
जयपुर | शाबाश इंडिया।
राजधानी जयपुर से करीब 15 किलोमीटर दूर ग्राम बैनाड़ स्थित श्री चंद्रप्रभु दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र चंद्रगिरि में 24 एवं 25 अक्टूबर को दो दिवसीय वार्षिक मेले का आयोजन होगा। करीब 115 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होंगे। आयोजन आर्यिका सुकाव्यमति माताजी ससंघ के सान्निध्य में होगा।
क्षेत्र के अध्यक्ष प्रकाश चंद गंगवाल एवं महामंत्री अशोक पांड्या ने बताया कि शनिवार, 24 अक्टूबर को प्रातः चतुर्विंशति पूजा होगी। सायंकाल मूलनायक भगवान चंद्रप्रभु की महाआरती के बाद 48 दीपकों से संगीतमय भक्तामर स्तोत्र दीप महाअर्चना एवं भक्ति संध्या आयोजित की जाएगी। रविवार को प्रातः अभिषेक, शांतिधारा, पूजा-विधान, ध्वजारोहण, सम्मान समारोह एवं कलशाभिषेक के कार्यक्रम होंगे। इस अवसर पर आर्यिका माताजी के मंगल प्रवचन भी होंगे।
500 वर्ष से अधिक प्राचीन है भगवान चंद्रप्रभु की प्रतिमा
बैनाड़ के दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान मूलनायक भगवान चंद्रप्रभु की प्रतिमा लगभग 500 वर्ष से अधिक प्राचीन मानी जाती है। मान्यता है कि जब इस गांव में जैन परिवार निवास करते थे, तब मंदिर का निर्माण हुआ था। बाद में प्लेग की महामारी के कारण अनेक जैन परिवार गांव छोड़कर खौरा बीसल, राधाकिशनपुरा, माचवा तथा मध्य प्रदेश के दुर्ग सहित विभिन्न स्थानों पर बस गए। इसके बावजूद परिवारों ने मंदिर में दर्शन-पूजन की परंपरा जारी रखी।
परिवारों ने आपसी मेल-मिलाप और सामूहिक भोज की परंपरा शुरू की, जो समय के साथ वार्षिक मेले का रूप ले गई। लगभग 115 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में बैनाड़ के मूल निवासी परिवारों के साथ जयपुर, चौमूं और झोटवाड़ा सहित आसपास के क्षेत्रों से श्रद्धालु शामिल होते हैं।
मंत्री अमरचंद दीवान, खौरा बीसल ने बताया कि करीब 40 वर्ष पहले रेलवे विभाग मेले के अवसर पर जयपुर से बैनाड़ के लिए विशेष ट्रेन भी चलाता था। उस समय सड़क की सुविधाएं विकसित नहीं थीं और रेलवे लाइन के पास बनी कच्ची पगडंडी ही आवागमन का प्रमुख साधन थी।
अतिशय को लेकर श्रद्धालुओं में गहरी आस्था
क्षेत्र के अध्यक्ष प्रकाश चंद गंगवाल एवं महामंत्री अशोक पांड्या ने बताया कि मंदिर से जुड़ी कई अतिशय संबंधी मान्यताएं और जनश्रुतियां प्रचलित हैं। बुजुर्गों के अनुसार, जंगल के बीच पहाड़ी के नीचे स्थित मंदिर कई-कई दिन निर्जन रहने के बावजूद स्वच्छ मिलता था और प्रतिमा चमकती रहती थी। इसे लेकर श्रद्धालुओं में मान्यता रही कि देवगण भगवान का प्रक्षालन करते हैं। प्रतिमा और गुल्लक चोरी करने के कथित असफल प्रयासों तथा श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूर्ण होने से जुड़े संस्मरण भी प्रचलित हैं। इन मान्यताओं के कारण क्षेत्र के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था बनी हुई है।
पांच मंदिरों से सुसज्जित है तीर्थ क्षेत्र
राजस्थान जैन युवा महासभा, जयपुर के प्रदेश महामंत्री विनोद जैन कोटखावदा ने बताया कि अब यह स्थान विकसित होकर तीर्थ क्षेत्र का रूप ले चुका है। परिसर में मूलनायक भगवान चंद्रप्रभु मंदिर, समवशरण मंदिर, चौबीसी मंदिर, आदिनाथ-भरत-बाहुबली मंदिर तथा नंदीश्वर द्वीप रचना मंदिर सहित पांच मंदिर हैं। यहां त्यागीवृत्तियों एवं यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था के साथ भोजनशाला भी संचालित है।
कार्याध्यक्ष पदमचंद जैन, उपाध्यक्ष राजेंद्र पांड्या एवं मंत्री अमरचंद दीवान, खौरा बीसल ने बताया कि उपलब्ध जानकारी के अनुसार, भगवान चंद्रप्रभु की प्राचीन प्रतिमा कहां से आई या भूगर्भ से प्राप्त हुई थी, इसकी निश्चित जानकारी नहीं है। वर्ष 1996 में मुनि पुंगव सुधासागर महाराज ससंघ के सान्निध्य में मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ। वर्ष 2003 में आचार्य विशद सागर महाराज ससंघ के सान्निध्य में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव आयोजित किया गया। इसके बाद आचार्य वसुनंदी महाराज ससंघ के सान्निध्य में वेदी प्रतिष्ठा हुई तथा मुनि विश्रांत सागर महाराज ससंघ के सान्निध्य में भी दो बार पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव संपन्न हुआ। इस क्षेत्र में दिगंबर जैन समाज के अनेक प्रसिद्ध आचार्य, मुनिराज एवं आर्यिका माताजी का आगमन हो चुका है।
विनोद जैन कोटखावदा प्रदेश महामंत्री, राजस्थान जैन युवा महासभा, जयपुर


