
जयपुर | शाबाश इंडिया।
देशभक्ति केवल एक शब्द नहीं, बल्कि व्यक्ति के व्यक्तित्व की गरिमा और जीवन का प्राणतत्व है। देशप्रेम जहां एक सुगंधित पुष्प है, वहीं देशभक्ति उसका अमृततुल्य फल है। जननी और जन्मभूमि को स्वर्ग से भी महान माना गया है। ऐसे में देश की पावन परंपरा, संस्कृति, अस्मिता और गरिमा की रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। यह विचार ऋचा चंद्राकर ‘तत्वाकांक्षी’ ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि जिस पावन दिवस पर हमारा देश स्वतंत्र हुआ, उसके पीछे अनगिनत कर्मवीरों, शूरवीरों, साहसी योद्धाओं और सत्याग्रहियों का अमूल्य त्याग एवं समर्पण रहा है। इसलिए स्वतंत्रता दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि उन अमर शहीदों के योगदान को स्मरण करने और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भी दिन है।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता केवल प्राप्त करने की वस्तु नहीं, बल्कि उसका संरक्षण और संवर्धन हमारी सर्वोच्च जिम्मेदारी है। जब हम तिरंगे को लहराते हैं तो वह केवल एक ध्वज नहीं, बल्कि हजारों बलिदानों और देशवासियों की आशाओं का प्रतीक बनकर सामने आता है।
शूरवीरों का त्याग बना स्वतंत्रता का आधार
ऋचा चंद्राकर ने कहा कि हमारे शूरवीरों का त्याग, बलिदान और राष्ट्रप्रेम ही स्वतंत्रता की सबसे बड़ी ताकत बना। उन्होंने अपने निस्वार्थ कर्मों से राष्ट्र के लिए जो योगदान दिया, वह गीता के निष्काम कर्मयोग का उदाहरण बन गया। राष्ट्ररक्षा के रणक्षेत्र में वे महान योद्धाओं की तरह मातृभूमि के लिए समर्पित रहे। यही कारण है कि वे आज भी हमारे लिए प्रेरणा और श्रद्धा के पात्र हैं।
उन्होंने कहा कि महान व्यक्तित्व वही होते हैं जो अपने निस्वार्थ कर्मों से परिवार, समाज, प्रदेश, राष्ट्र और संपूर्ण मानवता के लिए प्रेरणास्रोत बनते हैं।
कर्म और सेवा में दिखाई दे देशभक्ति
वर्तमान पीढ़ी को यह समझना होगा कि देशभक्ति केवल भाषणों, नारों या घोषणाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यह हमारे आचरण, कर्तव्यपरायणता, सेवा और जिम्मेदारियों के निर्वहन में दिखाई देनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि वर्तमान दौर में भोगवाद, स्वार्थ और नैतिक मूल्यों में गिरावट जैसी प्रवृत्तियां राष्ट्र चेतना को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे समय में प्रत्येक नागरिक को संकल्प लेना चाहिए कि देशभक्ति को केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति तक सीमित न रखकर निःस्वार्थ सेवा, परिश्रम, ईमानदारी और त्यागपूर्ण आचरण के माध्यम से जीवन में उतारा जाए।
स्वतंत्रता संग्राम में सबका योगदान
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम किसी एक वर्ग, धर्म, जाति या समूह का संघर्ष नहीं था। इसमें सभी धर्मों और जातियों के लोगों के साथ अमीर-गरीब, शिक्षित-अशिक्षित, महिला-पुरुष सहित समाज के विभिन्न वर्गों ने अपनी भूमिका निभाई। उनके सामूहिक संघर्ष और बलिदान से ही भारत स्वतंत्र हुआ।
उन्होंने कहा कि इतिहास के पन्नों में कुछ प्रमुख नेताओं के नाम अधिक प्रमुखता से दर्ज हुए, लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन में असंख्य ऐसे लोगों का भी योगदान रहा, जिनका नाम शायद इतिहास में दर्ज नहीं हो पाया। उनका योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण और सम्माननीय है। उन्होंने जो कर्म किया, वह राष्ट्र के लिए गीता के कर्मयोग के समान बन गया।
शहीदों को श्रद्धांजलि
अपने भाव व्यक्त करते हुए ऋचा चंद्राकर ने कहा—
“मरकर के वो अमर हो गए, हम जीकर के क्या पाए हैं?
मरना उनका पर्व हो गया, दुश्मन भी गुण को गाए हैं।
ओ शहीद के मठ पर हम सब फूल चढ़ाने जाते हैं,
पत्थर के मठ पर ही देखो हम सब सुकून पा पाते हैं।”
उन्होंने आगे कहा—
“पत्थर पर मानो फूल चढ़ा तुम सब ये साबित करते हो,
ये कोई पाषाण नहीं, प्रतिमा नहीं, साक्षात यहां तुम बैठे हो।
जिसके पाषाण में ये दम है कि सहसा तुम झुक जाते हो,
अश्रु अंश दो अश्क चढ़ा, परम गौरव पा जाते हो।”
अंत में उन्होंने आह्वान किया कि स्वतंत्रता दिवस के इस पावन अवसर पर प्रत्येक नागरिक राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका निभाने का संकल्प ले। अपने आचरण और कर्मों से परिवार, समाज, प्रदेश और राष्ट्र में अनुकरणीय आदर्श स्थापित करते हुए भारत को विकास और वैभव के शिखर तक पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयासरत रहना ही सच्ची देशभक्ति है।
वन्दे मातरम्! जयतु भारतम्!
ऋचा चंद्राकर ‘तत्वाकांक्षी’


