
उदयपुर | शाबाश इंडिया।
मारवा की गंभीरता, गौड़ मल्हार की रिमझिम और तबले की दमदार थाप ने ‘मल्हार’ उत्सव की पहली संध्या को यादगार बना दिया। पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र की ओर से आयोजित दो दिवसीय ‘मल्हार’ उत्सव के तहत शनिवार को शिल्पग्राम स्थित दर्पण सभागार में भारतीय शास्त्रीय संगीत के विविध रंग देखने-सुनने को मिले।
सभागार के बाहर भले ही सावन की रिमझिम कम नजर आई, लेकिन भीतर सुरों ने बरसात का ऐसा संसार रचा कि श्रोता संगीत की भावभूमि में डूबते चले गए। कहीं राग मारवा की गंभीर और आत्ममंथन करती स्वर-छाया सुनाई दी तो कहीं गौड़ मल्हार के स्वरों में मेघों की उमड़न, बूंदों की रिमझिम और वर्षा के उल्लास की अनुभूति हुई। तबले पर पुष्कराज जोशी और हारमोनियम पर सुप्रिया मोड़क जोशी की संगत ने प्रस्तुतियों को और प्रभावशाली बनाया।
कार्यक्रम का शुभारंभ केंद्र निदेशक डॉ. अश्विन एम. दलवी, पूर्व केंद्र निदेशक फुरकान खान एवं कलाकार विनायक चित्तर ने दीप प्रज्वलित कर किया।
राग मारवा से हुई सुरमयी शुरुआत
विदुषी गौरी पाठारे ने राग मारवा से संध्या का आगाज किया। विलंबित झूमरा ताल में निबद्ध ख्याल को उन्होंने बेहद ठहराव और संयम के साथ प्रस्तुत किया। आलाप और तानों के सहज विस्तार ने राग की गंभीरता और भावात्मक गहराई को प्रभावी ढंग से सामने रखा।
इसके बाद द्रुत तीनताल की बंदिश ने प्रस्तुति में गति और चंचलता भर दी। राग मारवा के बाद गौरी पाठारे ने राग गौड़ मल्हार प्रस्तुत किया तो वातावरण मानो सावन के रंग में रंग गया। स्वरों में बादलों की उमड़न, बूंदों की फुहार और वर्षा के उल्लास का सुंदर अहसास हुआ।
कार्यक्रम के अंत में कजरी की प्रस्तुति ने शास्त्रीय संगीत को लोक परंपरा से जोड़ते हुए आत्मीय समापन दिया।
तबले की थाप ने बांधा समां
संध्या का दूसरा हिस्सा तबला वादन को समर्पित रहा। हेतल मेहता जोशी ने विलंबित धमार में एकल वादन की शुरुआत की और ताल की गंभीरता तथा वीर रस को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। उठान, चलन, चारी, बांट, रेला, उपज और विभिन्न तिहाइयों के माध्यम से उन्होंने तबले की पारंपरिक संरचना में अपनी सृजनशीलता का परिचय दिया।
मध्यलय तीनताल में पहुंचते ही वादन और अधिक संवादपूर्ण हो गया। पारंपरिक रचनाओं के साथ मौलिक टुकड़ों ने प्रस्तुति में नई ऊर्जा भर दी। राजेंद्र बनर्जी की हारमोनियम लेहरा संगत ने तबले की लयकारी को मजबूत आधार प्रदान किया।
‘मल्हार’ की पहली संध्या ने यह संदेश दिया कि मल्हार केवल वर्षा ऋतु का नाम नहीं, बल्कि भारतीय संगीत में प्रकृति, भाव और साधना के अद्भुत संगम का प्रतीक भी है।
इस अवसर पर केंद्र उप निदेशक कार्यक्रम पवन अमरावत, सहायक निदेशक दुर्गेश चंदवानी, अधीक्षण अभियंता सी.एल. सालवी, कार्यक्रम अधिशासी हेमंत मेहता, सिद्धांत भटनागर, दयाराम सुथार, दीपक नवलखा, सुनील निमावत, महेंद्र सिंह गहलोत, निखिल वर्मा सहित अन्य सदस्य मौजूद रहे।
आज सितार और मोहिनीअट्टम की प्रस्तुति
‘मल्हार’ उत्सव की दूसरी संध्या रविवार 9 अगस्त को शाम 7 बजे आयोजित होगी। इसमें विनायक चित्तर सितार वादन प्रस्तुत करेंगे, जबकि पल्लवी कृष्णन मोहिनीअट्टम की प्रस्तुति देंगी। कार्यक्रम में संगीत एवं कला प्रेमियों के लिए प्रवेश निःशुल्क रहेगा।
रिपोर्ट: राकेश शर्मा ‘राजदीप’


