
भीलवाड़ा | शाबाश इंडिया।
शांतिभवन में आयोजित विशाल धर्मसभा में श्रमणसंघीय युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी ने कहा कि धर्म का उद्देश्य केवल पुण्य अर्जित कर देवगति प्राप्त करना नहीं, बल्कि कर्मों की निर्जरा कर आत्मा को मुक्ति की दिशा में अग्रसर करना है। उन्होंने कहा कि मनुष्य भव, आर्य क्षेत्र और श्रेष्ठ कुल में जन्म अत्यंत दुर्लभ है। देवताओं के पास भौतिक सुख-सुविधाओं की प्रचुरता होने के बावजूद वे भी मनुष्य जन्म की आकांक्षा रखते हैं, क्योंकि कर्मनिर्जरा और आत्मकल्याण का अवसर केवल मनुष्य जीवन में ही उपलब्ध है।
युवाचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य जीवन की सार्थकता भोग-विलास में नहीं, बल्कि आत्मपुरुषार्थ में है। जैन दर्शन में तप और धर्म का मूल उद्देश्य यश, प्रतिष्ठा या देवगति नहीं, बल्कि कर्मनिर्जरा है। पुण्य से सुख और अनुकूल परिस्थितियां मिल सकती हैं, लेकिन मुक्ति का मार्ग केवल आत्मसाधना और कर्मक्षय से ही प्रशस्त होता है।
उन्होंने कहा कि आर्य क्षेत्र केवल भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण है जहाँ धर्म के प्रति श्रद्धा हो, साधु-संतों का सान्निध्य सहज उपलब्ध हो, साधना करने वालों का सम्मान किया जाए और नई पीढ़ी को संस्कार प्राप्त हों। केवल भव्य भवनों से कोई स्थान आर्य क्षेत्र नहीं बनता, बल्कि धर्म, संयम और आत्मजागरण का वातावरण उसे वास्तविक अर्थों में आर्य क्षेत्र बनाता है।
युवाचार्यश्री ने कहा कि धर्म के प्रति सही समझ विकसित करना आवश्यक है। जैन दर्शन जीव और शरीर को अलग मानता है। आत्मा की शाश्वत सत्ता को समझने से अहिंसा, संयम और आत्मजवाबदेही की भावना विकसित होती है। उन्होंने कहा कि धर्म के नाम पर होने वाली हर क्रिया धर्म नहीं होती। वास्तविक धर्म वही है, जिसमें अहिंसा, आत्मशुद्धि और कर्मनिर्जरा का भाव निहित हो।
उन्होंने नई पीढ़ी को धर्म का वास्तविक स्वरूप समझाने पर बल देते हुए कहा कि धर्म केवल कर्मकांड या पुण्य संचय का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मा को कर्मबंधन से मुक्त करने की साधना है। मनुष्य जीवन का सर्वोत्तम उपयोग आत्मजागरण और आत्मकल्याण में ही है।
युवाचार्यश्री ने कहा कि धार्मिक वातावरण को सुदृढ़ बनाने की जिम्मेदारी केवल साधु-संतों की नहीं, बल्कि समाज की भी है। यदि कोई व्यक्ति सामायिक, तप या साधना करे तो उसका उत्साहवर्धन होना चाहिए। ऐसा वातावरण ही समाज को धर्म से जोड़ता है और नई पीढ़ी में संस्कारों का विकास करता है।
धर्मसभा में आनंद सिद्धीतप की आराधना कर रहे 170 से अधिक तपस्वियों की अनुमोदना करते हुए युवाचार्यश्री ने कहा कि तप केवल बाहरी अनुशासन नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और कर्मनिर्जरा का प्रभावी साधन है। उन्होंने तपस्वियों को अपने संकल्प पर दृढ़ रहने और साधना में निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
इस अवसर पर महासती प्रियदर्शना ने कहा कि चौरासी लाख योनियों के भ्रमण के बाद दुर्लभ मनुष्य जन्म प्राप्त होता है। मनुष्य जन्म और पंचेंद्रियता दोनों ही महान पुण्य का परिणाम हैं, इसलिए इस अवसर का सदुपयोग धर्मसाधना और आत्मकल्याण में करना चाहिए।
श्रीसंघ शांतिभवन के मंत्री नवरतनमल भलावत ने बताया कि अनेक श्रावक-श्राविकाओं ने 3 से 7 उपवास तक के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। आनंद सिद्धीतप आराधना में 170 से अधिक तपस्वियों ने सामूहिक रूप से आयंबिल तप किया। उन्होंने बताया कि बुधवार से श्रमणसंघीय द्वितीय आचार्य आनंद ऋषिजी महाराज की जन्मजयंती के उपलक्ष्य में नौ दिवसीय धार्मिक कार्यक्रमों का शुभारंभ होगा।


