भीलवाड़ा। शाबाश इंडिया

श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी म.सा. ने कहा कि परमात्मा जीव को आत्मा की शुद्धता, निर्मलता और वीतरागता प्राप्त करने की कला सिखाते हैं। संसार के विषय कभी समाप्त नहीं होते, लेकिन उनके प्रति उत्पन्न मोह, राग और द्वेष ही जीव को कर्मबंधन में बांधते हैं। जब तक मनुष्य अपने भावों का परिष्कार नहीं करता, तब तक बाहरी साधनों की प्रचुरता भी उसे स्थायी सुख और शांति प्रदान नहीं कर सकती।
अहिंसा भवन में आयोजित धर्मसभा में उत्तराध्ययन सूत्र के अध्ययन का विवेचन करते हुए युवाचार्यश्री ने कहा कि समय के साथ मनुष्य की आवश्यकताओं से अधिक उसकी आदतें बदल गई हैं। जो व्यक्ति कभी साधारण साधनों में भी संतोष का अनुभव करता था, वही आज सुविधाओं का इतना अभ्यस्त हो गया है कि उनके अभाव में स्वयं को असहज महसूस करने लगता है। बाहरी साधन सुविधा दे सकते हैं, लेकिन आत्मिक शांति केवल संयमित और संतुलित मन से ही प्राप्त होती है।
उन्होंने एक दृष्टांत सुनाते हुए कहा कि एक व्यक्ति “लाइफटाइम वारंटी” वाला हाथ से चलने वाला पंखा खरीदकर लाया। कुछ ही घंटों बाद वह टूटा हुआ पंखा लेकर दुकानदार के पास शिकायत करने पहुंचा। पूछने पर उसने बताया कि हवा लेने के लिए उसने स्वयं गर्दन हिलाने के बजाय पंखे को ही हिलाना शुरू कर दिया, जिससे पंखा टूट गया। युवाचार्यश्री ने कहा कि अधिकांश लोग जीवन में भी यही भूल करते हैं। वे स्वयं को बदलने के बजाय परिस्थितियों को बदलना चाहते हैं, जबकि परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से करनी होती है।
उन्होंने कहा कि पांचों इंद्रियों के विषयों को “काम-भोग” कहा गया है और इनका स्वभाव आकर्षित करना है। इसलिए ये कभी शांत नहीं होते। आज मोबाइल की रील्स इसका सहज उदाहरण हैं। एक रील समाप्त होती है तो दूसरी सामने आ जाती है। इसी प्रकार इच्छाओं और विषयों का भी कोई अंत नहीं है। वास्तविक साधना विषयों को समाप्त करने की नहीं, बल्कि उनके बीच रहते हुए अपने मन को संयमित रखने की है।
युवाचार्यश्री ने कहा कि ‘विष’ और ‘विषय’ दोनों का प्रभाव विनाशकारी है। विष शरीर का नाश करता है, जबकि विषयों का मोह और उनका स्मरण मन एवं आत्मा की शुद्धता को कलुषित कर देता है। इसलिए इन्द्रिय-विषयों के प्रति सजग रहना, अनावश्यक स्मरण से बचना तथा विवेक और आत्मसंयम का पालन करना ही आत्मकल्याण का वास्तविक मार्ग है।
उन्होंने कहा कि राग और द्वेष दोनों ही कर्मबंधन के समान कारण हैं। केवल आसक्ति ही नहीं, बल्कि किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा परिस्थिति के प्रति घृणा भी मन को बांध देती है। भगवान महावीर इसलिए वीतराग कहलाए क्योंकि उन्होंने राग और द्वेष दोनों का पूर्णतः अतिक्रमण कर समता को प्राप्त किया। दुःख का कारण बाहरी वस्तुएँ नहीं, बल्कि उनके प्रति उत्पन्न मोह है।
युवाचार्यश्री ने कहा कि शरीर नश्वर और परिवर्तनशील है। वास्तविक सौंदर्य शरीर का नहीं, बल्कि निर्मल भावों, संयमित जीवन और पवित्र आत्मचेतना का है। इसलिए मनुष्य को बाहरी आकर्षण के स्थान पर अपने अंतर्मन की शुद्धि पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि जैन दर्शन मूलतः भावप्रधान दर्शन है। दान, शील और तप तभी सार्थक हैं, जब उनके साथ निर्मल, निष्काम और उत्कृष्ट भाव जुड़े हों। भावों की पवित्रता ही आत्मकल्याण का वास्तविक आधार है।
धर्मसभा के समापन पर युवाचार्यश्री ने कहा कि मोह, राग, द्वेष और विषयासक्ति का क्षय ही समता, शांति और आत्मानंद का मार्ग है। परमात्मा के वचनों को जीवन में उतारना ही आत्मकल्याण तथा मोक्षमार्ग की वास्तविक साधना है।
इस अवसर पर महासती पियूषदर्शनाजी ने कहा कि धर्म-आराधना कभी जबरदस्ती से नहीं होती, बल्कि दृढ़ श्रद्धा और पुरुषार्थ से होती है। धर्म जितना सुदृढ़ होगा, आत्मा की सिद्धशिला तक की यात्रा उतनी ही सहज होगी। संसार में प्रथम बनने से बड़ा लक्ष्य धर्म-आराधना में श्रेष्ठ बनना है।
शांतिभवन चातुर्मास समिति के संयोजक कंवरलाल सूरिया एवं अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद चीपड़ ने बताया कि धर्मसभा में अहिंसा भवन के पदाधिकारी, श्रावक-श्राविकाओं तथा शहरभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने धर्मलाभ प्राप्त किया।
उन्होंने बताया कि 10 जुलाई को युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी संतवृंद सहित महावीर भवन, नाड़ी मोहल्ला में मंगल विहार एवं धर्मसभा होगी। 11 जुलाई को जैन ज्योति कॉलोनी स्थित यशसिद्ध भवन तथा 12 जुलाई को सुभाष नगर जैन स्थानक में धर्मसभा एवं प्रवचन का आयोजन किया जाएगा।


