Wednesday, September 23, 2026

उत्तम त्याग : छोड़ने में ही जीवन की सच्ची समृद्धि

ललितपुर | शाबाश इंडिया।

दसलक्षण-पर्यूषण महापर्व का आठवां दिन उत्तम त्याग धर्म की आराधना को समर्पित है। मनुष्य जीवन में पाने की आकांक्षा जितनी प्रबल है, छोड़ने की कला उतनी ही दुर्लभ है। संसार हमें संग्रह करना सिखाता है, जबकि जैन दर्शन संग्रह के बीच भी त्याग की चेतना जगाता है। वास्तव में त्याग केवल किसी वस्तु को छोड़ देने का नाम नहीं, बल्कि उस वस्तु के प्रति मन में उत्पन्न मोह, राग और द्वेष के परित्याग का नाम है।

जो मनुष्य परद्रव्यों के प्रति मोह छोड़कर संसार, देह और भोगों से उदासीन परिणाम धारण करता है, उसके जीवन में उत्तम त्याग धर्म प्रकट होता है। आवश्यकता से अधिक धन का संग्रह न करना, अनावश्यक वस्तुओं से स्वयं को मुक्त करना तथा क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे आंतरिक विकारों से दूरी बनाना त्याग की वास्तविक साधना है। त्याग बाहरी वस्तुओं से अधिक भीतर की आसक्ति का विसर्जन है।

जैन परंपरा में दान को गृहस्थ के आवश्यक कर्तव्यों में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। दान केवल संपत्ति का वितरण नहीं, बल्कि अपने अर्जित साधनों को स्व-पर उपकार की दिशा में प्रवाहित करने का माध्यम है। श्रावक को स्वयं दान देने के साथ अपने बच्चों में भी दानशीलता के संस्कार विकसित करने चाहिए। प्रतिदिन धर्मस्थल की गुल्लक में छोटी-सी राशि डालने की आदत भी बालमन में सेवा, सहयोग और परोपकार के बीज बो सकती है।

जैन परंपरा में आहार, औषधि, शास्त्र और अभय दान को विशेष महत्व दिया गया है। धन की तीन गतियां दान, भोग और नाश कही गई हैं। इसलिए धन को नाश की ओर जाने से पहले लोककल्याण के कार्यों में लगाना अधिक सार्थक है। उत्तम कार्यों में लगाया गया धन ही वास्तविक अर्थों में उपयोगी बनता है, जबकि केवल संग्रहित संपत्ति स्वयं के लिए भी बोझ बन सकती है।

आज दान के स्वरूप को व्यापक बनाने की आवश्यकता है। धनदान के साथ समयदान और श्रमदान भी महत्वपूर्ण हैं। धार्मिक या सामाजिक कार्यों में धन देना सरल हो सकता है, लेकिन अपने समय और श्रम को समर्पित करना भी बड़ी भागीदारी है। जो व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार ईमानदारी से समय देता है, श्रम करता है और किसी के जीवन में उपयोगी बनता है, उसका यह समर्पण भी परोपकार की भावना को मजबूत करता है।

दान और त्याग परस्पर पूरक होते हुए भी अपने स्वरूप में अलग हैं। दान में वस्तु का कुछ अंश दूसरों के हित में दिया जाता है, जबकि त्याग में आसक्ति सहित वस्तु अथवा दोष का परित्याग किया जाता है। दान प्रिय वस्तु को देने की भावना से जुड़ा हो सकता है, वहीं त्याग अपनी बुराइयों, कमजोरियों और आसक्तियों को छोड़ने से भी संबंधित है। दोनों तभी सार्थक हैं, जब उनके पीछे अहंकार, यश की आकांक्षा या किसी प्रतिफल की अपेक्षा न हो। जिस दान के पीछे प्रतिष्ठा की इच्छा छिपी हो, वह दान की आत्मा को कमजोर कर देता है। इसी प्रकार त्याग भी तभी उत्तम बनता है, जब छोड़ी हुई वस्तु को पुनः पाने की लालसा मन में न रहे।

आचार्यों ने सुपात्र दान की महिमा बताते हुए कहा है कि सुपात्र को दिया गया दान आत्मकल्याण की दिशा में सहायक बन सकता है, जबकि दान के पीछे यदि उचित विवेक और निर्मल भाव न हों तो उसका उद्देश्य कमजोर हो सकता है। वांछारहित दान कर्मक्षय की दिशा प्रशस्त करता है। इसलिए दान की श्रेष्ठता केवल दी गई वस्तु में नहीं, बल्कि दाता के भावों की निर्मलता में निहित है।

कविवर द्यानतरायजी ने दान की महत्ता को मार्मिक ढंग से व्यक्त किया है—

“बिन दान श्रावक साधु दोनों,
लहै नाहीं बोधि को।”

अर्थात दान की भावना केवल संपत्ति का त्याग नहीं, बल्कि आत्मकल्याण की यात्रा में सहायक निर्मल परिणामों की अभिव्यक्ति है।

आज मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं के संग्रह में जितना आगे बढ़ रहा है, उतना ही भीतर से इच्छाओं का दास भी होता जा रहा है। इसलिए उत्तम त्याग का सबसे प्रासंगिक रूप बुरी आदतों, अनावश्यक इच्छाओं तथा क्रोध, मान, माया और लोभ का त्याग है।

जब हम किसी वस्तु को छोड़ते हैं तो केवल हाथ खाली होते हैं, लेकिन जब हम मोह को छोड़ते हैं तो मन हल्का होता है। लोभ छूटता है तो संतोष जन्म लेता है और राग-द्वेष से दूरी बनती है तो आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप की ओर अग्रसर होती है।

उत्तम त्याग हमें सिखाता है कि जीवन की समृद्धि केवल इस बात में नहीं है कि हमारे पास कितना है, बल्कि इसमें भी है कि हम अपने भीतर से कितना अनावश्यक छोड़ पाए हैं। वस्तुओं का त्याग धीरे-धीरे मन को आसक्ति से मुक्त करता है और अंततः त्याग की चरम परिणति आत्मा को संसार-बंधन से मुक्त करने वाली साधना बनती है।

दसलक्षण महापर्व के आठवें दिन केवल धन देने का संकल्प न लेकर समय देने, श्रम देने, सेवा करने और अपनी बुरी आदतों को छोड़ने का भी संकल्प लेना चाहिए। सुपात्र को दिया गया दान समाज को समृद्ध करता है और भीतर से किया गया त्याग आत्मा को समृद्ध बनाता है। यही उत्तम त्याग धर्म का मर्म है—हाथों से दान, जीवन से सेवा और अंतर्मन से आसक्ति का त्याग।

लेखक: डॉ. सुनील जैन ‘संचय’, ललितपुर
आध्यात्मिक चिंतक एवं जैनदर्शन के अध्येता

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