Tuesday, July 7, 2026

राष्ट्रसंत गणाचार्य विराग सागर महाराज का द्वितीय समाधि स्मृति दिवस श्रद्धाभाव से मनाया गया

कोल्हापुर। शाबाश इंडिया।

राष्ट्रसंत गणाचार्य श्री 108 विराग सागर जी महाराज का द्वितीय समाधि स्मृति दिवस 4 जुलाई को कोल्हापुर में श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक वातावरण के बीच मनाया गया। कार्यक्रम मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज एवं मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज के सानिध्य में आयोजित हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया।

इस अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना, गुरु भक्ति एवं धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। पट्टाचार्य आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज एवं मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज ने अपने प्रवचनों में राष्ट्रसंत गणाचार्य विराग सागर जी महाराज के समाधि पूर्व प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उनके तप, त्याग एवं आध्यात्मिक जीवन पर प्रकाश डाला। प्रवचनों से उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।

कार्यक्रम में मीनाक्षी नकाते, शैला पाटील, शिल्पा पाटील, राजश्री पाटील, कांचन मुरचिट्टे, प्रतिभा आळतेकर, नंदिनी कमते, रेश्मा शाह, वंदना नाईक, सुषमा कारंडे, अनघा सांगरुळकर, कविता बड्डे, सुजाता किणे, जयश्री गाट, सुजाता रोटे, जयश्री पाटील, दामिनी जैन, सोनाली उपाध्ये, विक्रांत नाईक, ब्रह्मकिरण उपाध्ये, विपुल जैन, सुमित ओसवाल, विद्याधर खोत, भूषण कावळे तथा अभिषेक पाटील सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे।

आचार्य विराग सागर महाराज का संक्षिप्त परिचय

आचार्य श्री 108 विराग सागर जी महाराज दिगंबर जैन परंपरा के प्रख्यात संत थे। उनका जन्म 2 मई 1963 को मध्यप्रदेश के दमोह जिले के पथरिया में हुआ। बचपन का नाम अरविंद था। वर्ष 1980 में उन्होंने तपस्वी सम्राट आचार्य श्री सन्मतिसागर जी महाराज (फफोतू) से क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण की और क्षुल्लक पूर्णसागर बने। बाद में 1 दिसंबर 1983 को औरंगाबाद (महाराष्ट्र) में आचार्य श्री विमलसागर जी महाराज से मुनि दीक्षा प्राप्त की।

8 नवंबर 1992 को मध्यप्रदेश स्थित सिद्धक्षेत्र द्रोणागिरी में चतुर्विध संघ द्वारा उन्हें आचार्य पद प्रदान किया गया। अपने आध्यात्मिक जीवन में उन्होंने 227 शिष्यों को दीक्षा प्रदान की, जो आज देशभर में जैन धर्म की प्रभावना में सक्रिय योगदान दे रहे हैं।

कार्यक्रम के अंत में श्रद्धालुओं ने राष्ट्रसंत गणाचार्य विराग सागर जी महाराज के आदर्शों पर चलने तथा धर्म, संयम एवं सेवा के मार्ग को अपनाने का संकल्प लिया।

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