
विशेष आलेख | शाबाश इंडिया।
जैन धर्म की समृद्ध श्रमण परंपरा में श्वेतपिच्छाचार्य श्री 108 विद्यानंद जी मुनिराज के शिष्य, अभिक्षण ज्ञानोपयोगी, प्राकृत भाषा चक्रवर्ती एवं वात्सल्य मूर्ति आचार्य श्री 108 वसुनंदी जी महामुनिराज का नाम ऐसे संत, अध्यात्मवेत्ता और साहित्य-साधक के रूप में आदरपूर्वक लिया जाता है, जिन्होंने प्राकृत भाषा के माध्यम से जैन दर्शन, अध्यात्म, संयम, तप, चारित्र, श्रावकाचार और जीवन-मूल्यों को सरल एवं प्रभावी ढंग से जन-जन तक पहुंचाया।
11 अक्टूबर को आचार्य श्री के 38वें दीक्षा दिवस के अवसर पर उनकी साहित्य-साधना को स्मरण करना प्राकृत भाषा और जैन साहित्य के प्रति उनके विराट योगदान को नमन करने जैसा है। आचार्य श्री की साहित्य-साधना की विशेषता यह है कि उन्होंने गूढ़ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विषयों को प्राकृत की सहज गाथाओं में अभिव्यक्त किया। उनकी रचनाओं में आत्मचिंतन, भेदविज्ञान, संयम, तप, अनुप्रेक्षा, धर्म, श्रमण-चर्या और नैतिक जीवन के विविध आयामों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
आचार्य श्री की प्राकृत भाषा की रचनाओं की एक विशेषता यह भी रही है कि उनके भावों और विषयों को सचित्र प्रस्तुति के साथ हिंदी एवं अंग्रेजी में समझाने का प्रयास किया गया है। इसका लोकप्रिय उदाहरण ‘आदर्श शिक्षा विधि’ जैसी कृतियों की व्यापक स्वीकार्यता है। आचार्य श्री की लगभग सौ प्राकृत रचनाओं में से अनेक कृतियां आज जैन साहित्य की महत्वपूर्ण धरोहर बन चुकी हैं।
‘असोग-रोहिणी-चरियं’ अर्थात ‘अशोक रोहिणी चरित्र’ आचार्य श्री की सर्वाधिक चर्चित प्राकृत कृतियों में से एक है। 2,442 गाथाओं में निबद्ध और 21 नंदों में विभक्त इस महाकाव्य में अशोक और रोहिणी के प्रेरणादायक चरित्र के साथ रोहिणी व्रत के माहात्म्य का वर्णन किया गया है। इसे दिगम्बर परंपरा के अत्यंत वृहद् प्राकृत महाकाव्यों में स्थान दिया जाता है।
‘आयंस-सिक्खा-विही’ अर्थात ‘आदर्श शिक्षा विधि’ शिक्षा को केवल रोजगार का माध्यम न मानकर संस्कार, सदाचार, नैतिकता और मानवता के विकास का साधन मानने वाली कृति है। इसमें विद्यार्थी, शिक्षक और आदर्श शिक्षा-पद्धति से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों को प्रस्तुत किया गया है।
‘अप्प-विहवो’ अर्थात ‘आत्म वैभव’ आत्मा के वास्तविक स्वरूप और उसके अंतरंग वैभव की ओर ले जाने वाली आध्यात्मिक कृति है। वहीं ‘सुद्धप्पा’ अर्थात ‘शुद्धात्मा’ 174 श्लोकों में रचित गहन आध्यात्मिक ग्रंथ है, जिसमें भेदविज्ञान और शुद्ध आत्मस्वरूप पर विशेष प्रकाश डाला गया है।
‘अनुवेक्खा-सारो’ अर्थात ‘अनुप्रेक्षा सार’ में 297 गाथाओं के माध्यम से द्वादश अनुप्रेक्षाओं का सुंदर निरूपण किया गया है। यह कृति साधक के भीतर वैराग्य, आत्मचिंतन और जीवन के सही लक्ष्य की ओर उन्मुख होने की भावना को पुष्ट करती है।
आचार्य श्री की रचनाओं में साधना-पक्ष को विशेष महत्व प्राप्त है। ‘संजम-सारो’ में संयम के स्वरूप एवं महत्व का विवेचन मिलता है। ‘तप-सारो’ 111 गाथाओं में तप-साधना का विवेचन करता है, जबकि ‘पसम-भावो’ अर्थात ‘प्रशम भाव’ 72 गाथाओं की प्राकृत रचना है, जिसमें कषायों के शमन और उनसे होने वाली हानि को समझाया गया है।
‘धम्म-सुत्तं’ अर्थात ‘धर्म सूत्र’ 120 गाथाओं में धर्म के विभिन्न आयामों को प्रस्तुत करता है। इसी प्रकार ‘विस्स-धम्मो’ अर्थात ‘विश्व धर्म’ धर्म के व्यापक स्वरूप और मानवीय मूल्यों को सामने रखता है। इन रचनाओं में धर्म को केवल धार्मिक अनुष्ठान न मानकर जीवन को श्रेष्ठ बनाने वाली साधना के रूप में देखने की प्रेरणा मिलती है।
