Wednesday, July 1, 2026

धर्म आराधना में अभिलाषा नहीं, निष्काम भाव से किया धर्म ही भव-यात्रा का सच्चा पाथेय : युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी

भीलवाड़ा | शाबाश इंडिया

श्रमण संघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी महाराज ने कहा कि धर्म आराधना और साधना का उद्देश्य सांसारिक उपलब्धियां प्राप्त करना नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और कर्मनिर्जरा होना चाहिए। निष्काम भाव से किया गया धर्म ही जीवन और भव-यात्रा का सच्चा पाथेय बनता है। वे बुधवार को सौ फीट रोड स्थित अनुकम्पा आध्यात्मिक मंच एवं सकल जैन समाज की ओर से आयोजित धर्मसभा को संबोधित कर रहे थे।युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी ने कहा कि जिस प्रकार लंबी यात्रा पर निकलने वाला व्यक्ति अपने साथ पाथेय लेकर चलता है, उसी प्रकार जीव को भी भव-यात्रा के लिए धर्म रूपी पाथेय का संग्रह करना चाहिए। धन, वैभव और सांसारिक साधन केवल वर्तमान जीवन तक सीमित रहते हैं, जबकि धर्म ही ऐसा धन है जो अगले भव तक जीव के साथ जाता है।उन्होंने अपने बचपन का संस्मरण सुनाते हुए बताया कि माता-पिता उन्हें और उनके भाई-बहनों को पूना से सुजालपुर आचार्य आनंद ऋषिजी के दर्शन कराने लेकर गए थे। उस यात्रा का साधारण भोजन आज भी उन्हें विशेष आनंद का अनुभव कराता है। उन्होंने कहा कि जैसे यात्रा का पाथेय सफर को सरल बनाता है, वैसे ही धर्म जीवन और भव-यात्रा दोनों को सफल बनाता है।

युवाचार्यश्री ने कहा कि जीवन में मिलने वाला प्रत्येक सुख-दुख पूर्व में किए गए शुभ और अशुभ कर्मों का परिणाम है। पुण्य के उदय से कार्य सहजता से सिद्ध होते हैं, जबकि पुण्य का उदय नहीं होने पर प्रयासों के बावजूद सफलता नहीं मिलती। इसलिए व्यक्ति को कर्म सिद्धांत पर अटूट विश्वास रखते हुए निरंतर शुभ कर्म और धर्म आराधना करते रहना चाहिए।उन्होंने कहा कि धर्म कभी भी अपेक्षा, लालसा या फल की इच्छा से नहीं करना चाहिए। निष्काम भाव से की गई आराधना का फल निश्चित रूप से मिलता है। जिस प्रकार ईमानदारी से अध्ययन करने वाला विद्यार्थी अंततः सफलता प्राप्त करता है, उसी प्रकार धर्म में किया गया प्रत्येक सत्कर्म भी अवश्य फलदायी होता है।युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी ने कहा कि वास्तविक सुख धर्म में ही निहित है। धर्म आराधना से कर्मों की निर्जरा होती है, आत्मा निर्मल होती है और मोक्ष मार्ग प्रशस्त होता है। मन, वचन और काया से किए जाने वाले प्रत्येक भाव के अनुसार ही कर्मों का बंध होता है, इसलिए जीवन में सदैव शुभ भावों का विकास आवश्यक है।उन्होंने कहा कि धर्म आराधना और साधना में किया गया छोटा-सा त्याग भी अनेक कर्मों के क्षय का कारण बन सकता है। नियम और संकल्प छोटे नहीं होते, महत्वपूर्ण यह है कि उन्हें श्रद्धा और दृढ़ता के साथ निभाया जाए। चातुर्मास के दौरान अधिकाधिक धर्म आराधना, स्वाध्याय, तप एवं संयम से जुड़ने का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि तप में आडंबर का कोई स्थान नहीं है। तपस्या सहज, सरल और शुद्ध भाव से होनी चाहिए।धर्मसभा से पूर्व अनुकम्पा आध्यात्मिक मंच से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों के श्रावक-श्राविकाओं ने युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी महाराज, हितेन्द्र ऋषिजी, रविन्द्र मुनिजी, धवल ऋषिजी एवं नवदीक्षित महक ऋषिजी सहित संतवृंद का जयघोष के साथ स्वागत एवं अभिनंदन किया। महिला मंडल ने स्वागत गीत प्रस्तुत कर संतवृंद का भावभीना स्वागत किया।शांतिभवन चातुर्मास समिति के संयोजक कंवरलाल सूरिया एवं मंत्री नवरतनमल भलावत ने बताया कि युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी गुरुवार से कांचीपुरम स्थित आदिनाथ भवन में दो दिवसीय प्रवास पर रहेंगे, जहां वे धर्मसभाओं के माध्यम से श्रद्धालुओं को प्रवचनों का लाभ प्रदान करेंगे।

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