Thursday, August 13, 2026

माँ की ममता का कोई मोल नहीं

अनिल माथुर
ज्वाला-विहार, जोधपुर

“माँ”—यह केवल दो अक्षरों से बना एक छोटा-सा शब्द है, लेकिन इसके भीतर पूरी दुनिया की ममता, प्रेम, त्याग, करुणा, वात्सल्य और समर्पण समाया हुआ है। संसार में अनेक रिश्ते हैं और हर रिश्ते की अपनी महत्ता है, लेकिन माँ और संतान का रिश्ता सबसे अनमोल और पवित्र माना जाता है। माँ वह है, जो बच्चे को जन्म देने से पहले ही उससे प्रेम करने लगती है और जीवन के अंतिम क्षण तक उसकी चिंता करती रहती है। माँ की ममता का न कोई मूल्य लगाया जा सकता है और न ही उसे किसी तराजू में तौला जा सकता है।

माँ होती है बच्चे की पहली गुरु

माँ बच्चे की पहली गुरु होती है। बच्चा जब इस संसार में आता है, तो उसे न भाषा का ज्ञान होता है और न संसार की समझ। माँ ही उसकी पहली आवाज, पहली पाठशाला और पहली शिक्षक बनकर उसे चलना, बोलना, व्यवहार करना और दूसरों का सम्मान करना सिखाती है। माँ की गोद बच्चे के लिए संसार का सबसे सुरक्षित स्थान होती है।

माँ का प्रेम निःस्वार्थ होता है

दुनिया में अधिकांश रिश्तों में कहीं न कहीं अपेक्षाएँ जुड़ी होती हैं, लेकिन माँ का प्रेम अपेक्षाओं से परे होता है। बच्चा कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, उसके लिए माँ की चिंता कभी कम नहीं होती।

बेटा दूर किसी शहर में रहता हो तो माँ को उसकी चिंता रहती है—उसने खाना खाया या नहीं, समय पर सोया या नहीं, तबीयत ठीक है या नहीं। बेटी अपने घर चली जाए, तो भी माँ की चिंता उसके साथ रहती है। माँ के लिए संतान की उम्र बढ़ सकती है, लेकिन उसकी चिंता कभी बूढ़ी नहीं होती।

माँ बच्चे की सफलता में सबसे अधिक खुश होती है और उसकी असफलता में सबसे पहले उसका हाथ पकड़ती है। दुनिया भले ही असफल व्यक्ति से दूरी बना ले, लेकिन माँ अपने बच्चे को असफल नहीं मानती। वह कहती है—“कोई बात नहीं, फिर कोशिश करना।” यही माँ की ममता की सबसे बड़ी शक्ति है।

माँ का त्याग शब्दों में नहीं लिखा जा सकता

माँ अपने बच्चों के लिए जीवनभर अनेक त्याग करती है। कभी अपनी इच्छाएँ छोड़ देती है, कभी अपनी नींद, कभी अपनी सुविधा और कभी अपने सपने भी।

बच्चे के लिए वह रात-रात भर जागती है। बच्चे की बीमारी में उसकी आँखों से नींद गायब हो जाती है। बच्चे को भूख लगी हो तो वह अपनी भूख भूल जाती है। बच्चे को ठंड लग रही हो तो माँ अपने आँचल से उसे ढक देती है। बच्चे को कोई परेशानी हो तो उसका दर्द माँ स्वयं महसूस करती है।

माँ के त्याग का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि बच्चे बड़े होकर अक्सर उन त्यागों को भूल जाते हैं। जिस माँ ने उन्हें उंगली पकड़कर चलना सिखाया, उसी माँ की उंगली पकड़ने का समय कई बार बच्चे के पास नहीं होता।

माँ अपने बच्चों को संस्कार देती है

माँ केवल बच्चे का पालन-पोषण नहीं करती, बल्कि उसके व्यक्तित्व का निर्माण भी करती है। वह सिखाती है कि बड़ों का सम्मान कैसे करना है, छोटों से प्रेम कैसे करना है, जरूरतमंद की सहायता कैसे करनी है और कठिन परिस्थितियों में धैर्य कैसे रखना है।

माँ की कही छोटी-छोटी बातें जीवन में बड़े सिद्धांत बन जाती हैं—

“किसी का दिल मत दुखाना।”
“बड़ों का सम्मान करना।”
“मेहनत से कभी पीछे मत हटना।”
“मुश्किल समय में घबराना नहीं।”

