
भीलवाड़ा | शाबाश इंडिया।
“धन मिल जाए तो सुखी हो जाएंगे, शरीर स्वस्थ रहे तो सुखी हैं और ग्रह-दशा अनुकूल हो तो सब अच्छा है”—सुख को लेकर हर व्यक्ति ने अपना अलग पैमाना बना रखा है। लेकिन धन मिलने के बाद यदि शांति चली जाए तो ऐसा सुख किस काम का? धर्म के विपरीत रास्ते से अर्जित धन कई बार तिजोरी तो भर देता है, लेकिन जीवन को चिंता और तनाव से भर देता है। सुख का वास्तविक राजमार्ग धर्म से ही प्रशस्त होता है और पाप अंततः दुःख की ओर ले जाता है। ये विचार श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी ने शांतिभवन में आयोजित विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
युवाचार्यश्री ने कहा कि व्यापारी लाभ को, डॉक्टर स्वस्थ शरीर को और ज्योतिषी अनुकूल ग्रह-दशा को सुख से जोड़ता है, लेकिन बाहरी उपलब्धियां सुख की गारंटी नहीं हैं। धर्मविरुद्ध मार्ग से अर्जित धन संपन्नता तो दे सकता है, लेकिन उसके साथ चिंता और अशांति भी आ सकती है। धन तभी सुखकारी है, जब उसके अर्जन और उपयोग दोनों में धर्म जुड़ा हो।
उन्होंने कहा कि चातुर्मास धर्म-साधना का विशेष अवसर है और उसमें भी पर्वाधिराज पर्युषण आराधना का सारभूत समय है। जैसे दूध से दही और दही को मथने पर मक्खन निकलता है, वैसे ही चातुर्मास की साधना का सार पर्युषण में अधिक गहराई से सामने आता है। पर्युषण में केवल धार्मिक क्रियाएं कर लेना पर्याप्त नहीं, बल्कि धर्म में एकाग्रता, स्थिरता और तल्लीनता भी बढ़नी चाहिए।
धर्मध्यान के चार आलंबनों की चर्चा करते हुए युवाचार्यश्री ने वाचना, परिपृच्छना, पर्यट्टना और अनुप्रेक्षा का महत्व बताया। वाचना का अर्थ गुरु के मुख से विधिपूर्वक ज्ञान ग्रहण करना है। ज्ञान लेने वाले में विनय और ग्रहणशीलता होनी चाहिए। विनय से लिया गया थोड़ा ज्ञान भी जीवन में बड़ा परिणाम दे सकता है, जबकि अहंकार ज्ञान के द्वार बंद कर देता है।
परिपृच्छना को ज्ञान की शुद्धि से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि प्रश्न पूछना कमजोरी नहीं, बल्कि जिज्ञासा का प्रमाण है। क्या, क्यों, कब, कहां, कैसे और कौन—ये प्रश्न ज्ञान के नए द्वार खोलते हैं। प्रश्न सत्य को समझने के लिए होना चाहिए, सामने वाले की परीक्षा लेने या उसे पराजित करने के लिए नहीं। अहंकारी व्यक्ति पूछने से बचता है, क्योंकि उसे लगता है कि वह सब जानता है, जबकि विनम्र व्यक्ति सत्य को और स्पष्ट रूप से जानने के लिए प्रश्न करता है।
युवाचार्यश्री ने कहा कि पर्युषण केवल आठ दिनों की धर्मक्रिया नहीं, बल्कि स्वयं को बदलने का अवसर है। ज्ञान विनय से ग्रहण हो, जिज्ञासा से शुद्ध हो, पुनरावृत्ति से दृढ़ हो और चिंतन से आचरण में उतरे, तभी धर्मध्यान सार्थक होता है। धर्म जब जीवन में उतरता है, तभी सुख का राजमार्ग प्रशस्त होता है।
साध्वी सुप्रभाजी ने कहा कि केवल सपनों की दुनिया में नहीं, बल्कि जागृत चेतना के साथ जीवन जीना चाहिए। पर्वाधिराज पर्युषण केवल मनाने का नहीं, बल्कि अपने जीवन को बनाने, संवारने और सही दिशा देने का अवसर है।
इस अवसर पर एक, दो, तीन एवं चार उपवास करने वाले तपस्वी भाई-बहनों के साथ सिद्धितप में संलग्न तपस्वियों ने आयंबिल एवं उपवास के प्रत्याख्यान युवाचार्यश्री से ग्रहण किए।
शांतिभवन आनंद अनुभूति वर्षावास के संरक्षक नवरतनमल बंब, अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद चीपड़, संयोजक कंवरलाल सूरिया, मदनलाल चौरड़िया, सुशील चपलोत, मंत्री नवरतनमल भलावत, नरेंद्र भंडारी, प्रकाश पीपाड़ा, महावीर युवक मंडल सेवा संस्थान के बाबूलाल सूरिया, अध्यक्ष मनीष कोठारी तथा शांति जैन महिला मंडल की अध्यक्षा सिम्मी पोखरणा, इन्द्रा बाफना, प्रमिला सूरिया, बलवीर देवी चौरड़िया, सरिता पोखरणा एवं प्रमिला कोचिटा ने तैयारियों की जानकारी दी।
उन्होंने बताया कि पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व की आठ दिवसीय आराधना 8 से 15 सितंबर तक शांतिभवन के मोदी हॉल में युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी, यशोदीप्ति मधुकंवर जी, उपप्रवर्तिनी दिव्यज्योति जी, मधुर व्याख्यानी सुचेताजी, स्मितभाषी पियुषदर्शनाजी आदि संत-साध्वीवृंद के सान्निध्य में होगी।
आयोजन के दौरान आठों दिन 24 घंटे जाप, अंतगड़ दशांग सूत्र का वाचन, विभिन्न विषयों पर विशेष प्रवचन, दोपहर में कल्पसूत्र वाचन एवं धार्मिक प्रतियोगिताएं आयोजित होंगी। सूर्यास्त के बाद महिलाओं के लिए सिद्धांतशाला तथा पुरुषों के लिए शांतिभवन के मोदी हॉल में प्रतिक्रमण की व्यवस्था रहेगी।
पदाधिकारियों ने शहर के सभी श्रीसंघों एवं श्रद्धालुओं से पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व की आराधना में अधिकाधिक सहभागी होकर तप, त्याग, स्वाध्याय, संयम एवं धर्म-साधना का लाभ लेने का आह्वान किया।
प्रवक्ता: सुनील चपलोत
मो.: 9414730514
शांतिभवन, भोपालगंज, भीलवाड़ा


