Friday, August 14, 2026

पुण्य-पुरुषार्थ संबल देते हैं, प्रमाद व्यक्ति को उसकी वास्तविकता से दूर कर देता है : युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी

तप आराधना में बढ़ा उत्साह, साध्वी सोम्याश्रीजी ने 23 उपवास का लिया प्रत्याख्यान

भीलवाड़ा | शाबाश इंडिया।

जीवन में परिस्थितियां कैसी भी हों, जिस व्यक्ति को अपने पुण्य और पुरुषार्थ पर विश्वास होता है, वह निराश नहीं होता और विपरीत परिस्थितियों के सामने अपना संतुलन नहीं खोता। सत्कर्मों से अर्जित पुण्य जीवन को संबल देता है और पुरुषार्थ उस संबल को सही दिशा देता है, लेकिन प्रमाद व्यक्ति की जागरूकता, आत्मभान और वास्तविक सामर्थ्य को कमजोर कर देता है। श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी ने शुक्रवार को शांतिभवन में आयोजित विशाल प्रवचन धर्मसभा में पुण्य, पुरुषार्थ और प्रमाद के संबंध को स्पष्ट करते हुए यह बात कही।

प्रसेनजीत-श्रेणीक के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने कहा कि पुण्य के साथ पुरुषार्थ का होना आवश्यक है। सत्कर्मों से पुण्य का संचय होता है, लेकिन विपरीत परिस्थितियों का सामना करने के लिए साहस, विश्वास और पुरुषार्थ चाहिए। जिस व्यक्ति को अपने पुण्य और पुरुषार्थ पर भरोसा होता है, उसके भीतर परिस्थितियों से जूझने की शक्ति बनी रहती है। ईर्ष्या और लोभ को मनुष्यता को कमजोर करने वाली प्रवृत्तियां बताते हुए उन्होंने इनके प्रति सजग रहने की आवश्यकता जताई।

श्रद्धा के संदर्भ में विवेकपूर्ण आस्था पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि किसी के कहने, भय या दबाव में अपनाई गई धार्मिकता वास्तविक श्रद्धा नहीं है। श्रद्धा हर दर पर झुकना नहीं, बल्कि विवेक के साथ आस्था रखना है। करुणा, सहयोग और परोपकार की भावना को जीवन की वास्तविक समृद्धि से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि सामर्थ्य और संपत्ति का मूल्य तभी है, जब उनका सदुपयोग दूसरों के हित में हो।

उन्होंने कहा कि प्रमाद केवल आलस्य नहीं, बल्कि असावधानी, आत्मभान का खो जाना, कर्तव्य से विमुख होना और आवश्यक कार्य को टालते रहना भी है। भगवान महावीर द्वारा गौतम स्वामी को समय मात्र का भी प्रमाद न करने की दी गई शिक्षा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्रमाद कर्मबंध का कारण है, जबकि अप्रमाद संवर का आधार है। जागरूकता बढ़ने के साथ आत्मपुरुषार्थ की दिशा भी स्पष्ट होती है।

स्थानांग सूत्र में बताए गए छह प्रमाद—मद्य, निद्रा, विषय, कषाय, जूत और प्रतिलेखना—की व्याख्या करते हुए उन्होंने इनके वर्तमान जीवन में दिखाई देने वाले रूपों की ओर ध्यान दिलाया। मद्य प्रमाद में केवल मादक पदार्थ ही नहीं, बल्कि धन, पद, प्रसिद्धि और युवावस्था का नशा भी व्यक्ति को अपनी वास्तविकता से दूर कर सकता है। नशे की सबसे बड़ी पहचान यही है कि व्यक्ति को अपनी वास्तविक स्थिति, संबंधों और दायित्वों का भान नहीं रहता।

