Monday, October 12, 2026

जंगल की स्मृतियों ने थामी कूंची, कैनवास पर जीवंत हुए भील-गरासिया संस्कृति के रंग

उदयपुर | शाबाश इंडिया।

कभी मिट्टी की दीवारों पर उभरती आकृतियां, कभी प्रकृति से मिले रंगों में सांस लेती लोकमान्यताएं और कभी पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को जीवंत करती कलाकृतियां… जनजातीय अंचल की यही अनूठी चित्र परंपरा इन दिनों झीलों की नगरी उदयपुर में नए रूप में आकार ले रही है। फर्क इतना है कि गांवों के घर-आंगन और कच्ची दीवारों को सजाने वाली कलाकारों की कूंची अब कैनवास पर अपनी सांस्कृतिक विरासत की रंगीन इबारत लिख रही है।

उदयपुर स्थित सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र परिसर में 9 से 13 अक्टूबर तक आयोजित पांच दिवसीय जनजातीय चित्रकला शिविर का समापन आज होगा। शिविर में भील और गरासिया जनजातियों के 26 महिला एवं पुरुष कलाकार अपनी कल्पनाशीलता और पारंपरिक कलात्मक अभिव्यक्ति को कैनवास पर उतार रहे हैं।

दीवारों की लोककला को मिला अभिव्यक्ति का नया फलक

निदेशक टीआरआई ओ.पी. जैन ने बताया कि शिविर की विशेषता यह है कि इसमें उदयपुर के साथ डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, सिरोही और बालोतरा से आए कलाकार अपनी-अपनी जनजातीय चित्रशैलियों की विशिष्ट पहचान प्रस्तुत कर रहे हैं। कहीं प्रकृति से जुड़ी आकृतियों का संसार आकार ले रहा है, तो कहीं लोकजीवन की स्मृतियां रंगों के माध्यम से अभिव्यक्त हो रही हैं।

जनजातीय अंचलों में पारंपरिक भित्ति चित्रण के लिए कलाकार मुख्य रूप से प्राकृतिक रंगों का उपयोग करते रहे हैं। मिट्टी, वनस्पतियों और स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों से प्राप्त रंग उनकी चित्रकला को विशिष्ट पहचान देते हैं। इस शिविर में यही कलाकार एक्रेलिक रंगों के माध्यम से अपनी पारंपरिक कला को नए माध्यम में प्रस्तुत कर रहे हैं।

रंग बदले, लेकिन परंपराओं की आत्मा वही

यह शिविर केवल चित्र बनाने का आयोजन नहीं, बल्कि लोककला के पारंपरिक और आधुनिक माध्यमों के बीच रचनात्मक संवाद का अवसर भी है। यहां कलाकारों के लिए कैनवास महज चित्रांकन का धरातल नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों को सहेजने और अभिव्यक्त करने का नया माध्यम बन गया है।

शिविर में महिला कलाकारों की भागीदारी भी विशेष महत्व रखती है। उनकी सक्रिय सहभागिता जनजातीय समाज की कलात्मक परंपराओं को संजोने और आगे बढ़ाने में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करती है।

शिविर के मेंटर एवं सेवानिवृत्त आरएएस दिनेश कोठारी ने बताया कि पांच दिवसीय शिविर में आकार लेती कलाकृतियां इस बात का सुंदर उदाहरण हैं कि कला का माध्यम भले बदल जाए, लेकिन उसकी जड़ों में बसी संस्कृति, संवेदनाएं और मौलिक पहचान नहीं बदलतीं। यहां हर कैनवास मानो यही संदेश दे रहा है कि आदिवासी चित्रकला केवल रंगों और रेखाओं का संयोजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों की स्मृतियों और लोकजीवन की जीवंत विरासत है।

इस आवासीय शिविर में दिनेश उपाध्याय सहयोगी की भूमिका निभा रहे हैं।

रिपोर्ट/फोटो : राकेश शर्मा ‘राजदीप’

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