‘लोकोत्तर वृत्ति’ 93 गाथाओं में निबद्ध लघुकाय किंतु सारगर्भित प्राकृत कृति है, जिसमें योगियों की विशिष्ट प्रवृत्तियों का वर्णन किया गया है। ‘विस्स-पुज्जो दियंबरो’ अर्थात ‘विश्व पूज्य दिगम्बर’ 165 गाथाओं का महत्वपूर्ण प्राकृत ग्रंथ है, जिसमें दिगम्बर मुनि के त्याग, तप, संयम, अपरिग्रह, करुणा और आदर्श चर्या को प्रस्तुत किया गया है।
‘वयण-पमाणत्तं’ अर्थात ‘वचन प्रमाणत्व’ 543 गाथाओं में रचित दार्शनिक कृति है। इसमें द्रव्य, गुण, पर्याय, प्रमाण, नय आदि जैन दर्शन के महत्वपूर्ण सिद्धांतों का विवेचन किया गया है। ‘सिरिसीयलणाह-चरियं’ अर्थात ‘श्री शीतलनाथ चरित्र’ भी आचार्य श्री की महत्वपूर्ण प्राकृत रचनाओं में शामिल है। तीर्थंकरों एवं महापुरुषों के चरित्र के माध्यम से नैतिकता, संस्कार, क्षमा, कर्तव्य और जीवन-मूल्यों के विकास की प्रेरणा इसमें निहित है।
‘को विवेगी’ 84 गाथाओं का प्राकृत ग्रंथ है, जिसमें विवेकवान व्यक्ति के लक्षणों को प्रस्तुत किया गया है। वहीं ‘रयणकंडो’ अर्थात ‘प्राकृत सूक्ति कोश’ लगभग 600 विषयों पर 3,333 प्राकृत, हिंदी और अंग्रेजी सूक्तियों का विशाल संग्रह है। इसमें नैतिक, सामाजिक, राजनीतिक, भौगोलिक, ज्योतिष, वास्तु सहित अनेक विषयों से जुड़े जीवनोपयोगी सूत्रों का संकलन किया गया है।
जैन श्रावक जीवन की महत्वपूर्ण कृतियों में आचार्य समंतभद्र स्वामी द्वारा रचित ‘रत्नकरण्ड श्रावकाचार’ का विशिष्ट स्थान है। मूल ग्रंथ में 150 श्लोक बताए गए हैं और इसमें श्रावक के सम्यग्दर्शन, ज्ञान, आचार, व्रत एवं कर्तव्यों का मार्गदर्शन मिलता है। आचार्य श्री वसुनंदी जी ने इस महान ग्रंथ पर विस्तृत प्रवचन दिए, जिनका संकलन अपने आप में महत्वपूर्ण साहित्यिक धरोहर बन गया है।
इसी क्रम में आचार्य श्री ने अनेक प्राचीन जैन ग्रंथों के संकलन एवं संपादन का कार्य भी किया है। ‘वसुऋद्धि’ में विभिन्न आचार्यों की महत्वपूर्ण कृतियों को अर्थ सहित संकलित किया गया है, जो उनकी संरक्षण एवं संपादन-साधना का उल्लेखनीय उदाहरण है।
आचार्य श्री के ग्रंथों की देखरेख, आपूर्ति आदि व्यवस्थाएं नोएडा स्थित ‘निर्ग्रन्थ ग्रंथ माला’ संस्था द्वारा व्यवस्थित रूप से की जा रही हैं। आचार्य श्री की रचनाओं की विस्तृत जानकारी संघस्थ आर्यिका श्री 105 वर्धस्वनंदिनी माताजी के मार्गदर्शन से संभव हो पाई है, जो वर्तमान में बंगवासी, हावड़ा, कोलकाता में चातुर्मासरत हैं।
आचार्य श्री 108 वसुनंदी जी मुनिराज का साहित्य केवल ग्रंथों का संग्रह नहीं, बल्कि आत्मजागरण, संयम, सदाचार और मोक्षमार्ग की ओर प्रेरित करने वाली साधना है। उनकी रचनाओं में एक ओर प्राकृत भाषा की प्राचीन परंपरा का संरक्षण दिखाई देता है, तो दूसरी ओर आधुनिक पाठक के लिए सरल और जीवनोपयोगी प्रस्तुति भी देखने को मिलती है।
उनके प्रवचन सरल भाषा, मधुर वाणी और गहन आध्यात्मिक चिंतन का सुंदर संगम हैं, जो ‘मीठे प्रवचन’ के नाम से प्रसिद्ध हैं और जिनका संग्रह कई भागों में उपलब्ध है। इस प्रकार आचार्य श्री की साहित्य-साधना प्राकृत भाषा के संरक्षण के साथ-साथ अध्यात्म और जीवन-मूल्यों को समाज तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम बनी है।
साहित्य-साधना के ऐसे विराट व्यक्तित्व को शत-शत नमन, चरण-वंदन एवं सादर अभिनंदन।

—पदम जैन बिलाला
प्रांतीय अध्यक्ष, अखिल भारतवर्षीय धर्म जागृति संस्थान, प्रांत राजस्थान


