाबंधन केवल एक पारिवारिक उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में प्रेम, विश्वास, जिम्मेदारी और संरक्षण की भावना का प्रतीक है। आज आवश्यकता है कि हम आडंबर के बजाय इस पर्व के पीछे छिपे संस्कारों और नैतिक मूल्यों को समझें तथा उन्हें अपने जीवन में उतारें।

रक्षा केवल शरीर की नहीं, सम्मान और संस्कारों की भी होनी चाहिए। रक्षा केवल परिवार की नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और राष्ट्र की भी होनी चाहिए। यही भावना रक्षाबंधन पर्व को वास्तविक अर्थ प्रदान करती है।

विजय कुमार जैन
स्थायी अधिमान्य स्वतंत्र पत्रकार एवं भारतीय जैन मिलन के राष्ट्रीय संरक्षक
राघौगढ़, जिला गुना, मध्यप्रदेश
मो.: 9425137456
ई-मेल: vijayjainpatrakar@gmail.com

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