
भीलवाड़ा | शाबाश इंडिया।
शांतिभवन में चातुर्मासार्थ विराजित श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी ने कहा कि सत्य केवल बोलने योग्य शब्द नहीं, बल्कि जीने योग्य जीवन-दृष्टि है। सत्य ही भगवान है। विज्ञान भौतिक जगत में सत्य की खोज करता है, जबकि दर्शन आध्यात्मिक जगत में उसकी तलाश करता है। आगमों में वर्णित ‘सच्चं खलु भगवं’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सत्य को जानना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उसे जीवन में उतारना ही उसकी वास्तविक उपलब्धि है।
विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए युवाचार्यश्री ने कहा कि स्थानांग सूत्र में वर्णित सत्य के चार स्वरूप जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं। काया की ऋजुता का अर्थ केवल शरीर को सीधा रखना नहीं, बल्कि प्रत्येक कार्य में सजगता, सामंजस्य और अहिंसा का भाव रखना है। उन्होंने कहा कि चलना, बैठना, भोजन करना, विश्राम करना अथवा कोई भी कार्य करना पूर्ण जागरूकता और एकाग्रता के साथ होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि शरीर की ऋजुता व्यक्ति के व्यक्तित्व की मौन भाषा है। मन के स्तर पर भी सजगता आवश्यक है। चिंता व्यक्ति को अशांत बनाती है, जबकि चिंतन जीवन को सार्थक दिशा देता है। इसलिए प्रत्येक कार्य यत्नपूर्वक और सजगता के साथ करना चाहिए।
युवाचार्यश्री ने कहा कि सत्य की दूसरी अभिव्यक्ति भाषा की ऋजुता में दिखाई देती है। वाणी छल, कपट और भ्रम से मुक्त होनी चाहिए। शब्दों से किसी को प्रभावित किया जा सकता है, लेकिन विश्वास केवल निष्कपट वाणी से ही अर्जित होता है। भाषा में स्पष्टता, मधुरता, हितभाव और संवेदना का समावेश आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि भावों की ऋजुता सत्य की सबसे गहरी भूमि है। मन में सरलता, निष्कपटता और निर्मलता हो तो सत्य केवल कथन नहीं रहता, बल्कि जीवन का अनुभव बन जाता है। गौतम स्वामी का भगवान महावीर के प्रति सहज समर्पण इसी भाव-सरलता का श्रेष्ठ उदाहरण है।
युवाचार्यश्री ने कहा कि सत्य की पूर्णता मन, वचन और कर्म की एकरूपता में निहित है। यदि विचार, वाणी और आचरण अलग-अलग हों तो सत्य अधूरा रह जाता है। जब काया में सजगता, वाणी में निष्कपटता और भावों में निर्मलता का समन्वय होता है, तब सत्य जीवन में साकार हो जाता है।
धर्मसभा के दौरान युवाचार्यश्री ने तपस्या में रत साधकों एवं आगामी तप आराधना के लिए आगे बढ़ रहे तपस्वियों को प्रत्याख्यान करवाए। उन्होंने साध्वी प्रतिभाजी, महासती पीयूषदर्शनाजी, साध्वी काव्याश्री सहित साध्वीवृंद की तपस्या की सुखसाता पूछते हुए मंगलाशीष प्रदान किए। इसी अवसर पर श्रेणीक चारित्र का शुभारंभ भी हुआ।
धर्मसभा में चेन्नई, महाराष्ट्र, गुजरात सहित विभिन्न राज्यों से आए श्रद्धालुओं के साथ भीलवाड़ा शहर एवं आसपास के श्रीसंघों से बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहीं।
शांतिभवन श्रीसंघ के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद चीपड़ एवं मंत्री नवरतनमल भलावल ने बताया कि रविवार को युवाचार्यश्री के सान्निध्य में विशेष प्रवचन के साथ 12 से 21 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों के लिए ‘मन की बात’ संवाद एवं ‘आनंद बाल शिविर’ आयोजित किया जाएगा। इसी दिन सिद्धि तप आराधना का शुभारंभ भी होगा।