ये साधारण वाक्य नहीं होते, बल्कि जीवनभर साथ चलने वाले संस्कार होते हैं।

इसीलिए कहा जाता है कि किसी भी समाज और राष्ट्र के निर्माण में माँ की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक संस्कारी माँ संस्कारी परिवार बनाती है और संस्कारी परिवार बेहतर समाज का निर्माण करता है।

माँ की ममता उम्र नहीं देखती

बच्चा चाहे पाँच वर्ष का हो या पचास वर्ष का, माँ की नजर में वह बच्चा ही रहता है। यही माँ के प्रेम की अद्भुत विशेषता है।

जब बेटा नौकरी पर जाने लगता है, माँ फिर भी पूछती है—“खाना खा लिया?”
जब बेटा विवाह कर लेता है, माँ पूछती है—“समय पर घर पहुँच जाना।”
जब बेटा स्वयं पिता बन जाता है, तब भी माँ उसके स्वास्थ्य और सुख की चिंता करती रहती है।

बच्चे के बाल सफेद हो जाते हैं, लेकिन माँ की आँखों में वह आज भी वही बच्चा रहता है, जिसे उसने कभी अपनी गोद में खिलाया था।

वृद्धावस्था में माँ को हमारी जरूरत होती है

जीवन का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि बचपन में हमें माँ की जरूरत होती है और वृद्धावस्था में माँ को हमारी जरूरत होती है।

जब हम छोटे थे, माँ ने हमारी हर आवश्यकता का ध्यान रखा। हमारे रोने पर वह दौड़कर आती थी। हमारे बीमार होने पर रातभर जागती थी। हमारे स्कूल जाने से लेकर हमारे भविष्य की चिंता तक उसने अपना जीवन लगा दिया।

लेकिन जब माँ वृद्ध हो जाती है, तो उसकी चाल धीमी हो जाती है। सुनने और देखने की क्षमता कम हो सकती है और शरीर पहले जैसा साथ नहीं देता। उस समय उसे महंगे उपहारों से अधिक समय, सम्मान और अपनापन चाहिए।

उसे यह महसूस होना चाहिए कि वह परिवार पर बोझ नहीं, बल्कि परिवार की सबसे महत्वपूर्ण सदस्य है।

वृद्ध माँ को यह नहीं चाहिए कि बेटा हर दिन उसके लिए बड़ी-बड़ी चीजें खरीदे। उसे तो बस इतना चाहिए कि बेटा कुछ देर उसके पास बैठे, उसकी बातें सुने, उसका हाथ थामे और प्यार से पूछे—“माँ, आज कैसी हो?”

कई बार ये छोटे-से शब्द माँ के लिए दुनिया की सबसे बड़ी खुशी बन जाते हैं।

माँ को वृद्धाश्रम नहीं, परिवार का प्यार चाहिए

आज बदलते सामाजिक परिवेश में वृद्ध माता-पिता की उपेक्षा एक गंभीर विषय बनता जा रहा है। व्यस्त जीवन, नौकरी, आर्थिक दबाव और पारिवारिक परिस्थितियों के बीच कई लोग अपने माता-पिता को पर्याप्त समय नहीं दे पाते।

वृद्धाश्रम कुछ परिस्थितियों में आवश्यक सहारा हो सकते हैं, लेकिन जिस माँ ने अपना पूरा जीवन परिवार को दिया हो, उसके लिए अपने ही घर में सम्मान और अपनापन सबसे बड़ा सहारा है।

हमें यह विचार करना चाहिए कि जिस माँ ने बचपन में हमें कभी अकेला नहीं छोड़ा, क्या वृद्धावस्था में उसे अकेला छोड़ देना उचित है?

माँ की ममता का ऋण चुकाया नहीं जा सकता

हम चाहे कितनी भी सेवा कर लें, माँ के त्याग का पूरा ऋण कभी नहीं चुका सकते। हम उसके लिए घर बना सकते हैं, सुविधाएँ दे सकते हैं और दवाइयाँ ला सकते हैं, लेकिन हमारे लिए किए गए उसके त्याग का मूल्य निर्धारित नहीं कर सकते।

माँ ने हमें जीवन दिया। उसने हमारी पहली मुस्कान देखी, हमारे पहले कदम देखे, हमारी पहली सफलता पर गर्व किया और हमारी असफलताओं में हमारा साथ दिया।

इसलिए माँ के प्रति हमारा दायित्व केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भावनात्मक भी है।

