
जयपुर | शाबाश इंडिया।
जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकरों में वर्तमान अवसर्पिणी काल के तेईसवें तीर्थंकर भगवान श्री पार्श्वनाथ स्वामी हैं। भगवान पार्श्वनाथ ने घोर उपसर्गों को समतापूर्वक सहन कर आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। वर्तमान समय में भगवान पार्श्वनाथ के सर्वाधिक जिनबिंब एवं जिनालय देखने को मिलते हैं। उन्हें भक्तिभाव से ‘संकटमोचक पार्श्वनाथ’ भी कहा जाता है। भगवान पार्श्वनाथ के निर्वाणोत्सव को मोक्ष सप्तमी के रूप में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है।
दो भाई—कमठ और मरुभूति
शास्त्रों में भगवान पार्श्वनाथ के पूर्वभवों से संबंधित कमठ और मरुभूति का प्रसंग मिलता है। राजा अरविन्द के दो मंत्री कमठ और मरुभूति थे। कमठ बड़ा भाई था और उसकी प्रवृत्ति दुष्ट एवं दुर्व्यवहारी थी, जबकि मरुभूति सज्जन और सद्व्यवहारी था। एक बार मरुभूति राज्यकार्य से नगर से बाहर गया। इसी दौरान कमठ ने मरुभूति की पत्नी के साथ दुर्व्यवहार करने का प्रयास किया। राजा को जब इस घटना का पता चला तो उसने कमठ को देश से निष्कासित कर दिया। कमठ वन में जाकर तापस के रूप में रहने लगा और तपस्या करने लगा।
मरुभूति को जब पूरी घटना का पता चला तो भातृप्रेम के कारण वह कमठ के पास गया और क्षमा मांगते हुए उसे वापस घर चलने के लिए कहा। क्रोध से भरकर कमठ ने मरुभूति पर शिला पटक दी, जिससे उसका मरण हो गया। आगे के भवों में सम्यक् भावनाओं एवं आध्यात्मिक पुरुषार्थ के फलस्वरूप मरुभूति के जीव ने तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया और आगे चलकर भगवान पार्श्वनाथ के रूप में प्रकट हुआ।
वामा माता के गर्भ में तीर्थंकर का जीव
जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में वाराणसी नगरी में राजा अश्वसेन राज्य करते थे। उनकी महारानी वामादेवी के गर्भ से भगवान पार्श्वनाथ का जन्म हुआ। तीर्थंकर बालक के जन्म से संपूर्ण नगर में हर्ष और उल्लास छा गया। पूर्वभव में मरुभूति के जीव ने तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर आगे बढ़ते हुए भगवान पार्श्वनाथ के रूप में तीर्थंकर पद प्राप्त किया। वहीं कमठ का जीव आगे चलकर शम्बर नामक देव बना।
बालक पार्श्व और धरणेन्द्र-पद्मावती
भगवान पार्श्वनाथ के बाल्यकाल से संबंधित प्रसंगों में नागयुगल का उल्लेख मिलता है। एक बार बालक पार्श्व वन विहार करते हुए एक तपस्वी के पास पहुंचे। वह पंचाग्नि तप करते हुए लकड़ी फाड़ रहा था। भगवान पार्श्व ने अपनी दिव्य दृष्टि से जाना कि उस लकड़ी में नागयुगल है और उसे रोकने का प्रयास किया, लेकिन तपस्वी ने उनकी बात नहीं मानी।
लकड़ी के कटने से उसमें स्थित नागयुगल घायल हो गया। भगवान पार्श्वनाथ ने उन्हें धर्म का उपदेश देकर शांत भाव धारण कराया। नागयुगल ने समताभाव से शरीर का त्याग किया और आगे चलकर धरणेन्द्र एवं पद्मावती के रूप में देवगति को प्राप्त हुआ।
तीर्थंकर पर घोर उपसर्ग और उसका निवारण
