
जयपुर | शाबाश इंडिया।
वीर शासन जयंती जैन धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं पावन पर्व है, जो प्रतिवर्ष श्रावण कृष्ण प्रतिपदा (एकम) को मनाया जाता है। यह वह ऐतिहासिक दिन है जब केवलज्ञान प्राप्ति के बाद तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी की प्रथम दिव्य देशना (दिव्य वाणी) प्रकट हुई थी।
आज 21वीं सदी में जब विश्व युद्ध, हिंसा, प्रदूषण, तनाव और भौतिकता की चुनौतियों से जूझ रहा है, तब भगवान महावीर स्वामी का “जियो और जीने दो” का संदेश केवल धार्मिक विचार नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के कल्याण का मार्ग बन गया है।
भगवान महावीर का अहिंसा का सिद्धांत आज युद्ध और हिंसा के दौर में अत्यंत प्रासंगिक है। विश्व के विभिन्न हिस्सों में चल रहे संघर्ष, आतंकवाद, सामाजिक हिंसा और बढ़ती कटुता के बीच महावीर का संदेश है कि समस्याओं का समाधान संवाद और करुणा से किया जाना चाहिए, हिंसा से नहीं। परिवार, समाज और व्यक्तिगत जीवन में भी क्षमा एवं संयम का भाव अपनाकर शांति स्थापित की जा सकती है।
पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी भगवान महावीर के विचार मार्गदर्शक हैं। पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं और सूक्ष्म जीवों तक के प्रति दया का भाव आज पूरी दुनिया को पर्यावरण संतुलन का महत्वपूर्ण संदेश देता है। वास्तविक वीर वही है जो दूसरों को अभय प्रदान करे।
भगवान महावीर का अनेकांतवाद आज बढ़ती कट्टरता और वैचारिक टकराव के दौर में सहिष्णुता का आधार है। अनेकांत हमें सिखाता है कि सत्य के अनेक पहलू हो सकते हैं और किसी भी विषय को समझने के लिए दूसरे के दृष्टिकोण का सम्मान आवश्यक है। परिवार, समाज और डिजिटल दुनिया में संवाद एवं समझ की भावना अनेक विवादों को समाप्त कर सकती है।
वर्तमान उपभोक्तावादी युग में भगवान महावीर का अपरिग्रह सिद्धांत भी अत्यंत उपयोगी है। आवश्यकता से अधिक संग्रह तनाव, असंतोष और पर्यावरण विनाश का कारण बनता है। आज दुनिया जिस मिनिमल लाइफ और सस्टेनेबल जीवनशैली की बात कर रही है, वह कहीं न कहीं अपरिग्रह की ही भावना है। कम साधनों में संतोष और मानसिक शांति का मार्ग महावीर के सिद्धांतों से मिलता है।
सत्य और अचौर्य का सिद्धांत भी आज के समय में महत्वपूर्ण है। फेक न्यूज, डिजिटल धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार और अनैतिक आचरण के दौर में भगवान महावीर का संदेश है कि मन, वचन और कर्म से सत्य का पालन किया जाए। बिना अधिकार किसी वस्तु का ग्रहण न करना ही अचौर्य का वास्तविक स्वरूप है।
वीर शासन जयंती चतुर्विध संघ की एकता का भी संदेश देती है। साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका मिलकर धर्म परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। यह हमें सिखाता है कि धर्म के मार्ग पर सभी समान हैं और सभी की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है।
आज की तेज रफ्तार जिंदगी में तप, स्वाध्याय और क्षमा का महत्व भी बढ़ गया है। जहां हर व्यक्ति तुरंत परिणाम चाहता है, वहीं आत्मिक विकास के लिए संयम और साधना आवश्यक है। क्षमा का भाव टूटते रिश्तों को जोड़ने की शक्ति रखता है। “मिच्छामि दुक्कड़म्” केवल परंपरा नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और संबंधों को मजबूत करने का माध्यम है।
वीर शासन जयंती हमें हर वर्ष यह प्रेरणा देती है कि—
अहिंसा विश्व शांति का मार्ग है।
अनेकांत सहिष्णु समाज का आधार है।
अपरिग्रह पर्यावरण और मन की शांति का साधन है।
सत्य विश्वासपूर्ण समाज की नींव है।
क्षमा रिश्तों को जोड़ने की शक्ति है।
वीर शासन जयंती केवल इतिहास को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि भगवान महावीर के सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प दिवस है।
इस पावन अवसर पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम किसी भी जीव को कष्ट नहीं देंगे, सत्य का पालन करेंगे, आवश्यकता से अधिक संग्रह नहीं करेंगे और क्षमा भाव को जीवन का हिस्सा बनाएंगे।
यही सच्ची वीर शासन जयंती होगी।
वीर शासन जयवंत हो।
जियो और जीने दो।
डॉ. दर्शना जैन, जयपुर


