Thursday, August 13, 2026

विश्व प्रसिद्ध प्राचीन जैन तीर्थ नवागढ़

घुवारा | शाबाश इंडिया।

उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में स्थित प्राचीन जैन तीर्थ नवागढ़ धार्मिक आस्था, पुरातात्विक विरासत और प्राचीन भारतीय संस्कृति का अद्भुत संगम है। यह क्षेत्र न केवल जैन समाज के लिए श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है, बल्कि यहां प्राप्त प्राचीन मूर्तियां, शैलचित्र, शिल्पकृतियां और अन्य पुरासंपदाएं हजारों वर्षों की मानव सभ्यता की कहानी भी कहती हैं।

क्षेत्र का इतिहास

सन 1959 में पंडित गुलाबचंद जी पुष्प ककरवाहा व्यापार के सिलसिले में नाबई (नवागढ़) गांव से निकले। यहां एक टीले के ऊपर विशाल इमली के पेड़ के नीचे उन्हें अनेक खंडित जैन प्रतिमाएं दिखाई दीं। ग्रामीण वहां नारियल फोड़कर मनौती मांगते थे। ग्रामीणों के अनुसार यहां आने से अनेक विपत्तियों का निवारण होता था।

पंडित गुलाबचंद जी पुष्प के अथक प्रयासों से कुछ ही दिनों में इमली का पेड़ हटवाया गया। टीले की खुदाई के दौरान जमीन से लगभग 10 फीट नीचे करीब 1000 वर्ष प्राचीन 4.75 फीट ऊंची अरहनाथ भगवान की प्रतिमा प्राप्त हुई। प्रतिमा के दर्शन के बाद पंडित पुष्प जी ने इसी स्थान पर प्रतिमा की पुनः प्रतिष्ठा कराने और क्षेत्र के विकास का संकल्प लिया।

वर्तमान स्थिति

नवागढ़ में अरहनाथ स्वामी चक्रवर्ती के 14 रत्नों एवं 9 निधियों की कलात्मक शिल्पकला और वैभव का अंकन विशेष आकर्षण का केंद्र है। यहां की प्राचीन कलाकृतियां जैन कला एवं भारतीय शिल्प परंपरा की समृद्ध विरासत को दर्शाती हैं।

प्रागैतिहासिक क्षेत्र की प्राचीनता

नवागढ़ क्षेत्र की प्राचीनता केवल जैन धर्म तक सीमित नहीं है। सिद्धों की टोरिया में पाए गए पैटालिक रॉक कप मार्क लगभग 10 हजार वर्ष पुरानी मानव सभ्यता के साक्ष्य माने जाते हैं।

ब्र. जय निशांत जी द्वारा अन्वेषित कच्छप शिला की चित्रित शैलचित्र श्रृंखलाएं लगभग 6 से 8 हजार वर्ष पूर्व की विकसित मानव सभ्यता की ओर संकेत करती हैं। मिट्टी एवं पाषाण के मनके भी लगभग 2 हजार वर्ष से निरंतर मानवीय सभ्यता के प्रत्यक्ष साक्ष्य माने जाते हैं।

बुंदेलखंड के इतिहास में नवागढ़

मदनपुर के अभिलेखों के अनुसार सन 1182 ईस्वी में चंदेल शासक परमर्दिदेव से युद्ध करते हुए पृथ्वीराज चौहान ने महोबा, लासपुर, मदनपुर के साथ नवागढ़ को भी ध्वस्त किया था। इसके बावजूद इस क्षेत्र की अनेक प्राचीन धरोहरों का सुरक्षित रहना अपने आप में महत्वपूर्ण है।

पुरातन साधना स्थली

नवागढ़ के बीहड़ क्षेत्र में प्राकृतिक प्राचीन शैलाश्रय और गुफाएं भी मौजूद हैं। 11 जून 2015 को कुछ विशेष गुफाओं की खोज की गई, जो इस क्षेत्र की प्राचीन साधना और मानवीय गतिविधियों के अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

प्राचीन संग्रहालय

नवागढ़ में खनन एवं उत्खनन से प्राप्त प्रतिहारकालीन 8 फीट ऊंची भगवान आदिनाथ की प्रतिमा, 15 फीट ऊंची भगवान शांतिनाथ की प्रतिमा, पद्मासन भगवान पारसनाथ की प्रतिमा, विशाल तोरण सहित अनेक विशिष्ट शिल्पकृतियां संग्रहित हैं। यहां लगभग 200 कलाकृतियां क्षेत्र की गौरवशाली पुरातात्विक विरासत की साक्षी हैं।

संरक्षण की आवश्यकता

हजारों वर्ष पुरानी इन कलाकृतियों का लगातार क्षरण चिंता का विषय है। इन विशिष्ट पुरासंपदाओं का सावधानीपूर्वक वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित रासायनिक प्रक्रिया के माध्यम से संरक्षण किया जाना आवश्यक है। समय रहते संरक्षण नहीं किया गया तो यह अमूल्य धरोहर नष्ट हो सकती है।

विलक्षण कलाकृतियां

नवागढ़ में अनेक विशिष्ट कलाकृतियां आकर्षण का केंद्र हैं, जिनमें पंचतीर्थ पारसनाथ, राजकुमार अकलंक-निकलंक, उपाध्याय बिम्ब, राजकुमार अरहनाथ तथा तीर्थंकर माता के अद्भुत दर्शन विशेष उल्लेखनीय हैं।