भगवान पार्श्वनाथ जब तेला उपवास का नियम लेकर देवदारु वृक्ष के नीचे ध्यानमग्न थे, तब पूर्वभव के वैरभाव से ग्रस्त कमठ के जीव शम्बर नामक देव ने उन पर घोर उपसर्ग किए। वर्षा, आंधी और जलधारा सहित अनेक प्रकार के उपसर्ग किए गए, लेकिन भगवान पार्श्वनाथ अपने ध्यान और समता से तनिक भी विचलित नहीं हुए।
उसी समय पूर्व में भगवान पार्श्वनाथ द्वारा किए गए उपकार को स्मरण करते हुए धरणेन्द्र और पद्मावती प्रकट हुए और भगवान के उपसर्ग का निवारण किया। धरणेन्द्र ने अपने फणों से भगवान के ऊपर छत्र बनाया और पद्मावती ने भी उनकी रक्षा की। इसी प्रसंग के कारण भगवान पार्श्वनाथ के जिनबिंबों में उनके मस्तक के ऊपर सर्प के फणों का विशेष अंकन दिखाई देता है। सर्प भगवान पार्श्वनाथ का लांछन भी है।
अष्ट कर्मों का क्षय कर प्राप्त किया निर्वाण
भगवान पार्श्वनाथ ने कठोर साधना एवं तप के माध्यम से घातिया कर्मों का क्षय कर केवलज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद उन्होंने 1.25 योजन के समवसरण में दिव्यध्वनि के माध्यम से जीवों को धर्म का उपदेश दिया। श्रावण शुक्ल सप्तमी के दिन प्रातः बेला में भगवान पार्श्वनाथ ने समस्त कर्मों का क्षय कर सम्मेद शिखरजी के स्वर्णभद्र कूट से निर्वाण पद प्राप्त किया। इसी पावन स्मृति में प्रतिवर्ष मोक्ष सप्तमी का पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। मान्यता के अनुसार भगवान पार्श्वनाथ का आयु काल 278 वर्ष का रहा।
जयपुर में भगवान पार्श्वनाथ की 101 इंच ऊंची मनोहारी प्रतिमा
जैन नगरी जयपुर में ख्वास जी का रास्ता स्थित श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर लंबे समय से श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र रहा है। मंदिर में विराजमान जैन धर्म के तेईसवें तीर्थंकर श्री 1008 पार्श्वनाथ भगवान की अतिशयकारी पद्मासन प्रतिमा श्रद्धालुओं के लिए विशेष श्रद्धा का केंद्र है।
मंदिर के मध्य कसौटी पत्थर से निर्मित भगवान पार्श्वनाथ की लगभग 101 इंच ऊंची खड़गासन प्रतिमा विशेष आकर्षण का केंद्र है। एक ही पत्थर से निर्मित इस मनोहारी प्रतिमा के ऊपर सात फणों वाला सर्प तथा दोनों ओर चौबीस तीर्थंकरों की प्रतिमाओं का अंकन है। प्रतिमा की भव्यता और कलात्मकता श्रद्धालुओं को सहज ही आकर्षित करती है। प्रतिदिन यहां अभिषेक, दर्शन एवं पूजन के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।
मोक्ष सप्तमी महोत्सव
मोक्ष सप्तमी अर्थात भगवान पार्श्वनाथ के निर्वाणोत्सव के दिन जैन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, अभिषेक एवं शांतिधारा की जाती है। भगवान के निर्वाण की स्मृति में निर्वाण लाडू भी चढ़ाया जाता है।
जयपुर में संतों के सानिध्य में चित्रकूट, विवेक विहार, मंगल विहार, गोलोक, मुरलीपुरा, कमला नेहरू नगर, मीरा मार्ग, वरुण पथ, जनकपुरी, चूलगिरी, जग्गा की बावड़ी सहित अनेक जैन मंदिरों में मोक्ष सप्तमी के अवसर पर विशेष धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
भगवान पार्श्वनाथ के निर्वाणोत्सव पर हम सभी उनके समता, संयम और आत्मकल्याण के संदेश को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए उनके आदर्शों को जीवन में अपनाने का संकल्प लें।
पदम जैन बिलाला
जनकपुरी, जयपुर