माँ की एक मुस्कान अनमोल है

माँ के चेहरे पर मुस्कान देखना किसी भी संतान के लिए सौभाग्य की बात है। जिस माँ ने जीवनभर हमारे चेहरे पर मुस्कान लाने का प्रयास किया, अब हमारी जिम्मेदारी है कि उसके चेहरे पर चिंता नहीं, संतोष की रेखाएँ हों।

कभी उसके पास बैठना, उसके पुराने दिनों की बातें सुनना, उसके अनुभवों को सम्मान देना, उसके साथ भोजन करना और उसके हाथों का स्पर्श महसूस करना—ये सभी बातें माँ के जीवन को सुख से भर सकती हैं।

माँ की यादें जीवनभर साथ रहती हैं

माँ हमेशा हमारे साथ नहीं रहती। जीवन का सत्य है कि एक दिन हमें माँ से बिछड़ना पड़ता है। उस समय उसके दिए संस्कार, उसकी बातें, उसका प्यार और उसकी यादें ही हमारे साथ रहती हैं।

कई लोग माँ के जाने के बाद कहते हैं—“काश, हम उनके साथ थोड़ा और समय बिताते।”

लेकिन तब समय वापस नहीं आता।

इसलिए जब माँ हमारे साथ है, तभी उसके प्रेम का सम्मान करना चाहिए। उसकी सेवा करने के लिए किसी विशेष दिन या अवसर की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए।

मातृ दिवस केवल एक दिन नहीं

आज हम ‘मदर्स डे’ पर माँ को शुभकामनाएँ देते हैं, फूल देते हैं और सोशल मीडिया पर तस्वीरें लगाते हैं। यह अच्छी बात है, लेकिन माँ के प्रति हमारा सम्मान केवल एक दिन तक सीमित नहीं होना चाहिए।

माँ के लिए हर दिन विशेष हो सकता है।

एक फोन कॉल,
एक प्यार भरा संदेश,
कुछ समय साथ बैठना,
उसकी बात ध्यान से सुनना,
उसकी जरूरत समझना—

ये छोटी-छोटी चीजें माँ के लिए बहुत बड़ी होती हैं।

माँ वास्तव में ईश्वर का दिया हुआ वरदान है

भारतीय संस्कृति में माँ को ईश्वर के समान सम्मान दिया गया है। “मातृ देवो भव” की भावना हमारे संस्कारों में गहराई से जुड़ी हुई है।

माँ के रूप में हमें केवल एक रिश्ता नहीं मिलता, बल्कि जीवनभर का प्रेम, मार्गदर्शन और आशीर्वाद मिलता है।

माँ घर की वह धुरी है, जिसके आसपास परिवार की भावनाएँ घूमती हैं। उसकी उपस्थिति घर में अपनापन पैदा करती है। उसकी आवाज घर को घर बनाती है और उसकी दुआएँ बच्चों के जीवन को शक्ति देती हैं।

निष्कर्ष

माँ की ममता वास्तव में अनमोल है। दुनिया की कोई संपत्ति, कोई पुरस्कार, कोई पद और कोई धन माँ के प्रेम की बराबरी नहीं कर सकता।

माँ ने हमारे बचपन को संभाला, हमारी जवानी को दिशा दी और हमारे जीवन की नींव मजबूत की। अब जब माँ को हमारी जरूरत है, तो हमारा कर्तव्य है कि हम उसके साथ खड़े रहें।

माँ को केवल प्रणाम करने की नहीं, उसे समझने की जरूरत है।
माँ को केवल उपहार देने की नहीं, उसे समय देने की जरूरत है।
माँ को केवल सम्मान देने की नहीं, उसे सम्मान के साथ जीने का अवसर देने की जरूरत है।

याद रखिए—

जिस घर में माँ मुस्कुराती है, वहाँ खुशियाँ अपने आप चली आती हैं।

जिस घर में माँ का सम्मान होता है, वहाँ संस्कार पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं।

और जिस हृदय में माँ के लिए सम्मान होता है, वह हृदय कभी गरीब नहीं होता।

माँ का प्रेम समुद्र से भी गहरा और आकाश से भी विशाल है। उसे न खरीदा जा सकता है, न उसका मूल्य लगाया जा सकता है।

सच ही कहा गया है—

“माँ की ममता का कोई मोल नहीं,
माँ के आँचल से बढ़कर कोई अनमोल नहीं।”

अनिल माथुर
ज्वाला-विहार, जोधपुर

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