
किशनगढ़ | शाबाश इंडिया।
किशनगढ़। धर्म नगरी किशनगढ़ स्थित जैन भवन में आचार्य श्री 108 विहर्षसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में भव्य धर्मसभा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ आचार्य श्री 108 वर्धमानसागर जी महाराज, आचार्य श्री 108 विरागसागर जी महाराज एवं आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के चित्रों के अनावरण तथा दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ।
आज के पुण्यार्जक श्रावक-श्रेष्ठी कमलप्रकाशजी, विमलप्रकाशजी, चंद्रप्रकाशजी, प्रवीणकुमारजी, पंकजजी, अरविन्दजी, आशीषजी, अरिहंतजी, दिव्यांशजी एवं समस्त पाटनी परिवार (ऊँटड़ा वाले) ने आचार्य श्री 108 विहर्षसागर जी महाराज का पाद-प्रक्षालन, शास्त्र भेंट तथा सायंकालीन आरती का सौभाग्य प्राप्त किया।
चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्ज्वलन में श्री मुनिसुव्रतनाथ दिगम्बर जैन पंचायत के अध्यक्ष चंद्रप्रकाश बैद, मंत्री प्रदीप गंगवाल, मुकेश काला, सचिन अजमेरा एवं पुण्यार्जक परिवार की सहभागिता रही। पुण्यार्जक परिवार का स्वागत नौरतमल पाटनी, अशोक पापल्या, कमल रांवका एवं राजेश पाटनी ने किया, जबकि महिलाओं की ओर से रश्मि दगड़ा, प्रभावना पाटोदी, रूबी काला एवं सोनू बाकलीवाल ने मंगल स्वागत किया।
कार्यक्रम के दौरान पूर्वाचार्यों एवं आचार्य श्री विहर्षसागर जी महाराज के समक्ष अर्घ्य समर्पित किए गए। इस अवसर पर टोंक, इंदौर एवं सलूम्बर से आए विहर्ष युवा टीम के सदस्यों ने भी आचार्य श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। मंगलाचरण कमल बैद ने प्रस्तुत किया, मंच संचालन बसंत बैद ने किया तथा संघस्थ ब्रह्मचारी राजेश भैया ने भी अपने मंगल भाव व्यक्त किए।
धर्मसभा में मुनि श्री विजयेश सागर जी महाराज ने अपने प्रेरक उद्बोधन में कहा कि भाई-भाई का रिश्ता प्रेम, विश्वास और अपनत्व का प्रतीक होता है, लेकिन अहंकार और हठ के कारण कई बार रिश्तों में दूरियाँ आ जाती हैं। उन्होंने कहा कि जहाँ अहंकार होता है वहाँ रिश्ते टूटते हैं और जहाँ विनम्रता होती है वहाँ प्रेम बना रहता है। जीवन में तर्क नहीं, बल्कि रिश्ते जीतना अधिक महत्वपूर्ण है। यदि कोई एक व्यक्ति भी प्रेमपूर्वक पहल कर दे, तो वर्षों पुरानी दूरियाँ भी समाप्त हो सकती हैं। उन्होंने परिवारों में प्रेम, क्षमा और संवाद बनाए रखने का संदेश दिया।
अपने मंगल प्रवचन में आचार्य श्री विहर्षसागर जी महाराज ने कहा कि रविवार को ‘इतवार’ भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है विश्वास। विश्वास के बिना कोई भी संबंध स्थायी नहीं रह सकता। उन्होंने कहा कि माँ सत्य है और पिता विश्वास हैं। जीवन की पुस्तक का पहला पन्ना विश्वास है। मनुष्य का जीवन केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के हित और कल्याण के लिए होना चाहिए।
आचार्य श्री ने कहा कि धन का सदुपयोग भोग और दान—दोनों में है। यदि न भोग किया जाए और न दान दिया जाए, तो धन का संचय निरर्थक है। उन्होंने प्रेरित करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को उदारता, आत्मसम्मान, सेवा, संयम और विश्वास के साथ धर्ममय जीवन जीना चाहिए।
धर्मसभा में आगामी देवाधिदेव 1008 श्री नेमीनाथ भगवान के मोक्ष कल्याणक पर्व की भी जानकारी दी गई। बताया गया कि आचार्य श्री 108 विहर्षसागर जी महाराज के सान्निध्य में श्री मुनिसुव्रतनाथ मंदिर में प्रातः 7:30 बजे निर्वाण लड्डू चढ़ाया जाएगा।


