
भीलवाड़ा | शाबाश इंडिया।
जीवन में ग्रहों की दशा सुधारनी है तो अपना व्यवहार सुधारना होगा
आचार्य पुलकसागर ससंघ के सानिध्य में सूर्यमहल में मंगल दिव्य देशना
हमारा आचरण और व्यवहार ही हमारी ग्रह दशा तय करता है। क्रोध में ऊंची आवाज में बात करने से कुंडली के ग्रह खराब हों या न हों, लेकिन वर्तमान के ग्रह अवश्य खराब हो जाते हैं। ग्रहों की दशा सुधारनी है तो अपना व्यवहार सुधारना होगा। शुद्ध भावों से मीठे शब्द बोलने लगें तो हमारे सभी ग्रह अनुकूल हो जाएंगे। ये प्रेरणादायी विचार राष्ट्रसंत मनोज्ञाचार्य पुलकसागरजी महाराज ने शुक्रवार को भीलवाड़ा के शास्त्रीनगर स्थित सूर्यमहल में व्यक्त किए।
श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर ट्रस्ट, मेन सेक्टर शास्त्रीनगर के तत्वावधान में सकल दिगंबर जैन समाज की ओर से आयोजित चातुर्मास के दौरान आचार्यश्री की अंतिम चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला ‘जीवन जीने की कला’ के दसवें दिन मंगल दिव्य देशना हुई। आचार्यश्री इस वर्ष पहली बार भीलवाड़ा में चातुर्मास कर रहे हैं। प्रवचन श्रृंखला का समापन शनिवार को होगा।
आचार्यश्री ने कहा कि संत प्रवचन इसलिए देते हैं कि न जाने कौन-सा शब्द किसी के मन को छू जाए और ग्रहों की दशा के साथ उसका जीवन भी बदल जाए। रत्नावली का एक शब्द तुलसीदासजी के मन को ऐसा लगा कि वे भगवान राम के कृपापात्र बन गए। किसी एक शब्द से मन में वैराग्य के भाव जागृत हो सकते हैं। संत की वाणी कितने लोगों ने सुनी, यह मायने नहीं रखता, बल्कि उस वाणी को सुनकर कितने लोगों का जीवन बदला, यही धर्मप्रभावना है। मेरा एक शब्द भी किसी का जीवन बदल सके तो प्रवचन देना सार्थक हो जाएगा।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति क्रोध में जो शब्द बोलता है, वे उसके व्यक्तित्व की वास्तविकता बता देते हैं। आचार्यश्री ने भोजन की थाली में जूठन नहीं छोड़ने की प्रेरणा देते हुए कहा कि अन्न का अनादर नहीं करना चाहिए। उन्होंने परिवार में आपसी प्रेम और संवाद बढ़ाने के लिए सप्ताह में एक बार सभी सदस्यों को साथ बैठकर चर्चा करने की सलाह दी। इस दौरान सामने आने वाली समस्याओं पर आरोप-प्रत्यारोप करने के बजाय उनका समाधान तलाशना चाहिए। इससे परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम और विश्वास मजबूत होगा।
कर्मों की विचित्र प्रकृति को समझाते हुए आचार्य पुलकसागर महाराज ने कहा कि हम कर्मों की चिट्ठी में कुछ भी लिखें, लेकिन उस पर पता अपना ही लिखते हैं, इसलिए वह लौटकर हमारे पास ही आती है। जब उन कर्मों को भोगना पड़ता है, तब पता चलता है कि चिट्ठी में क्या लिखा था। कर्मों का खेल बड़ा विचित्र है। कर्म बंधते समय पता नहीं चलता, लेकिन जब उनका फल मिलता है तो उसका अहसास होता है। व्यक्ति को कोई भगवान सजा नहीं देता, बल्कि वह अपने कर्मों का फल स्वयं भोगता है। उन्होंने कहा कि जो संसार को नहीं जानेगा, वह संयम को नहीं जान सकेगा। संसार से विरक्ति होने पर ही संयम के भाव जागृत होते हैं।
आगामी कार्यक्रमों की जानकारी
श्री पुलकसागर चातुर्मास समिति के अध्यक्ष प्रवीण चौधरी ने बताया कि 1 से 3 नवंबर तक आचार्यश्री का प्रवास बापूनगर दिगंबर जैन मंदिर में रहेगा। आचार्यश्री के सानिध्य में धनतेरस से अमावस्या तक मंत्रों की साधना होगी। जिन श्रावक परिवारों ने चातुर्मास के मंगल कलश स्थापित किए हैं, वे 6 से 8 नवंबर तक सुबह 8 से 10 बजे के बीच आचार्यश्री के आशीर्वाद के साथ अपने मंगल कलश प्राप्त कर घर पर स्थापित कर सकेंगे।
दीपावली पर भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण महोत्सव के अवसर पर आचार्यश्री के सानिध्य में निर्वाण लड्डू अर्पित किया जाएगा। ऐतिहासिक चातुर्मास संपन्न होने के बाद आचार्यश्री 15 नवंबर को भीलवाड़ा से विहार करेंगे।
प्रवचन के प्रारंभ में पुण्यार्जक परिवार को पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट का सौभाग्य प्राप्त हुआ। कार्यक्रम का संचालन चातुर्मास समिति के महामंत्री जयकुमार पाटनी ने किया। समिति के संयोजक मनीष शाह एवं सह संयोजक लोकेश अजमेरा ने बताया कि 31 अक्टूबर तक प्रतिदिन सुबह 8:45 से 10 बजे तक आचार्यश्री के मुखारविंद से दिव्य देशना होगी। वहीं प्रतिदिन शाम 6:30 से 7:30 बजे तक आनंद यात्रा (प्रश्न मंच) का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें शहर के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु शामिल होकर धर्मलाभ प्राप्त कर रहे हैं।