भविष्य की संभावनाएं

ग्रामीण अंचलों में स्थित इस ऐतिहासिक क्षेत्र में पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण और भी अवशेष मिलने की संभावनाएं हैं। व्यवस्थित सर्वेक्षण एवं वैज्ञानिक उत्खनन से पाषाणकालीन सभ्यता और प्राचीन भारतीय संस्कृति से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।

क्षेत्र के अतिशय

विध्वंस की घटनाओं के बावजूद मूलनायक अरहनाथ भगवान की प्रतिमा का सुरक्षित रहना श्रद्धालुओं के लिए स्वयं एक बड़ा अतिशय माना जाता है। क्षेत्र से जुड़े श्रद्धालु देवों द्वारा अभिषेक, आंखों की ज्योति प्राप्त होने, पैरों का दर्द ठीक होने, शारीरिक एवं मानसिक बाधाओं के दूर होने तथा अन्य चमत्कारिक अनुभवों का उल्लेख करते हैं। इन मान्यताओं के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है।

संतों का समागम

नवागढ़ क्षेत्र में आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज, आचार्य श्री विराग सागर जी महाराज सहित अनेक महान साधु-साध्वी संघों का आगमन हुआ है। संतों के दर्शन एवं आशीर्वाद से इस क्षेत्र की धार्मिक प्रतिष्ठा और अधिक बढ़ी है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी ने किया पुरासंपदा का अवलोकन

मई 2018 में आचार्य भगवंत श्री विद्यासागर जी महाराज ने नवागढ़ में संग्रहित प्राचीन पुरासंपदा का अवलोकन किया। उनके द्वारा क्षेत्र की ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक विरासत को देखना नवागढ़ के लिए महत्वपूर्ण अवसर रहा।

श्री नवागढ़ गुरुकुलम

पंडित गुलाबचंद जी पुष्प प्रतिष्ठाचार्य की स्मृति में श्री नवागढ़ गुरुकुलम की स्थापना की गई है। ब्र. जय निशांत जी के निर्देशन में पुष्प परिवार एवं नवागढ़ समिति के सहयोग से श्री नवागढ़ गुरुकुलम ट्रस्ट द्वारा इसका संचालन किया जा रहा है।

वार्षिक मेला

फाल्गुन शुक्ल तृतीया को नवागढ़ में वार्षिक मेला आयोजित होता है। इस अवसर पर वर्ष में एक बार होने वाला महा-मस्तकाभिषेक भी श्रद्धा और भक्ति के साथ संपन्न होता है।

पंचकल्याणक महोत्सव

नवागढ़ में संवत् 1123 से लेकर संवत् 2077 तक सात पंचकल्याणक महोत्सव संपन्न हो चुके हैं। यह क्षेत्र की दीर्घकालीन धार्मिक परंपरा और जैन समाज की आस्था का प्रमाण है।

वृत्ति आश्रम

उत्कृष्ट साधकों तथा त्यागी वृत्ति वाले श्रावक-श्राविकाओं के लिए वर्ष 2009 से वृत्ति आश्रम संचालित किया जा रहा है।

मानव सेवा कार्य

नवागढ़ ट्रस्ट द्वारा समय-समय पर मानव सेवा के कार्य भी किए जाते हैं। विशेष रोग निदान एवं चिकित्सा शिविर, कंप्यूटर द्वारा नेत्र परीक्षण एवं ऑपरेशन, वस्त्र, कंबल और अन्न वितरण जैसे सेवा कार्य आयोजित किए जाते हैं।

यात्रियों के लिए सुविधाएं

नवागढ़ में विधान, स्वाध्याय एवं चौका सहित धार्मिक आयोजनों की सुविधाएं उपलब्ध हैं। शादी-विवाह जैसे सामाजिक कार्यक्रमों के लिए भी व्यवस्थाएं हैं। यात्रियों के आवास के लिए धर्मशाला, भोजनालय सहित आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध हैं।

गौशाला

क्षेत्र में गौशाला का संचालन भी किया जा रहा है, जिसके माध्यम से गोसेवा का कार्य निरंतर जारी है।

पंडित गुलाबचंद जी पुष्प का योगदान

भारतवर्ष के लगभग सभी प्रदेशों में सैकड़ों गजरथ एवं पंचकल्याणक प्रतिष्ठाओं को सफलता एवं श्रद्धापूर्वक संपन्न कराने वाले प्रतिष्ठा पितामह पंडित श्री गुलाबचंद जी पुष्प ने आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से शुभाशीष प्राप्त किया था।

अपने जीवन के अंतिम चरण में उन्होंने अपनी समस्त विद्या एवं दायित्व अपने चतुर्थ पुत्र बाल ब्रह्मचारी भैया जय निशांत जी को सौंप दिए। 5 जनवरी 2015 को पंडित गुलाबचंद जी पुष्प ने पूर्ण चेतना के साथ जीवन साधना को सार्थक करते हुए समाधिपूर्वक देह का त्याग किया।

नवागढ़ केवल एक प्राचीन जैन तीर्थ नहीं, बल्कि धर्म, इतिहास, पुरातत्व, कला और भारतीय संस्कृति की अमूल्य विरासत है। आवश्यकता है कि इस क्षेत्र की धार्मिक आस्था के साथ-साथ यहां मौजूद प्राचीन पुरासंपदा का वैज्ञानिक संरक्षण और व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस गौरवशाली विरासत को देख और समझ सकें।

मीडिया प्रभारी
भरत सेठ
घुवारा

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