एक विस्तृत व्यंग्य लेख
आजकल इस देश में दो चीज़ें बहुत तेजी से बढ़ रही हैं—एक महंगाई और दूसरी इंटरव्यू देने वालों की संख्या। फर्क सिर्फ इतना है कि महंगाई बढ़कर जेब खाली करती है और इंटरव्यू बढ़कर आत्मविश्वास खाली कर देते हैं।
मैं भी एक दिन उत्साह से भरकर इंटरव्यू देने निकल पड़ा। घर वालों ने ऐसे विदा किया जैसे मैं कोई युद्ध जीतने जा रहा हूँ। माँ ने दही-चीनी खिलाई, पिता जी ने जीवन के अनमोल उपदेश दिए और पड़ोसी ने कहा, “भाई, नौकरी लग जाए तो हमें भूल मत जाना।”
मैंने मन ही मन सोचा, “नौकरी तो लगने दो, अभी तो इंटरव्यू बोर्ड मुझे भूलने वाला नहीं है।”
इंटरव्यू स्थल पर पहुँचते ही लगा कि पूरा देश बेरोज़गारी के खिलाफ एक विशाल सम्मेलन करने आया है। बाहर उम्मीदवारों की ऐसी भीड़ थी कि यदि उनमें से आधे को भी नौकरी मिल जाती तो देश की अर्थव्यवस्था सुधर जाती।
सबके हाथ में फाइल थी। कुछ लोग फाइल ऐसे पकड़े हुए थे जैसे उसमें उनके पूर्वजों की सम्पत्ति के कागज़ हों। कुछ उम्मीदवार अंतिम समय में किताबें पलट रहे थे। उन्हें देखकर लगता था कि अगर इंटरव्यू एक घंटे और लेट हो जाए तो वे परमाणु विज्ञान भी सीख लेंगे।
एक सज्जन बार-बार कह रहे थे, “भाई साहब, इंटरव्यू में कॉन्फिडेंस होना चाहिए।”
उनका कॉन्फिडेंस देखकर लग रहा था कि वे इंटरव्यू लेने आए हैं, देने नहीं।
इसी बीच एक उम्मीदवार बाहर निकला। उसका चेहरा ऐसा था जैसे अभी-अभी उसने अपनी सारी उम्मीदों का अंतिम संस्कार किया हो। सब लोग उसके चारों ओर ऐसे जमा हो गए जैसे युद्धभूमि से लौटे सैनिक से हाल पूछा जाता है।
“क्या पूछा अंदर?”
उसने गहरी साँस लेकर कहा,
“कुछ समझ नहीं आया। उन्होंने पूछा मैं कौन हूँ, और मैं यही सोचता रह गया कि सच में मैं कौन हूँ।”
इतना कहकर वह दार्शनिक बन चुका था।
आख़िर मेरा नंबर भी आ गया।
कमरे में प्रवेश करते ही मैंने देखा कि सामने पाँच लोग बैठे थे। उनके चेहरे पर वही रहस्यमयी मुस्कान थी जो गणित के शिक्षक परीक्षा के दिन रखते हैं।
उन्होंने कहा,
“बैठिए।”
मैं बैठ गया।
फिर उन्होंने पूछा,
“अपने बारे में बताइए।”
यह प्रश्न सुनते ही मैं सोच में पड़ गया। पूरी जिंदगी खुद को समझने में निकल गई और अब पाँच मिनट में अपने बारे में बताना था।
मैंने नाम बताया, पढ़ाई बताई, शौक बताए।
उन्होंने पूछा,
“आपकी सबसे बड़ी कमजोरी क्या है?”
मैं सच बोलना चाहता था कि “सर, मेरी सबसे बड़ी कमजोरी नौकरी की जरूरत है।”
लेकिन मैंने कहा,
“मैं बहुत परफेक्शनिस्ट हूँ।”
वे मुस्कुराए।
मैं समझ गया कि यह उत्तर वे पिछले सौ उम्मीदवारों से भी सुन चुके होंगे।
फिर एक सदस्य ने पूछा,
“पाँच साल बाद आप खुद को कहाँ देखते हैं?”
मैं कहना चाहता था,
“सर, फिलहाल तो अगले पाँच मिनट में खुद को यहीं देख पाने की कोशिश कर रहा हूँ।”
लेकिन मैंने जवाब दिया,
“मैं संगठन की प्रगति में योगदान करते हुए स्वयं को एक जिम्मेदार पद पर देखता हूँ।”
यह सुनकर मुझे खुद पर गर्व हुआ। इतनी बड़ी बात मैंने जीवन में पहली बार कही थी।
फिर शुरू हुआ सामान्य ज्ञान का दौर।
उन्होंने पूछा,
“भारत की सबसे बड़ी समस्या क्या है?”