कोरोना काल का उदाहरण देते हुए उन्होंने मृत्यु के माध्यम से संसार की वास्तविकता समझने की बात कही। किसी अपने की मृत्यु को सामने देखकर संसार की नश्वरता का जितना बोध होता है, उतना कई बार लंबे उपदेशों से भी नहीं हो पाता। ऐसी घटनाएं व्यक्ति को भीतर से जागृत करने का अवसर देती हैं, लेकिन उसके बाद भी जीवन में परिवर्तन न आए तो मनुष्य को अपने भीतर झांकने की आवश्यकता है।

निद्रा और विषय प्रमाद के संदर्भ में मोबाइल, मनोरंजन और इंद्रिय आकर्षण को लेकर सावधान करते हुए उन्होंने कहा कि अत्यधिक नींद और मोबाइल में व्यतीत होने वाला समय व्यक्ति को सक्रिय जीवन, आत्मचिंतन और जागरूकता से दूर करता है। सोने से पहले मोबाइल छोड़कर सकारात्मक विचार या अच्छा साहित्य पढ़ने की सलाह देते हुए उन्होंने कहा कि मन जिस भाव के साथ विश्राम करता है, उसका प्रभाव नींद और मानसिक स्थिति पर भी पड़ता है।

युवाचार्यश्री ने कषाय प्रमाद में क्रोध, मान, माया और लोभ को विवेक को ढकने वाली प्रवृत्तियां बताते हुए कहा कि कषाय के प्रभाव में व्यक्ति संबंधों और मर्यादाओं का भी भान खो सकता है। जूत प्रमाद के संदर्भ में ऑनलाइन बेटिंग और जुए की बढ़ती प्रवृत्ति से युवाओं को दूर रहने की प्रेरणा दी। इसे व्यक्ति की योग्यता और पुरुषार्थ पर विश्वास कमजोर कर गलत आकर्षण में फंसाने वाला बताया।

प्रतिलेखना प्रमाद को जीव-रक्षा और वस्तुओं की सार-संभाल से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि छोटी-सी असावधानी भी जीव विराधना का कारण बन सकती है। साधना केवल पूजा, सामायिक या संयम तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक कार्य में यत्न और जागरूकता से जुड़ी है।

उन्होंने कहा कि पुण्य जीवन को अवसर देता है, पुरुषार्थ उस अवसर को सार्थक करता है और अप्रमाद उसे आत्मकल्याण की दिशा देता है। इसलिए जीवन में मिली अनुकूलता, सामर्थ्य और मानव भव को प्रमाद में गंवाने के बजाय जागरूकता, संयम और आत्मपुरुषार्थ में लगाना ही जीवन की सार्थक दिशा है।

साध्वी चिंतनश्री ने कहा कि आजादी का संकल्प केवल शरीर तक सीमित नहीं, आत्मा पर लगे अशुभ कर्मों से मुक्ति का होना चाहिए। क्रोध, मान, माया और लोभ पर विजय पाकर कर्मों से लड़ना होगा। आत्मा को कर्मबंधनों से मुक्त कराना ही वास्तविक आजादी है।

इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने 3, 5 व 6 उपवास, आयंबिल, एकासन आदि तप के प्रत्याख्यान लिए। साध्वी सोम्याश्रीजी ने मासखमण की ओर अग्रसर 23 उपवास की तपस्या के लिए युवाचार्यश्री से प्रत्याख्यान ग्रहण किया।

शांतिभवन आनंद अनुभूति वर्षावास के मंत्री नवरतनमल भलावत एवं सुशील चपलोत ने बताया कि महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु सहित विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे गुरुभक्तों ने युवाचार्यश्री के दर्शन कर आशीर्वाद लिया।

उन्होंने बताया कि स्वतंत्रता दिवस पर युवाचार्यश्री के विशेष प्रवचन के साथ दोपहर में बच्चों की फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता होगी। रविवार दोपहर ‘मन की बात युवाचार्यश्री के साथ’ कार्यक्रम भी शांतिभवन में रखा गया है।

प्रवक्ता : सुनील चपलोत
मो. 9414730514
शांतिभवन, भोपालगंज, भीलवाड़ा

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