मैंने सोचा कि अगर ईमानदारी से जवाब दूँ तो इंटरव्यू यहीं समाप्त हो जाएगा।
इसलिए मैंने एक सुरक्षित उत्तर दिया।
उन्होंने पूछा,
“यदि आपको यह नौकरी नहीं मिली तो क्या करेंगे?”
मैं कहना चाहता था,
“सर, अगला इंटरव्यू दूँगा और वहाँ यही जवाब फिर से दोहराऊँगा।”
लेकिन मैंने कहा,
“मैं और मेहनत करूँगा।”
यह उत्तर सुनकर वे ऐसे खुश हुए जैसे मेहनत करने का पेटेंट उन्हीं के पास हो।
इंटरव्यू के दौरान मुझे एक और महान सत्य का ज्ञान हुआ।
इंटरव्यू में प्रश्नों से ज्यादा महत्वपूर्ण चेहरे के भाव होते हैं।
अगर आप सही उत्तर देकर घबरा जाएँ तो उत्तर गलत माना जा सकता है।
और यदि गलत उत्तर देकर मुस्कुरा दें तो लगता है जैसे आपने कोई नई खोज कर ली हो।
सबसे कठिन क्षण तब आया जब उन्होंने पूछा,
“क्या आपके पास हमसे कोई प्रश्न है?”
यह वह क्षण होता है जहाँ उम्मीदवार और नौकरी दोनों की किस्मत दाँव पर लगी होती है।
मैंने सोचा कि पूछूँ,
“सर, चयन की संभावना कितनी है?”
लेकिन अनुभव कहता है कि ऐसे प्रश्न पूछने वालों को संभावना समझाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
इसलिए मैंने पूछा,
“संस्था के विकास की भविष्य की योजनाएँ क्या हैं?”
यह प्रश्न पूछते समय मैं स्वयं अपने ज्ञान से प्रभावित था।
इंटरव्यू समाप्त हुआ।
उन्होंने कहा,
“ठीक है, हम आपको सूचित करेंगे।”
यह वाक्य भारतीय इंटरव्यू इतिहास का सबसे रहस्यमय वाक्य है।
इसका अर्थ कुछ भी हो सकता है—
- आपको नौकरी मिल गई है।
- आपको नौकरी नहीं मिली है।
- हमें खुद नहीं पता।
- हमें याद भी नहीं रहेगा कि आप कौन थे।
मैं बाहर निकला।
घर पहुँचा।
सबकी आँखों में उत्सुकता थी।
“कैसा रहा इंटरव्यू?”
मैंने कहा,
“बहुत अच्छा।”
यह वह उत्तर है जो लगभग हर उम्मीदवार देता है, चाहे अंदर उसकी कैसी भी परीक्षा हुई हो।
कुछ दिन बीते।
हर बार मोबाइल बजता तो दिल की धड़कन बढ़ जाती।
अगर बैंक का लोन ऑफर आता तो भी लगता शायद नियुक्ति पत्र हो।
अगर टेलीमार्केटिंग वाली कॉल आती तो भी उम्मीद जाग जाती।
लेकिन इंटरव्यू का परिणाम नहीं आया।
तब समझ में आया कि इंटरव्यू सिर्फ नौकरी पाने की प्रक्रिया नहीं है, यह धैर्य, आशा, निराशा, अभिनय, सामान्य ज्ञान, असामान्य प्रश्न और कृत्रिम मुस्कान का संयुक्त राष्ट्रीय उत्सव है।
आज वर्षों बाद जब मैं किसी इंटरव्यू का नाम सुनता हूँ तो सम्मान से सिर झुक जाता है।
क्योंकि इंटरव्यू वह जगह है जहाँ एक साधारण इंसान कुछ मिनटों के लिए दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, प्रेरक वक्ता और भविष्यवक्ता—सब कुछ बन जाता है।
और अंत में उसे सिर्फ एक ही उत्तर मिलता है—
“धन्यवाद, हम आपको सूचित करेंगे।”
यही वाक्य भारतीय युवाओं के सपनों का सबसे बड़ा सस्पेंस है, और शायद दुनिया का सबसे लंबा चलने वाला व्यंग्य भी।
मुकेश कुमार बिस्सा
जैसलमेर


